कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(२९९)
अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥ कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें, बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी, आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन, तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई, सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय । सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय । हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी, जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥ सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब
(३००)
कवीरपंथी-
कवीर कहि दीहल, सुनियो हो धर्मदास । निर्गुन केर सुलच्छनी, निर्गुण कियो निवास ॥ १० ॥ आरती साजहु दुलहिन, आवहि कंथ सबेर । निर्गुण मंगल गावहु, अब जिन लावहु बेर ॥ तन रुइया कर बातियां, मन तिलको कर तेल । सुरत हाथ दियना धरो, निरत चली कर केल ॥ अच्छे पलंग जहाँ पचरंग, सो रे बिछावौ झार । सुषुमन सेज सँवारहु, सुकृत गढवा धार ॥ हँसिके प्रीतम आइया, बिहँसि के लीन्हो पाय । सुख देखत सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ ईगला लिये कर झारी, पिंगला पंखा गाँस । सतगुरु शब्द सहायक, पहुँच पियाके पास ॥ हियरा गहभर भेटिया, सुक पलोटे पांय । सुख देखत सुख ऊपजे, तनकी तपन बुझाय ॥ कहैं कवीर धर्मदाससो, सुनियो संत सुजान । पिया मिलो सुख बिलसो, जम जीतो मैदान ॥ ११ ॥ भौसागर मोर नइहर, निर्गुण सासुर मोर । आवत बटिया भुलानी, काल करे घन घोर ॥ आग लगे वह नइहर, धोख परे असगार । सास ननद झगरा करे, नित उठ माँडे रार ॥ अनचिन्ह ससुरे के लोगवा, नित उठ लावे दोस । पार परोसिन बैरिन, एक पियाके भरोस ॥ बालम मंदिर छवायेल, झलके अघर अकास । छिन छिन बदन निहारत, देखत बहुत हुलास ॥ प्रेम सुरत गहु कामिनि, जामों निर्गुन बास । परम अनंद सुफल भये, जम माने (जाके) त्रास ॥ बहुर न या जग आइहो, बहुर न धरिहो देह । साहब कवीर कहि दीहल, निरख परख कर लेह ॥ १२ ॥
मिलरहु सखी री तू मिलरहु, अपने पिया सुख जान । नइहर आपन कोई नहीं, जासों करो पहिचान ॥ मोरे जीवको भावतो, छाय रह्यो वही देस । मैं विरहिन निशदिन फिरों, कर जोगिनको भेस ॥ तात मात कोई संग नहीं, संग नहीं सग भाय । काम न
शब्दावली ।
(३०१)
काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी, तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥ कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥
दीहल आगन तान ।
पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस- कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥ गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥ स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे, हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव । चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥ जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर, उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार । जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया- वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल
( ३०२ )
कवीरपंथी—
टकसार ॥ बिन हंस हंस न पहुंचई, बीचाहिं परे भुलाय । काल कठिन भरमावई, कामिन परे उरझाय ॥ हंस हंस मिलि लेचले, जहां पुरुष रहिवास । साहब कवीर कहि दीहल, निर्गुन अथर निवास ॥ १५ ॥ सहतेजी चित् चेतहु, सुमिरो नाम अथार । हंसन पार उतारहु, परख २ टकसार ॥ भौसागर बड दारुन, विषके लहर फिराय । बिन सतगुरु नहिं बांचिहो, सबै काल धरखाय ॥ मोरहु नरियर मोरहु, आपन अंस विचार । काल कठिन दुर्गदानिया, काह करे झखमार ॥ सहतेजी चित् चेतहु, काल कठिन बल जोर । लगन साध परमोधहु, पला न पकडै चोर ॥ निर्गुन नाम निअक्षर, सुमिरत कर्म कटाय । साहब कवीर कहि दीहल, सहतेजी ससुझाय ॥ १६ ॥ चार कमल चित् चेतहु, जहां जीवको बास । जुग जुग पान सुधारहु, मेटो जमको त्रास ॥ कमल तत्त्वचित् चेतहु, जिव ना नसे तेह मांह । लगन सनेह बिचारहु, देउ हंसको बांह ॥ जाहि कमल बस जीयरा, ताहि लगन देव पान । प्रीतम जैसुन जगपती, हंस होय निरवान ॥ या बिधि भेद बिचारहु, निरखो तत्त्व निसान । तब छुटिहै भौसागरा, जिव कहं पहुंचे यान ॥ कमल तत्त्व नहिं दरसई, जिव धोखे पर जाय । परमोदिक भये दारुन, राखो काल झुलाय ॥ राये बंकेज बिचारहु, जीवन करहु सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १७ ॥ राज बरन जुग बांधहु, भांवर सती सनेह । येही गमन करो दुलहिन, बहुर धरो जिन देह ॥ चंपा पहूम चमेलिया, लाये करेउ बनाय । तिलक लिलार सम्हारहु, जमकी दासी छुड़ाय ॥ हंस हंस जुग बांधहु, चौदह पवन लखाय । शब्द चित्त गहु दुलहिन, कोटिन कर्म कटाय ॥ जाहि पवन पर शशि बसे, चित्त गहि रहे चकोर ।
शब्दावली
(३०३)
और दिसा चितवे नहीं, ऐसा सुरत वहि ओर ॥ शिव शक्ती जल अर्पई, गुरुके बचन प्रमान । जन्म सो अम्बर दुलहिन, जम जीतो मैदान ॥ सीस मटुकिया गहिलहु, सुक्ती देहि सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १८ ॥ गुंज-वरन जुग बांधहु, लगनहिं लगन विचार । निरखके पान सुधारहु, कबहुं न होवे द्वार ॥ दीप दीप जम बैठल, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ जम पाटन जे जीतले, तिनपर माँगे लेख । गुरुजी लगन सुधारहु, दिखलो जमहिं बिसेख ॥ अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर । सुर नर मुनि सब खायल, काल कठित बल जोर ॥ शेष सहस मुख विनवई, ब्रह्मा जमकी ओर । साहब कवीर कहि दीहल, लेख देखहु सोर ॥ १९ ॥ मनहिं आनंद दुलहिन, बिहँसत बोली बात । भौसागर बड संकट, चौदह लगी जगात ॥ प्रभुजी लगन विचारले, देखले जमहिं बिसेख । जिन जम पाटन परसिले, तिनपर माँगे लेख ॥ दीपन दीप जगातियां, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ सुर नर मुनि सब अटके, काल कठिन बलजोर । शेष सहस मुख विनवही, ब्रह्मा जाके चोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, लेखा देव चुकाय । जमको मस्तक तोरके, अमे निसान बजाय ॥ २० ॥ बासर लगन विचारहु । कटे कर्मकी डोर । सुखसागर पहुंचावहु, जमसों तितुका टोर ॥ राज बरन होती कामनी, तासम होते कान्ह । कर्म काट दे भाँवर, जमकर मरदोमान ॥ चंद लगन चित चेतहु, उतरो भौजल पार । निरख परख गुरु परसिहौ, परख परख टकसार ॥ धरती रथ चढो कामनी, कटे कर्मके फंद । हंस हंस जुग बांधहु, अब जिव करहु अनंद ॥ सहतेजी शरनागती,
(३०४)
कवीरपंथी-
कोटन कर्मकटाय । साहब कवीर कहि दीहल, अभै निसान बजाय ॥ २१ ॥ पान छत्रपत कर धरो, अनभो संधि विचार । विषम त्रिश् जमकी दसी, रेख गुंज निरवार ॥ जुगकी रेख सम्हारहु, पान अखंडित सार । जाते हंस न बीगरे, चंद लगन बिस्तार ॥ चार तत्व घटमें धरो, पाँचि लेहु समोय । जेहि अक्षरते जिव भयो, ताते हंसा होय ॥ वहि अक्षरते सब भयो, लोक दीप अस्थूल । ताको चीन्हो संतो, वहि अक्षर निजमूल ॥ चार कमल घट भीतरे, परखो संत सुजान । जामें बासा जीवको, तहां सुधारो पान ॥ आन कमलमें जिव बसे, अंते पान प्रकास । अघर पान जम लेत है, जीव परे जम फाँस ॥ चारों मोहर सुधरहु, अंक छत्रकी छाँह । लक्षण लगन बिचारिके, देहु हंसको बांह ॥ सतगुरु संधि सम्हारहु, सब बिधि पूरन होय । सुरत निरत गहि धर्मनी, देखो शब्द विलोय ॥ पान छत्रपति साजहु, जुगकी रेख सुधार । कहैं कवीर धर्मदाससो, हंस उतारो पार ॥ २२ ॥ सुमिरहु कामिन सुमिरहु सुमिरहु आपन नाह । अघर साहब हम देखिया, जहवाँ धूप न छाँह ॥ बिनही घटा घन गरजई, बिन जल तिरथ नहाय । देखतही सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ बिन पानीको जीवन, बिन दीपक उजियार । ऐसो निर्गुण देखले, परख शब्द टकसार ॥ साहब कवीर कहि दीहल, अग्र सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म सुफल भये, पाये मुक्तिको मूल ॥ २३ ॥ कौन हंसको खेल है, कौन मुक्तिको दाव ? । कौन अमृतको कूप है, कौन व्रजको घाव ? ॥ सुरत हंसको खेल है, भक्ति मुक्तिको दाव । छिमा अमृतको कूप है, शब्द वज्रको घाव ॥ बन बन टूटत का फिरे, अंदर फूली बेल । तोहीमें तेरो धनी, ज्यों तिल मद्धे तेल ॥ जब चाहे तब देखिले,
