कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(१९५)
लायक, निरखि सकल छबि लागत पीकी ॥ टे० ॥ कृपा करत लखि दीन दयाकर, भ्रांति मिटाव सकलो जीकी ॥ शरण गये सकलो दुःख मेटत, सुख उपजावत देवत सीकी ॥ निज पद माँहि छेत बैठारी, गांठ छुडावत मैं ममतीकी ॥ गुरु सम को उदार जगमाहीं, पूरन कीन्ह परख अति नीकी ॥ १ ॥
शब्द २-शरण तुम्हारी आयोजी गुरु ॥ टे० ॥ त्रिगुण मायाके फन्द़ा परि; युगन २ जहाँडायो ॥ चाह न योगध्यानकी अब मोहि, नाम जगीरी पायो ॥ १ ॥ लोक परलोक कछु नहि चाहों, सगुण निर्गुण नहि भायो ॥ पूरण ज्ञान ज्ञान विज्ञानको, भयो जब पारख थिति पायो ॥ २ ॥
शब्द ३-हौ प्रभु दीन जनन प्रतिपालक ॥ टे० ॥ हौ मति मन्द छन्द विषयनको, महा अज्ञ इन्द्रिकको चालक ॥ औगुन हरन नाम प्रभु तेरो, मैं औगुणी अधम कुल घालक ॥ मैं अति दीन शरण तुव आयो, छवो अपराध जीवनके पालक ॥ ना मोहि योग भोग मद नाहीं, धन मद नाहि बाँह बल बालक ॥ पूरन दासके तुमहि अधारा; और सकल जगमें यम जालक ॥ ३ ॥
शब्द ४-पतित पावनको सुन्दर ध्याना । निरर्त बदन प्रसन्न सुखदायक, देह आदि बिसरत जग भाना ॥ टे० ॥ चक्रांकित शिर टोप विराजे, ता ऊपर दस्तार बखाना । तिलक लिलाट शुभ अति नीको, तुलसीकी माल गले बिच नाना ॥ १ ॥ ज्ञानको अचला मुक्ति मेखला, अष्ट सिद्ध सेली प्रमाना । दया सिंहासन आई बैठे, पूरणदास चरण लपटाना ॥ ४ ॥
शब्द ५-कहाँलो कहौ गुरुप्रद प्रताप ॥ टे० ॥ जो मुख होय जीव दश लाखा, तऊ न बरनि सकत प्रभुजाप । अनेक जन्मको जीव विहाला, तिनको मिटचो महा भ्रम दाप ॥ सङ्कटमें सन्तनको