भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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संयोग । अष्ट धातके महलमें क्रीडाकरे सुखभोग ॥ आपुहि राजा परजा, आपुहि रंक फकीर । आप सर्व गुन आगरे, आपुहि गुन गंभीर ॥ आपुहि जती सती है, आपुहि है दयापाल । आपुहि जोगी जंगम, आप कियो विस्तार ॥ आपुहि गावै बजावे, आपुहि तोरे ताल । आपुहि लखे अपन पौ, आप अपुनमें काल ॥ आपुहि करे करावै, लेय औरको नांव । आपुहि खलक ऊजरे, आप बसावे गांव । जुग असंखलो शंकर, धरे सुन्नमें ध्यान । उनहुँ न लखो अपुनपो, तू नर कयोँ वौरान ॥ ब्रह्मा विष्णु थकित भये, खोजत पार न पाय । औरन्हकी मति केतिक, नाहक गोता खाय ॥ शिव सनकादिक नारद, शारद शेष सुरेश । अस्तुति करत थकित भये, उनहुँ न कहा संदेश ॥ एके जपै निरंजन, निर्गुन और निरंकार । पाँच तत्वके बाहिरे, उनके भये अकार ॥ अलख अपार परम गुरु, अरु मूरत वे पिंड । औगह अगह अवीज है, जोत सरूप अखंड ॥ सुध बुध वा पहुँचे नहीं, महा कठिन ऊ पंथ । सुमिरन साखकी खबर नहीं, कथकथ मरे ग्रंथ ॥ हाथ माथ पग पिंड बिन, केतिक बडो वह कोड । किसबिध चेरी आगरी, किसबिध खसम निगोड ॥ कथकथ मुनिजन उडगये, जस भैवे अकाशे गिद्ध । चारा वाके भुई धरो, कहा उडे भये सिद्ध ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्ध, कोट अनंतन दास । उनहुँ न लखो अपुनपो, भरमत फिरत उदास ॥ कस्तूरी है कुंगरंग, चले पवनके बास । मृगमध्य नाभी बसे, मृग दूँडे वन घास । कहैं कवीर अब कहतहुँ, डार भर्मकी मोट, अपनो भलो जो चाहऊ, परखलेउ खर खोट ॥ ४ ॥ सुन्न सरोवर भीतरे, तीरथ एक अनुप । तेज पुंज जहां झलकई, प्रगटे जोत स्वरूप ॥ कदल कमलदल अंतरे, रजनी बासर नाहिं । अनहद घंटा बाजई, पाँच