कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मोहको गवाँवे रोग दोष ले बहावे सब, भाव उपजावे ले पचावे काम कासना। विविधि विवेक ले त्रिविधि ताप हंत करै, उरधरि वाही जनि लावो कोप वासना ॥ केते लोक पालनकी सभा माँझ राजे वही, वही महि मंडन अखंडन रकासना। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और कहे ताको मुक्ति आसना ॥५६॥
कक्काही सकल जीव संभव विचार लीजै, वक्वाही विसर्ग सब संज्ञाको अधीश है। वही है रकार शब्द रूप सो अभासे सदा, संतत प्रकाशे दृग आनन रु शीश है ॥ शब्द अरु सूरति संयोगमें समाय रहे, कुर्भकी वृति गहे लहे वीसो वीस है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो तेरे हिये जगदीश है ॥५७॥
ज्ञान औ विज्ञान मख तीरथ वरत दान, सबही अनाथ नाथ जानिये ककार यो। मन बुधि चित्त अहंकार महाभूत पांचो, सबको मतो है कांचो सांचो हैं वकार यो। शब्द रूप रस औ परस वश है सो नाहिं, अरस चढायबेको दरश रकार यो। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मुसकाये पाँये गूँगेको अहार यो ॥ ५८ ॥
कक्काही कहत करतार किते भावनिको, वक्वाही विलासे अति सागरके पारको। रमत रकार नायकामें रूप भूप हूँके, शोभित सरूप यो कुरुप करतारको। विधि औ निषेध आछो बुरो ये तो माया वाद, विविध विषाद कियो माया और सारको। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि उर खोजिले मतो है भवपारको ॥ ५९ ॥
कक्काही कह्यो है कथनीय वारताके माहि, वक्वा व्याधि नाशवेको अति बलवीर है। शब्द औ स्वरूप सदा मुक्तिको है भूप जोई सोई, घट घट माहिं राजे रणधीर है। ब्रह्म शिव विष्णु केते कोटिन