भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

(२९८)

कवीरपंथी-

सुत्रके माहिं ॥ कंचन कूट औटाइले, भिन कबहुँ नहिं होय । परमल बास पलासकी, काष्ठ कहे नहिं कोय ॥ काष्ठ माहिं पावक बसे, ज्यों तिल मद्धे तेल । जुक्ति बिना नहिं नीकसे, ऐसा अद्धुत खेल ॥ परम पुरुष संग दुलहिन, खेलै आतम सार । एक वरण एक अंक है, एक रूप अनुहार ॥ साहब कवीरके दीहल, सुनियो संत सुजान । समुझत सुख ऊपजे, नातो दुकख निदान ॥ ५ ॥ सुकृत फूल गुलाबके, सबघट रहो समाय । कहु कैसेके पाहये, गुरु बिन लखो न जाय ॥ तीन त्रिकुटीके ऊपरे, फुलै सोहंगम फूल । जहां न धर्मकी आसना बिन अझर निजमूल ॥ चार जोजनके ऊपरे, पुरुष विदेही पूर । जगरमगर वह नग्र है, बाजत अनहद तूर ॥ अपने ठीका हम खडे, सतगुरु दिया बताय । खिरकी खोल दिखाइया, राह गगनकी जाय ॥ कहैं कवीर धर्म- दास सों, प्रगट दीहल बताय । सो हंसा भल पावई, नहिं आवे नहिं जाय ॥ ६ ॥ अचरज देखो कामिनी, कहतेको पतियाय । अधर साहब हम देखिया, सतगुरु डंडिया फँदाय ॥ चंद सूर जहँवां नहीं, जहां न धरनि अकास । तीन पुरुष मोरे प्रीतम, केहि विधि करो निवास ॥ गुरु दर्शनके कारने, सरवस देउँ लुटाय । एक पलकके बीछुरे, अब मोहिं कहु न सोहाय ॥ गुरु दरसन हम पायल, छूटल कुल परिवार । अब जहँ पुर आपने, परख परख टकसार ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों, हिरदे करो बिचार । अरस परस करो कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ७ ॥ दरिया पार हिंडोरना, दीन्हो कंथ बताय । कोई एक नार सुलक्षनी, हरदम झूलै जाय ॥ अरध उरध दोय खंभ हैं, सुखमन लागी डोर । जेठी सुतं सम्हारले, रचले गगन मन मोर ॥ द्वादश केर हिंडोरना, झूलै पाँचों नार । मेघ घटा घन गरजई, पिय बिन जग अंधियार ॥