कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यनाम १
आवश्यक विज्ञप्ति
(चौका विधानके दूसरे भागके विषयमें)
अब तक जो चौका विधानकी रमैनी आदिक आयो हैं वह छत्तीसगढ़-वालोंके क्रमसे; यथार्थमें यह विधान पूरा नहीं है, क्योंकि, छत्तीसगढ़ी गुरुवाई करनेवालोंने, चौका आदि धार्मिक सब कार्योंको अपने जीवन निर्वाहिका मार्ग बना रक्खा है, इस प्रकार धर्मके जितने नियम हैं व्यापारके रूपमें प्रवर्तित हो गये हैं । यही कारण है कि, चौका करनेको सभी तय्यार रहते हैं, किन्तु, चौका क्या वस्तु है ? इससे क्या लाभ है ? इसके करने कराने वालोंको चौकेसे क्या बोध होना चाहिये ? नारियल और पानकी प्रधानता कबीर पंथमें क्यों है ? इत्यादि धर्मके एक भेदकी भी खबर उनको नहीं है । चौका करनेवाले लोग तो समझते हैं चलो मेरा काम हो गया, चौका करनेसे कुछ न कुछ तो मिलही गया और चौका करानेवाले चौकाके महात्मको सुनकर समझते हैं चौका करालेनेसेही मेरा सब पातक दूर हो जायगा—इससे जैसे तैसे करके घरम जोत बरवा देनाही वह अपना महान कार्य समझते हैं, इसीसे देने लेनेमें वह भी अपनी शक्तिभर कोर कसर करनेमें नहीं चूकते । इसका परिणाम—
गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेलेँ दाब ।
दोऊ बूढे बापुरे, चढ़ि पाथरकी नाव ॥
कै—अनुसार गुरु अलग शिष्यकी निन्दा करता है कि, इसने कुछ दिया-नहीं ? शिष्य अलग कहता है कि, महंत बड़ा लोभी है, इसने बड़ा हैरान किया । यह नित्यकी बातें हैं यह नित्य देखनेमें आती हैं और जो लोग धर्मको धर्मको रूपसे देखते हैं, वह धर्मके नियमोंको पूर्ण रूपसे पालन करनेका प्रयत्न करते हैं ।
इन्हों सब बातोंको विचारकर, मैंने इसके आगे चौका विधानके पूरे पूरे रमैनी पद आदि देदिया है, जिसमें पूरा विधान चाहने वालोंको पछताना न पड़े, और इस शब्दावली को भी दूसरी शब्दावलियोंके समान अधूरो न समझलें ।
इसके आगे जो चौका विधानके पद आदि लिखे जाते हैं वे रोसडा— के मुहल्ला लक्ष्मीपुर बगीचाके कबीर मन्दिर के चौका विधानका है । यों तो भारत-वर्षही क्या पृथ्वीके प्रत्येक भागोंमें कबीरपंथियोंका स्थान है और बड़े बड़े धनी मानी महंतोंके बड़े २ स्थान वर्तमान हैं किन्तु, मेरी जानमें इस समय रोसडाके लक्ष्मीपुर बगीचेका स्थान कबीरपंथके आदर्श स्थानोंमें सर्वश्रेष्ठपद भोग रहा