शब्दावली
(३०५)
अष्ट कमल के कोट । सतगुरु मिले तो पाइये, साहब तृणके ओट ॥ कहें कवीर यह तत्त्व है, सब तत्त्वनको सार । जुगन जुगन चल आयेऊं, बोलनहार अपार ॥ २४ ॥ सतगुरु कहे चेतावनी, कौन अमीको अंक ? । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ? ॥ कौन शब्दकी लेखनी, कौन वरनको पान ? । कौन नाम अगुवा भये, कौन वचन परवान ? ॥ कौन नामको बीज है, कौन नाम की डोर ? । कौन शब्दकी बैठक, निरखो वस्तु अंजोर ॥ धर्मदासकी बीनती, सतगुरु देव लखाय । कौन दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २५ ॥ सुनियो सुतं चेतावनी, अन्न अमीको अंक । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ॥ अमी शब्दकी लेखनी, सत् वरनको पान । निहअक्षर निज बीज है, पुरुष वचन परमान ॥ सुकृत नाम अगुवा भये, सतनामकी डोर । मूल शब्द पर बैठके, निरखो वस्तु अंजोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, सुन सुकृत चितलाय । पुहुम दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २६ ॥ अगम चरित चेतावनी, अधर अन्नपम धाम । अजर अमर है सोई, सो वह निर्गुन नाम ॥ कौने घर होय सुमिरन, कौने घर होय ध्यान ? । कौने घर होय देखहु, कौने घर अस्थान ? ॥ सहज सुरत घर सुमिरण, त्रिकुटी संगम ध्यान । अजपा घर होय देखहु, हिरदै कमल अस्थान ॥ कौन जुगत गढ साजहु, कौन जुगत गढ लेहु ? । कौन जुगत गढ तोरहु, कौन शब्द मन देहु ? ॥ मूल बांध गढ साजहु, आपा मेट गढ लेहु । गुरुके शब्द गढ तोरहु, सत् शब्द मन देहु ॥ सहजे
(३०६)
कवीरपंथी—
सहजे देखिये, सहजे सुरत समाय । कहवे की कछु ना रही, देखे मन पतियाय ॥ साहब कवीर कहि दीहल, रहन गहन समुझाय । बूझे संत विचारिके, गुरुमुख मंगल गाय ॥ २७ ॥ पांच तत्वके भीतरे, गुप्त वस्तु अस्थान । बिरले मरम कोइ पावई, सतगुरु वचन प्रमान ॥ दिल अंदर दीदार है, बाद भ्रमें संसार । सतगुरु शब्द के मसकला, मांज दिखावन हार ॥ महल लेत कोई सूरमा, बाजे अनहद तूर । बिना पिंडका पुरुष है, झिलमिल दरसे नूर ॥ सहज समाधी लगिरही, मनका छूटा मैल । अनहद बाजा बाजते, सहजे पहुँचा गैल ॥ बिना पांव को पंथ है, बिन बस्ती को देश । बिना पिंडको पुरुष है, कहै कवीर संदेश ॥ २८ ॥ पारब्रह्म जासों कहो, ताहि निरंजन नाम । तहवांसे मन ऊपजो, तीन लोक लिये ग्राम ॥ पारब्रह्म के अगुवा, मन राजा सरदार । जो चाहे सोई करो, कोइ न पावे पार ॥ चौरासी उपजावई, आशा बीज जमाय । दशो जन्म राजा भये, ममता अमल चलाय ॥ तीन लोकके भीतरे, सब जिव भये किसान । चौदह काल जगातिया, मारग रोक समान ॥ तीन लोक के बाहिरें जहैं, सन्नथ को देश । चेतो हंसा चित धरो, छाड़ सकल भर्म भेश ॥ पारब्रह्म की महिमा, सुनो संत चितलाय । साहब कवीर के दीहल, परख परख टकसार ॥ २९ ॥
सत्यनाम ।
अथ आरतिदर्शन प्रारम्भः ।
ज्ञान आरती अमृत वानी । पूरन ब्रह्म लेहु पहिचानी । त्रिदेवा मिलि ज्योति बखानी । निरंकारकी अकथ कहानी ॥ यहि आशा सबही मिलि ठानी । भरमि भरमि सुये नर प्रानी ॥ दृष्टि विना दुनिया बौरानी । साहेब छाडि यम हाथ विकानी ॥ कहहि कवीर कोइ संत सुजाना । जिन जिन शब्द हमारा माना ॥ १ ॥
कैसे मैं आरति करों तुम्हारी । महामलिन साहेब देह हमारी ॥ मैलेसे उपज्यो संसारा । हौं छुतिया गुन गाउँ तुम्हारा ॥ झरना झरे दशो दिशि द्वारे । कैसे मैं आवों निकट तुम्हारे ॥ जब तुम देहु अग्रकी देही । तब हम होइब नाम सनेही ॥ मलयगिरिमें बसे भुजंगा । विष अमृत गो एके संग ॥ तितुका तोरि देहु प्रवाना । तब हम पाएब पद निरवाना ॥ धनी धर्मदास कविर बल गाजे ॥ गुरु प्रताप आरती साजे ॥ २ ॥
अखण्ड आरती खण्ड न होई । कालहिं मारी रसातल खोई ॥ खण्डित पिंड इकइस ब्रह्मण्डा । खंडित नदी अठारह गण्डा ॥ खंडित रघुपति खंडित रावन । खंडित कृष्ण वीर बलि बावन ॥ खंडित धरती पवन अकासा । खंडित चाँद सूरज कैलासा ॥ खंडित जहँ लगि सकल पसारा । खण्ड अखण्ड कवीर पुकारा ॥ ३ ॥
