कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सदगुरुं तन्त्रमामि ॥ १ ॥ द्वे पदम् द्वे भुजम्, प्रसन्नवदनम् द्वे नेत्रम् दयालम्। सेलीकण्ठमाल उर्ध्वतिलकम् श्वेताम्बरीमेखला ॥ चक्रांकस्य विचित्र टोपलसितं तेजो मयी विग्रहं । वंदेसदगुरु योगदण्ड सहितं कञ्जीर करुणामयम् ॥२॥ एतानि चतुर्मुखानि, विरूपातानि महास्याः । अज्ञायस्य स्तुतानि साधुभिः शजतुं ( किंवा ) साधुभिः परिगीतानि वक्ष्यामि जीविते यः ॥ ३ ॥ न अंग अंगन्यासं नकरं करन्यासता । स्वयमश्च गुरुमंत्र स्वयं भूत्वा स्वयंजपः ॥४॥ सोमाप सोहं रूपाय सत्यनामाय साक्षिणे । करुणामयकवीराय त्रिपदातीताय नमः ॥ ५ ॥ अमी अमृत नामाय, अजराचिन्तरूपिणे ॥ अमरः सत सुकृताय, दयाब्धि गुरुवे नमः ॥६॥ कृपाल कृपायः सिधुश्च, कृपायोट कृपाधनं ॥ कृपार्णव कृपा वृष्टिः कृपा कर्ता नमोनमः ॥७॥ दयाल धीर्यवंतश्च, दयासिधु दयार्णव ॥ दयाकर्ता दयावन्ता, ज्ञानदाता नमो नमः ॥ ८ ॥ अभयन्निरभयश्चैव, निर्भयपददायकम् । अमहारकनामाय भातारक नमोनमः ॥ ९ ॥ अचल रूपं अचलं चिन्तातीत प्रकाशकम् । दीनानार्थं दीनोद्धारं, दीनवत्सल सुन्दरम् ॥१०॥ अमृत मृत्यु नाशाय, महा अमनिवारणम् । योगजीत अजीताय, ज्ञान वेत्ताय किञ्चन ॥ ११ ॥ निर्मोही मोह नाशाय जगत्याशा विनाशकम् ॥ निर्वैरअमहीनाय, निर्भ्रमाय नमो नमः ॥ १२ ॥ उपदेश कर्ता स्वदेश दाता, उपाधिहीनश्च भय शोक हर्ता ॥ संकष्ट नाशाय सिद्धान्त मूला, स्वयं गुरु सिद्ध अहं नमामि ॥ १३ ॥ हंसाय हंसरूपाय हंस पाल हंस पति ॥ हंसनायक श्वेताय, हंसोद्धारक तारकम् ॥ १४ ॥ जीवोद्धारक शान्ताय, शान्ति रूप अज्ञाश्रिता । शांति कर्ता शांति धर्ता, सर्वे शांति नमो नमः ॥१५॥ हंता नाश दयापाल संशयजाल विखण्डनम् ॥ वपुनाशा