भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१५९)

नाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ३ ॥ तन मन गत जीतं बचन अभीतं माया अतीतं गत क्रोधं । ममता मद लोभं रहित अछोभं, समता शोभं शुध बोधं ॥ गुरु दीन दयाला जन प्रतिपाला, मेट विशाला चतुराशी । जय जय अविनाशी प्रेम- प्रकाशी, काशीवाशी सुखराशी ॥ ४ ॥ अनवद्य अखंडं सब जग मंडं, अतिहि प्रचंडं गुरु धरमं । सब वर्णाश्रमं भूले भ्रमं. पावन मरमं कर सरमं ॥ थक चारू वेदं न भेदं, ज्योति अछेदं तम- नाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुख- राशी ॥ ५ ॥ चारों जुगआये हंस चेताये, शब्द लखाये सुख- दाई । मधुवन पग धारे रतन उबारे, चौका सारे गति पाई ॥ धरमनि मन भाये वचन सुहाये, पंथ चलाये तज फांसी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ६ ॥ सुलतान चपेहू डार जंजीरू गंगातीरू भय पारं ॥ महमंत गयंदा मारत अंधा, गर्जत सिंधा मद डारं ॥ पग पर जल डारे पण्ड उबारे, अचरज सारे नृप काशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्र- काशी काशीबासी सुखराशी ॥ ७ ॥ मगहर स्थाना भई घम- साना, विरसिंध पठाना दल साजी । सत गुरु अलसाना चादर ताना, दोउ दीन मुलाना मनराजी ॥ घटका दोय भेहा खोलो तेहा, भूल विदेहा सुख राशी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ८ ॥ आत्म सुख धामं लिख शिव- रामं, सदा अरामं गुरु पासं । अघपुंज नसावन गुरु पद पावन परसत जावन सत्य भासं ॥ विनती सुनि लीजै दरसन दीजै, अपना कीजै अघनाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशीवासी सुखराशी ॥ ९ ॥ (कवीरमहिमासे)