मंगल रूप आरती साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥ निसि बासर जहँ सूरज न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करे अनन्दा ॥ अच्छे वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रकास अमृत फल पाया ॥ जरा मरनकी संशय मेटो । सुरति संतापन सतगुरु भेटो ॥ तन मन
(३०८)
कवीरपंथी-
धन जिन्ह अरपन कीन्हा । परम पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ कहै कवीर हिरम्बर होय । निरख नाम निज चीन्हे सोय ॥ ४ ॥
आरती सत कवीर तुम्हारी । दया करो जाऊँ बलिहारी ॥ पहली आरति पुहुमी आये । काशी प्रगटे दास कहाये ॥ दूसर आरति देवल थपायो । आसा रोपि समुद्र हटायो ॥ तीसर आरति चरण जल दारे । हरिके पंडा जरते उबारे ॥ चौथी आरति तुरतहि घाये । तोर जंजीर तीर ले आये ॥ पांचे आरति बलख सिधाये । चौरासी सिधके बन्ध छुडाये ॥ छठई आरति अविगती धारे । मुखदासो जिन्दा कर दारे ॥ सतयें आरति पीर कहाये । मगहर आमी नदी बहाये ॥ आठे आरति मंडल सिधाये । जन ज्ञानीको संशय मिटाये ॥ कहैं लगि कहौं वरनि नहिं जाय । धर्मदास आरती सच पाय ॥ ५ ॥
आरती कीजे बन्दीछोर समरत्यकी । चरन शरन सतनाम पुरुषकी ॥ आरती कर पुहमी पग धारे । सतयुगमें सतनाम पुकारे ॥ आरति कर मुख मंगल गाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥ कर आरति जग पंथ चलाये । द्वापरमें करुनामय कहलाये ॥ आरति युग २ बांधे आशा । कल्युग केवल नाम प्रकाशा ॥ चारों युग धरे प्रगट शरीरा । आरति गावें बन्दीछोर कवीरा ॥ ६ ॥
आरती करहिं धनि धर्मदासा । पांच तत्त्व मुख भेद प्रकाशा ॥ प्रथमहिं वायु तेज है पानी । रहत अकास निरंतर जानी ॥ गगन वायु गरजे असमाना । निज घर नित्य ध्वजा फहराना ॥ कोट ब्रह्मा जहाँ कथे पुराना । कोट रुद्र जहाँ धरहीं ध्याना ॥ कोट विष्णु बिन्वे कर जोरी । औरहु देव तेतीस करोरी ॥ शेष सहसमुख निशि दिन गावे । स्तुति करे पार नहिं पावे ॥ जो गुरु मिले तो
शब्दावली
(३०९)
भेद बतावे । पांच तत्त्व सुख भेद लखावे ॥ कहै कवीर हंसा पतियाय । धर्मदास आरती सखुपाय ॥ ७ ॥
ऐसी आरती देउँ लखाई । निरखत अघर ज्योति फैलाई ॥ गहु निरच्छर गहु निज डोरी । धरमरायसो तितुका तोरी ॥ जुग बाँधो निरखो टकसारा । जासै उत्तरो भवजल पारा ॥ कोट जनमको कर्म कटाये । चौदह काल जीत घर आये ॥ हीरा कोटि होय परकाशा । विना सुगंध पुहुपकी बासा ॥ चन्द्र लगन गहि करो प्रकाशा । चौदह यम तब माने त्रासा ॥ धरती धर्मनि उदित अकाशा । जापर सूरज करे प्रकाशा ॥ कहै कवीर सुनो धर्मदासा । जम जालिम माने त्रासा ॥ ८ ॥
आरति नाम निरन्तर भावे । तेतीसो मिलि मंगल गावे ॥ चितकर थार ज्योति जिव गाजे । शब्द अनाहद झालर बाजे ॥ घटहीमें यंत्र बजावइ बाजा । सतगुरु मिले भय सब भाजा ॥ बिन करताल पखावज बाजे । श्वेत सिंघासन छत्र विराजे ॥ कर सनमान जीव भये आगे । (साहेब) कवीर गुरुके चरनन लागे ॥ ९ ॥
आरति सतनामकी कीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ अग्रकी थाल अन्नपम बाती । ज्योति प्रकाश बरे दिन राती ॥ सुरली ध्वनि अन्नपम बाजे । शब्द अनाहद धुन तहाँ गाजे ॥ त्रिकुटी संगम झलके हीरा । चरन कमल चित राखु शरीरा ॥ सतसुकृत आरति चित दीजै । तन मन धनहि निछावर कीजै ॥ १० ॥
जाघर आरति दास करत हैं । जनम जनमको पाप हरत हैं ॥ कदलीदल पुहुपके द्वारा । सतसुकृत जाघर पग धारा ॥ परिमल अग्र गुलाल सुवासा । जा घर हंस करे सुखवासा ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । सप्त सिंघासन छत्र विराजे ॥ नाम एकोतर सुमिरे जबहीं । सतगुरु बैठ सिंहासन तबहीं । तत्वमता नरियर प्रवाना ।
(३१०)
कबीरपंथी—
सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर मोरत बास उड़ाई ॥ पल एक साहेब विलमैं आई ॥ सतगुरु दया प्रगट जब होई । पाय प्रसाद महाफल सोई ॥ महा प्रसाद तत्त्व विधि पावे । कहैं कवीर सतलोक सिधावे ॥ ११ ॥
मंगलरूप आरति होई । शब्द सुरति चित राखु समोई ॥ दीप अमोल अगम उजियारा । सन्त पुरुष कीन्हो विस्तारा ॥ हंस हिरम्बर शब्द समाई । वृक्ष गुरुम्बर बैठक पाई ॥ शीतल नीर सुरति भर लावे । हंस सोहंगम चौर डुरावे ॥ मणि माणिक हंसनकी पांती । शब्द स्वरूप सुरतिकी कांती ॥ हंस मुजन जन आज्ञाकारी । हंसन काज देह निज धारी ॥ मन बच कर्म जो आरति साजे । कहै कवीर सतलोक विराजे ॥ १२ ॥
आरति सतगुरु साहेब कवीर बंदी छोरकी । करत किलोल हंस पति आगर आनंद विमल विनोदकी ॥ त्रिगुन तेल पंच मुख बाती मानिक ज्योति अपार । हीरन धार संजोय सकल विधि पूरन नाम अधार ॥ संगति सकल सुकृत भये ठाढे कहत संदेश अपार । जाकी सुरति भई तन व्याकुल अति आतुर दीदार ॥ बाजत ताल मृदंग झालरी वीना शब्द रसाल । धुधुक धुधुक जहाँ तुरही बाजे गरजत शब्द विशाल ॥ पूरण पुरुष सिघासन राजे बहु शोभा इस्थीर । धर्मदास आरति कर जारे गावहिँ साहब कवीर । ॥ १३ ॥
आरति निज नाम तुम्हारी । अविगति अगम अलेख मुरारी ॥ पहली आरति पियाजीको पाये । रोम रोममें अलख लखाये ॥२॥ दुसरी आरति दुतिया नहीं कोई । जहाँ देखो तहाँ हरिहरि होई ॥३॥ तिसरी आरती त्रिगुण नाई । चौथे पदमें रहे समाई ॥४॥ चौथी आरति चहुँ दिशि भरपूर । गगन मंडल बाजे अनहद तूर
शब्दावली
(३१२)
॥६॥ पंचयै आरति पूरन प्यार । कहहिँ कवीर सो सबसे न्यार ॥ १४॥
संज्ञा आरति सुमिरण सोई । सुमिरण करत महाफल होई ॥ १॥
पहिली आरती प्रेम प्रकाशा । कर्म भर्म सब कीन्ह विनाशा ॥ २॥
दूसरी आरति दिलहीमें देवा । योग मुक्तिसे करले सेवा ॥ ३ ॥
तीसरी आरति त्रिभुवन सूझे । गुरुगमज्ञान अगोचर बूझे ॥ ४ ॥
चौथी आरति चहुँयुग पूजा । गुरु सम देव और नहीं दूजा ॥ ५॥
पंचयै आरति पद निरबाना । कहहीं कवीर (हंसा) लोकसमाना १६॥
आरती परम पुरुष निजदेवा । अनन्त कोटि जहां लावहिँ सेवा १
ओंकार चंटाधुनि बाजे सतगुण विष्णु आरती साजे ॥ २॥ शेष
महीकर कीन्हों भारा । सूर असखन ज्योति अपारा ॥ ३॥ शिव
सनकादिक मुनि ऋषि सारै । स्तुति ब्रह्मा वेद उचारे ॥ ४॥ ध्रुव
ग्रहलाद चैवर लिये ढारे । धूप दीप गणपति बिस्तारे ॥ ५॥ वरुण
इन्द्र पुहुपनकी माला । नाना रूप अनंत विशाला ॥ ६॥ व्यास
वसिष्ठ कपिल सत धारी । विविधि विधान सब साज सँवारी ॥ ७॥
शुकदेव नारद वेनु बजावैं । साहेब कवीर आरति गावैं ॥ १६ ॥
ऐसी आरति घुरै निसाना । सुनहु चितदै सन्त सुजाना ॥ १॥
जिह्वा वचन झूठ मति भाखो । सत्य शब्दमें चित दे राखो ॥ २॥
परधन त्यागो और पर नारी । शब्द अनाहद लेहु विचारी ॥ ३॥
काम क्रोध छाडो यह क्षण । हंस दशा धरि होहु सुलक्षण ॥ ४॥
तन मनसे परचे करु भाई । बिन परचे यम हाथ बिकार्ई ॥ ५॥
छाड़हु दूर दुरकेर बसेरा । उल्टा मिलै सो हंस हैं मेरा ॥ ६॥ पक्ष
वेष तजो चतुराई । सतसुकृत तब होहि सहाई ॥ ७ ॥ आशा
तृष्णा तजहु विकारा । सो ज्ञानी कहिये तत सारा ॥ ८ ॥ संत
विवेकी शीतल अंगा । अगर वास जस चन्दन संगा ॥ ९॥ प्रेम
प्रकाश भक्ति लौलीना । निर्मल हीरा न कबहुँ मलीना ॥ १० ॥
(३१२)
कवीरपंथी—
निर्मल सो जेहि संशय नाहीं । आपा मध्ये आप समाहीं ॥११॥ कहहि कवीर संतन सुखदाई । अजर अमर इस्थिर घर पाई १२ ॥१७॥
ऐसी आरती गुरुहिं लखायी । निरखत शब्द सुरति ठहरायी ॥१॥ ऐसी आरति आतम पोर । आगे पला न पकडे चोर ॥२॥ गहो शब्द निहन्छर डोडी । धरमरायसे तिनका तोडी ॥३॥ तन धरती चित लग्यो अकासा । विना पुहुप सुगंध निवासा ॥४॥ उलटि अगोचर अमीरस चाखे । दरिया पार सुरति ले राखे ॥५॥ अनन्त जनमकी उगझ मिटावे । चौदह काल जीति घर आवे ॥ ॥६॥ कहहि कवीर भाग नर तेरा । सतगुरु किये अमर पुर देरा ॥७॥ १८ ॥
कैसे मैं आरति करौं तुम्हारी । महा मलिन साहब देह हमारी ॥१॥ छूतहिसे उपजे संसारा । मैं छुतिया गुनगाउँ तुम्हारा ॥२॥ झरना झरे दशो दिशि द्वारा । कैसे मैं आऊँ साहब निकट तुम्हारा ॥३॥ जो प्रभु देउ अग्रकी देही । तब हम पायब (साहेब) नाम सनेही ॥४॥ मलयागिरि पर बसे भुवंगा । विष अमृत रह एकै संगा ॥५॥ तिनुका तोडि दियो प्रवाना । तब पाये (साहेब) पद निर्वाना ॥६॥ धनि धर्मदास कविर वल गाजे । गुरु प्रताप आरती साजे ॥ ॥७॥ २ ॥ १९ ॥
आरती सतगुरु करौं तुम्हारी । कलह कल्पना हरहु हमारी ॥१॥ पहिले पुरुष पीछे भौ नारी । तेहि पाछे तिहुँ लोक सँवारी ॥२॥ जो नारी सो अंग छुवावे । सो चौरासीमें भर्मावे ॥३॥ जो नारी सो न्यारा रहैं । ज्ञान ध्यान योग सब दहैं ॥४॥ साहेब कवीर कहे समझाई । आपन आपनि निवेरहु भाई ॥५॥ २० ॥
सिरपर राखिय सोई परमगुरुदेवा ।
