कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(२९९)
अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥ कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें, बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी, आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन, तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई, सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय । सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय । हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी, जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥ सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब