भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 200

(१९२)

कवीरपंथी—

भास मिटाइके फाँस छुटाइ दियो, प्रभु कालहि तू अब नाथी ॥ ऐसो दयालको छांडिके रे शठ, तू बहुदेय भुले देह भाथी ॥६॥

जो प्रभु आप सहाय करो नहिं, तो यह जीव रहे भव भीरा । अवगुन बापजि माफ करो अब, मैं कछु शील विचार न थीरा ॥ बाल पुकार करे बहुते सर, हे सुख सिंधु करो मन थीरा । साहेब संत समाज मिले जब, आय लगूँ गुरु ज्ञानके तीरा ॥ ७ ॥

तुमही सब लायक जानत हो सद्, वेद पुरान कुरान अनेका । बुद्धि हीन मलीन पुकारत हों, अबहो प्रभु राखहु वेषको टेका ॥ यद्यपि आप विसारहुगे तब, लोक हँसे नरनारि तरेका । ताहिते शिष्यको भाव धरो अब, शिष्य भरौंस करै गुरु देका ॥ ८ ॥

करसे सुत मात ना छांडत है, शिर दुःख हजार परे मन जोखा । जोपै पूत कपूत सही है, जननी न विचार धरे उर धोखा ॥ कवीर गोसाई मेरे शिरताज, दूजा कहाँ जाये करो तन पोखा । विपति शर बान दहैं अतिसय, तुव दास लडे चढ़ि ज्ञान झरोखा ॥९॥

कवित्त ।

बालक ज्यों बोले बात तोतरी बनाय करी, मात पितु वाके सुख माने प्रेम सानिके । ज्यों पै सुत भूल्यो आय जननी पुकारे धाय, मारे सुख वचन कहत सहुँ आनिके ॥ रोदन करत पूत चले जात दूर धाय, झांझाहीं विलाप धारि लोटे बहु ठानके । हाथही अम्बर लेह पोंछि कर उर देह, पीर सब छीन करी गोद लेवे जानके ॥१॥

दोहा—तैसे तुम गुरुदेव प्रभु, लेहु सकल सुख साज ।

भवबन्धन जाते मिटे, सो चाहत मैं आज ॥ १ ॥

पारख शुद्ध विचार करी, ताहि माँहि सुखधाम ।

ताते कहत हूँ आपसो, मोको राखहु ठाम ॥ २ ॥