सुमिरन भजन आरति पूजा, सन्मुख करले सेवा ॥१॥ भव नदिया बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । बनसे भी ऊपर ले राखे, घटहीमें निज सार ॥२॥ मान सरोवर मंजन करिले, त्रिवेनीके
शब्दावली
(३१३)
घाट । अनहद धुनि सुनि पाँचो मोहे, खुलिये ज्ञान कपाट ॥३॥ अजपा जाप जपे विनु जिभ्या, मूल मंत्र अवराधि । स्थिर ध्यान हठ आसन लागे, सहज समाधि ॥ ४ ॥ चांद सूर निसि वासर नहीं, नहिं तहां विद्यावेद । साहेब कवीर मिले सुखसागर, विरला पावे भेद ॥ ५ ॥ २१ ॥
आरति कीजे आतम पूजा । प्राण पुरुष सो अवर न दूजा ॥१॥ ज्ञान प्रकाश दीप उजियारा । घट घट देखो प्रान पियारा ॥२॥ भाव भक्ति कर और न भेवा । दया स्वरूपी करिले सेवा ॥ ३ ॥ सत संगति मिलि शब्द विराजे । धोखा द्रंद भर्म सब भाजे ॥४॥ काया नगर थिर होय भाई । आनन्द रूप सकल सुखदाई ॥५॥ शून्य ध्यान सबके मनमाना । तुम बैठो आतम अस्थाना ॥६॥ शब्द सुरति ले हृदय बसाओ । कपट क्रोधको दूर बहाओ ॥७॥ कहहि कवीर जिन रहनि सम्हारी । सदा आनंद रहते नर नारी ॥८॥ २२
सत स्वरूपकी आरति कीजे । साहब चीन्हि चरण चित दीजे ॥१॥ चिन्हों चिन्हों मन चित लाई । बिन चिन्हे कह जाओ भाई ॥२॥ जिह्व चिह्न तिन निर्मल अंगा । बिन चिह्न ते भये पतंगा ॥३॥ जब लग साहेब सो नहिं भेंटा । तब लग भाव भक्ति सब हेटा ॥४॥ शून्य सेज आरति करई । विबा कन्त का पूरी परई ॥ ५ ॥ भूषण पहिरो रूपकी रासी । फूलन सेज महलमें प्यासी ॥ ६ ॥ आरति लिये कन्तको जागे । पति विनु प्रेम कहो केहि लागे ॥७॥ केतिक पंडित मुनिजन योगी । केतिक नागे भक्त वियोगी ॥८॥ झूने झूने बहुत जमाती । बिन दुलहेकी कवन बराती ॥ ९ ॥ खोजो गगन शून्य ब्रह्मंडा । सात द्वीप पृथ्वी नव खंडा ॥ १० ॥ ग्रह माया तजि भये दिवाना । आप अपन पौ मर्म न जाना ॥११॥ जिनिके दूसर असरा नहीं । आपामध्ये आपहिं आहीं ॥१२॥ चेत चेत संशय कर दूरी । घटही माहिं संजीवन मूरी ॥ १३ ॥ साँचे सतगुरुकी बलिहारी । जिन यह कुंजी कुलफ उघारी ॥१४॥
(३१४)
कवीरपंथी—
नख सिखते पूरण भरपूरी । ते साहबको कहिये दूरी ॥ १६ ॥ निरखि निरखि अमृतरस पीजै । तन मन शीश सब अपैण कीजे १६ ॥ दिल दरियामें है हिरामनी । काया कवीर बोलता धनी ॥ १७ ॥ लौकी वाती पवनसे बारी । दीपक ज्ञान शब्द उजियारी ॥ १८ ॥ कहहिं कवीर यह ख्याल हमारी । बिनु समुझन हम सबते न्यारी ॥ १९ ॥ २३ ॥
आरति कीजै अन्न ब्रह्मकी । सकल कला सुख प्रान पतिकी ॥ १ ॥ धनि धनि अन्न धनि धनि पानी । अन्नकी भक्ति नारायण ठानी ॥ २ ॥ अन्न भयो गिरधरही ध्यान । अन्नमें बसे सबहिके प्रान ॥ ३ ॥ अन्न अहेरी पुरवे जाला । अन्नहिं जिआवे अन्नहिं काला ॥ ४ ॥ अन्नहिं गाया अन्नहिं गावे । अन्न बिना सुख बात न आवे ॥ ५ ॥ अन्न भक्ति ले कीजै कामा । ( कहत कवीर ) तबहीं रीझे आतमरामा ॥ ६ ॥ २४ ॥
आरती अन्न देव तुम्हारी । जाते काया पले हमारी ॥ १ ॥ जलकी उत्पति यह संसारी । भोजन करे सकल नर नारी ॥ २ ॥ ब्रह्मा विष्णु और महादेवा । यह सब करे अन्नकी सेवा ॥ ३ ॥ राजा प्रजा और मठधारी । ये सब आशा जिये तुम्हारी ॥ ४ ॥ पीर औलिया अजमत धारी । सुर नर मुनि सब अन्न अहारी ॥ ५ ॥ अन्न बनावे अन्न भुलावे । अन्न बिना सुख बात न आवे ॥ ६ ॥ अन्न अहारी पूर्व जियाला । अन्न जिआवे अन्नही काला ॥ ७ ॥ जहां जहां लागी अन्नकी ढेरी । सुर नर मुनि सब बैठे घेरी ॥ ८ ॥ दयाकी दीप भावकी वाती । सब अन्नको आरति साती ॥ ९ ॥ अन्न आरति आतम पूजा । कहहिं कवीर देव नहिं दूजा ॥ १० ॥ २५ ॥
साखी—अन्न नाम निज मूल है, सोई हमारा कीन्ह ।
एक अन्नको वीछुरे, कोइ न काहू चीन्ह ॥ १ ॥
आरती दर्शन समाप्त ॥
सत्यनाम १
आवश्यक विज्ञप्ति
(चौका विधानके दूसरे भागके विषयमें)
अब तक जो चौका विधानकी रमैनी आदिक आयो हैं वह छत्तीसगढ़-वालोंके क्रमसे; यथार्थमें यह विधान पूरा नहीं है, क्योंकि, छत्तीसगढ़ी गुरुवाई करनेवालोंने, चौका आदि धार्मिक सब कार्योंको अपने जीवन निर्वाहिका मार्ग बना रक्खा है, इस प्रकार धर्मके जितने नियम हैं व्यापारके रूपमें प्रवर्तित हो गये हैं । यही कारण है कि, चौका करनेको सभी तय्यार रहते हैं, किन्तु, चौका क्या वस्तु है ? इससे क्या लाभ है ? इसके करने कराने वालोंको चौकेसे क्या बोध होना चाहिये ? नारियल और पानकी प्रधानता कबीर पंथमें क्यों है ? इत्यादि धर्मके एक भेदकी भी खबर उनको नहीं है । चौका करनेवाले लोग तो समझते हैं चलो मेरा काम हो गया, चौका करनेसे कुछ न कुछ तो मिलही गया और चौका करानेवाले चौकाके महात्मको सुनकर समझते हैं चौका करालेनेसेही मेरा सब पातक दूर हो जायगा—इससे जैसे तैसे करके घरम जोत बरवा देनाही वह अपना महान कार्य समझते हैं, इसीसे देने लेनेमें वह भी अपनी शक्तिभर कोर कसर करनेमें नहीं चूकते । इसका परिणाम—
गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेलेँ दाब ।
दोऊ बूढे बापुरे, चढ़ि पाथरकी नाव ॥
कै—अनुसार गुरु अलग शिष्यकी निन्दा करता है कि, इसने कुछ दिया-नहीं ? शिष्य अलग कहता है कि, महंत बड़ा लोभी है, इसने बड़ा हैरान किया । यह नित्यकी बातें हैं यह नित्य देखनेमें आती हैं और जो लोग धर्मको धर्मको रूपसे देखते हैं, वह धर्मके नियमोंको पूर्ण रूपसे पालन करनेका प्रयत्न करते हैं ।
इन्हों सब बातोंको विचारकर, मैंने इसके आगे चौका विधानके पूरे पूरे रमैनी पद आदि देदिया है, जिसमें पूरा विधान चाहने वालोंको पछताना न पड़े, और इस शब्दावली को भी दूसरी शब्दावलियोंके समान अधूरो न समझलें ।
इसके आगे जो चौका विधानके पद आदि लिखे जाते हैं वे रोसडा— के मुहल्ला लक्ष्मीपुर बगीचाके कबीर मन्दिर के चौका विधानका है । यों तो भारत-वर्षही क्या पृथ्वीके प्रत्येक भागोंमें कबीरपंथियोंका स्थान है और बड़े बड़े धनी मानी महंतोंके बड़े २ स्थान वर्तमान हैं किन्तु, मेरी जानमें इस समय रोसडाके लक्ष्मीपुर बगीचेका स्थान कबीरपंथके आदर्श स्थानोंमें सर्वश्रेष्ठपद भोग रहा
( ३१६ )
कबीरपंथी—
है। पूर्व विहार आदिमें भी सब स्थानके बडे महंत सन्त लोग उस स्थानकी प्रतिष्ठा करते हैं।
वहाँके प्रधान महंत साहब श्री १०८ श्री महंत काशीदासजी साहब ब्राह्मणोंकी सर्वोच्च कान्यकुब्ज शाखामें जन्म लेकर भी, इतने निरभिमान और जात पातके भ्रमसे रहित हैं कि, कोई भी मनुष्य उनके दर्शन कर और उनसे मिलकर, लेशमात्र भी भेद भाव अनुभव नहीं करता। इसका यह आशय नहीं है कि, आप मर्यादाका उलंघन कर कूड़ापंथी चलाते हैं और हिन्दू जातिकी मर्यादाको त्यागकर सबको एकमें मिलाते हैं और सबका खान पान एक कर, देते हैं, नहीं! कदापि नहीं, किन्तु आपके—मर्यादापालनेमें बडे दृढ़ होनेपर भी, आपके शीलस्वभाव दया वृत्ति और सच्चे प्रेमके कारणही जो आपके समझ आता है, वह आपकी आज्ञा और आचार विचारको ग्रहण करना अपने श्रेयका कारण, समझता है। आपके स्थानसे निकले हुए सैकड़ों स्थान हैं, जिनमें सर्व जाति और बरणके महंत संत अपने अपने धर्म तथा व्यवहारकी मर्यादामें रहकर देशकाल वस्तुका विचार रखते हुए, अपना और संसारका कल्याण कर रहे हैं। कहाँ तक कहूँ!! आपके इन्हीं सब गुणोंपर मोहित होकर, सलोनीके मेलेंमें पं० श्रीदयानाम साहबके न आनेपर, सर्व सन्त महंतोंने आपहीको सभाका सभापति चुनकर सभाके कार्यको निर्विघ्न समाप्त किया था। जिसपर उस सभामें जानेवाले सर्व सन्त महंत सेवक सतियोंके साथ पं श्री दयानाम साहब आप पर भी बहुत नाराज हो गये थे। किन्तु ऐसा होने पर भी, आपके धर्म भाव, सौजन्यता, कार्यकुशलता, दृढ़ता आदि गुणोंके कारण आपकी इच्छा न रहते हुए भी पं० श्री दयानाम साहबनेही बडे आग्रह से आपको बुलाकर, अपने प्रधान दीवानका पद दे दिया था। अब जब कि, पं० श्री दयानाम साहब सत्यलोक सिधार गये हैं, तब कोदरमालके कबीर पंथी महासभामें, जहाँ एक लाखसे भी अधिक सन्त महंत सेवक सती इकट्ठे हुए थे, सबको सम्मतिसे आपही वंश गद्दीके अधिकारी चुने गये हैं। आपको इस बड़ाईको इच्छा न रहनेपर भी, सर्व वेषोंका कहना मानकर अनेक कठिनाइयों और अडचनोंसे पूर्ण इस पदको आपने स्वीकारकर लिया।
इस प्रकार आचार्य स्थानीय पद पाकर भी आप इतने निर्मान और निर्मोह हैं कि, इस पद तककी भी ममता आपको नहीं है, केवल धर्म समझकरही आप अपना कर्तव्य करते चले जाते हैं।
शब्दावली
( ३१७ )
