भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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“कवीर” नाम साहात्म्य ।

श्रीपार्वत्यवाच ।

कवित्त-अहो महादेव तीन अक्षरको एक नाम, कहैं कवीर तासो कहो यह को हैजू । देव उपदेव है कि लोक लोकपाल है कि, यतिकि तपी कि सिद्धि साधक लो सोहैजू । योगी योगध्यानी है कि व्रत है कि संयम है, यंत्र है कि मंत्र किधों तंत्र मन मोहैजू । किधों धाम क्षेत्र कोई तीरथको नाम हैं; कहो कृपाकरि जग योग यज्ञ जो हैजू ? ॥ १ ॥

श्रीमहादेव उवाच ।

कहत ककार जासो केवल सो ब्रह्म जानो, मानो वी-शेष बीज अक्षर जगतको । जेते ब्रह्माण्ड पिण्ड आदि अंत-मध्य तहां सो, रमत रकार ज्ञनकार है भगतिको । भावी भूत भवितव्य तीनों अक्षरते न्यारो, नाही सो यही बात प्रमाण वेदमतिको ॥ ताहिंते कहत है कवीर तीन अंकजोरी, मोरि मोरि औरही कहैगे ते अगतिको ॥ १ ॥

जलमें कवीर और थलमें कवीर पांच, तत्वमें कवीर तीन गुणमें कवीर है । विद्यमान जानो यों विशेष अवशेष नाहीं, रहै कैसे निशि दिन ज्यो दृगन नीर है ॥ स्थावर औ जंगमके जेते जीव जगत मांझ, रह्यो भरपूर जैसे जड़ित जंजीर है । ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और ही लगावे सो अधीर है ॥ २ ॥

कहत ककार सुखसागर दातारपति, ध्यानके साजन गुरु-ज्ञान बीज बानी है । रटत रकार सो रहित आदि अंत मध्य, कहत चाहत जाकी अकथ कहानी है । गुंगेके सो गुड जोई खाय