कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
माहिं, भरि भरि वहैरे विहारै है वकार सो ॥ भक्ति औ मुकुतिमें अत्यन्त रति जान्यों जाकी, दिन दिन सानो आनो भाव रंकार सो । याहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, तोरि जग रीहि प्रीति जोरिये रकार सो ॥ ५१ ॥
कलिके कलेसन जरायवेको पावक है, संत उर जावक अचल सुहाग कवि । संतत सो विविधि विलास वनमाली वेहि, वानी अधीश्वर है ईश्वर विचारि विविधि ॥ रसनाके बीच बेसे सुधारस बास आछे, वचन विलास हांस अमल प्रकाश रवि । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि ज्ञान पावक हवन कीजे कम हवि ॥ ५२ ॥
सकल ब्रह्मांडको अधार करतार सोई, सोई निराधार है विचार विस्तार कंक । सोई सब कालनको काल महाकाल जानो, सोई यमजाल बिहाल जगमग्यो वक । स्वर्ग पाताल छितिहूमें दशों दिशा सोई, रह्यो रमि रक्षक प्रतक्षक पुरान रंक । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि देखो हिये माहिं अंकित अनादि अंक ॥ ५३ ॥
कलिके कलेशनको तारत निषेध सोई, जाको नाम कक्षा जोइ जग करतार है । रतिके विनोदनको भागी है भैवर सदा, जग वन घन बीच भवन वकार है ॥ रतिके जे धर्म जिन्हैं पोथिनमें गावैं साधु, अगम अगाध बँधे बँधन रकार है । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, सत्य याहि मानो जग झूठो व्यवहार है ॥ ५४ ॥
साँचे साँचे सबद किये हैं जामें बीनि बीनि, छीन सब किये जग करम ककारने । सार सार लीनो और कुसार सब धोय डारचो, यज्ञ कीन्हे भरम पछारी कै वकारने । ध्यान धारणा धरत दिन रातिहू समुझि, भ्रम सब डारे खोई जगके रकारने । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि डोरिलावै ताकै जावै हम वारने ॥ ५५ ॥