इस पदपर आनेके कितने पहलेही, निवृत्तिमें सत्संग और विचार परायण रहने और आगेके लिये स्थानको सुरक्षित रखनेके हेतु, कुल जायदाद सहित स्थानको आपने कवीर साहबके नामसे समर्पण) करके, रजिष्ट्री करा दी है और स्थानपर पश्चात्के लिये ट्रस्ट्री (पंच) नियत कर दिया है तथा व्यवहारके भारसे अवकाशके लिये, अपने समझही महंत श्रीअवधदासजीको अपना उत्तराधिकारी बना दिया है ।
श्रीमहंत अवधदासजी साहब भी, योग्य गुरुके योग्य शिष्यके समान, अपने पदका कर्तव्य पूर्णरूपसे निबाह रहे हैं। आपको सहायक भी बैसेही योग्य मिले हैं ।
स्थानके समुचित प्रबन्धमें जिन लोगोंके हाथ हैं और जिनकी सज्जनता और सुप्रबन्धसे स्थान अपनी मर्यादाकी रक्षा करके आदर्शस्थान बना हुआ है उनमेंसे —
(१) पहले श्रीमान् मॅनेजर साहब श्री सूर्यदासजी साहब हैं । आप बहुत दिनोंसे स्थानके मॅनेजर रहे हैं और इस समय वृद्ध होकर एक प्रकारसे अवकाश ग्रणह करनेपर भी, आवश्यकता होनेपर सब कामोंको देखते और उनका प्रबन्ध करते हैं । आप पूर्ण अनुभवी वैद्यराज्य हैं, आपके पास रससे लेकर साधारण काष्ठादि तककी अनेक औषधियाँ सदा तय्यार रहती हैं, स्थानकी मूर्तियोंके तो आप प्राणदाताके समानही हैं, बाहरके भी अनेक दुखियोंके दुःख दूर करनेमें आप सदा तत्पर रहते हैं ।
(२) दूसरे खजांची नत्यूदासजी साहब हैं । आपका काम स्थानकी कुल नकदी जिन्सी आमदनीका सुप्रबन्ध करना, जमीनदारी सम्बन्धीभामला मुकद्दमाकी खबरगोरी करना खेती बाड़ी आदिका प्रबंध करना इत्यादि हैं, आपकी प्रमाणिकता इतनी बड़ी हुई है कि, सब ओरसे सब लोग द्रव्यादि लाकर आपको देते हैं, परन्तु आपके हिसाब देनेको सदा तय्यार रहनेपर भी, कोई हिसाब नहीं पूछता क्योंकि, आपके व्यवहारने सबको निश्चय दिला दिया है कि, इन्होंने अपनेको पूर्ण रूपसे कवीर साहबके अर्पण कर दिया है, शील और सदाचारकी आप मूर्ति हैं साथही स्थानकी मर्यादा रक्षाके लिये आपमें स्वाभिमान और आत्म प्रतिष्ठाकी कमी नहीं है इत्यादि ।
(३) तीसरे श्रीयुत परमहंस भित्तादासजी साहब अधिकारी हैं । आपने सर्व प्रकारके मान अभिमानके त्याग पूर्वक, भेदभाव रहित सर्वप्रकारके जीवोंकी
(३१८)
कवीरपंथी—
सेवा करना अपना आदर्श बना रखखा है। आपकी इस वृत्तिकाही प्रभाव है कि, सब मतके लोग आपसे प्रसन्न रहते हैं, ऐसा होते हुए भी आप सत्यका त्यागकर किसीकी झूठी खुशामद कभी नहीं करते। दुखियोंकी, तन मन धनसे, सेवा करना आपका स्वभावही है।
(४) चौथे श्रीगोपीदासजी अधिकारी हैं, जिन्होंने स्थानकी खेती बाड़ी काशतकारीकी देखरेख सब अपने जिम्मे ले रखा है।
(५) पांचवें भंडारी सौखी दासजी हैं, जिन्हें सदा सर्वदा दुखी जीवोंके लिये, अपने मुखका त्याग करना कोई कठिन बात नहीं दीख, पड़ती आप बड़े श्रीमहंत साहबके खास भंडारी और शिष्य हैं। इसी प्रकार भंडारी नेभूदासजी भंडारी जगादासजी कोठारी रामअधीन दासजी, रामधनीदासजी, झड़ी, दासजी, अनूपदासजी इत्यादि सर्व संत दया और प्रेमकी मूर्ति, द्वेष और भ्रमतासे रहित, सदा परोपकाररत रहनेवाले, स्थानकी मर्यादा बना रखनेमें सचेत रहते हैं।
श्रीयुत महंत चंचल दासजी, गोविन्ददासजी, भौजनदासजी, खाकीजी इत्यादि सङ्गीत द्वारा स्थानकी शोभारूप हैं।
श्रीयुत गंगादासजीको सद्गुरुकी वाणीसे इतना प्रेम है कि, आप सदा-वाणीकीही खोजमें लगे रहते हैं, आपहीके वाणी प्रेमकी प्रत्यक्ष मूर्ति गंगाशब्दावली है, जिसमेंसे लक्ष्मीपुर (रोसडा) के कवीरमन्दिरके चौकाविधानकी रमैनी पद आदि लिये गये हैं॥
इसके अतिरिक्त स्थानमें रहनेपर उससे सम्बन्ध रखनेवाले जितने व्यक्ति हैं सबमें सज्जनता कूट कूटकर भरी है, सब सदा सर्वदा अपने ऊपर कष्ट उठाकर भी दूसरोंको मुख देनेमें तय्यार रहते हैं और तो विद्यार्थी रामजी जो स्थानमेंही रहता और स्थानकी सेवा टहल करता हुआ, विद्या अध्ययन कर रहा है, साधुओंकी संगतिमें रहता हुआ ऐसे सरल स्वभावका हो गया है कि, कभी किसीकी अवज्ञा करना जानताही नहीं, जिसने जहां जिस कामके लिये पुकारा रामजी वहाँ रामजीके समान हाजिर मिलेगा। अंतमें —
श्रीरामरूपदासजीको लीजिये; आप बड़े महंत साहब या यों कहिये कि, वंशगद्दीके आचार्य स्थानापन्न धार्मिक कर्मोंके सम्पादन करनेवाले कवीर साहबके अधिकारी श्री १०८ युक्त पंथी महंत काशी दासजी साहबके परम प्रिय शिष्य