कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
हरी ॥२॥ मुझ दासको देव तुहि प्रभु हो । दीननाथके नाथ रखो शर्णु हो ॥ ३ ॥
छन्द मुनगी ।
गुरुजी कृपालो बडो तु दयालो । करो प्रतिपालो मिटी दुःखसालो ॥ कहैँ बिनती मैं शिशु जानि तारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ १ ॥
परम सुजान महागुनखान । शीलके निधान सब सुखस्थान । कोईना कोईना कोईना हमारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥२॥
परं विरागी क्षमा उरपागी । मैं तो हूँ अभागी तेरो पाव लागी ॥ हूँ अनारी अनारी मेरो दुःख टारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥३॥
गिराहे तुमारी हरे शूल भारी । माया मोह डारी देही सुख सारी ॥ अनाथा अनाथा हियोहे अधारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥४॥
मेरे तुहीं स्वामी तुहीं अन्तर्यामी । नहिँ काम कामी प्रभुजी अकामी ॥ दयाला दयाला गुरुजी तुं सारों । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ५ ॥
मेरी बात मानी कहैँ सो तुं जानों । तेरो ज्ञान भानो करे अन्ध हानो ॥ डरो अन्ध जारो उजारो उजारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ६ ॥
मेटो भांतिझारी भुमां शोकफारी । ग्रही टेकयारी करी प्रीति भारी ॥ चहुँ साथ तेरो मेरेकुं उबारो । डरों दुःख देखी भवोंके उपारो ॥७॥
अहो देव देव करुं तेरो सेव । अबे गुरुदेव देहु सुख भेव ॥ प्रकाशी प्रकाशी प्रभुजी पुकारों । डरो दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ८ ॥
अथ विनयशब्दावलिल प्रारम्भः ।
श्रीपूर्ण साहब छत.
शब्द १—देखों अति सुन्दर छबि नीकी । मंगलदायक सुख