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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

है। पूर्व विहार आदिमें भी सब स्थानके बडे महंत सन्त लोग उस स्थानकी प्रतिष्ठा करते हैं।

वहाँके प्रधान महंत साहब श्री १०८ श्री महंत काशीदासजी साहब ब्राह्मणोंकी सर्वोच्च कान्यकुब्ज शाखामें जन्म लेकर भी, इतने निरभिमान और जात पातके भ्रमसे रहित हैं कि, कोई भी मनुष्य उनके दर्शन कर और उनसे मिलकर, लेशमात्र भी भेद भाव अनुभव नहीं करता। इसका यह आशय नहीं है कि, आप मर्यादाका उलंघन कर कूड़ापंथी चलाते हैं और हिन्दू जातिकी मर्यादाको त्यागकर सबको एकमें मिलाते हैं और सबका खान पान एक कर, देते हैं, नहीं! कदापि नहीं, किन्तु आपके—मर्यादापालनेमें बडे दृढ़ होनेपर भी, आपके शीलस्वभाव दया वृत्ति और सच्चे प्रेमके कारणही जो आपके समझ आता है, वह आपकी आज्ञा और आचार विचारको ग्रहण करना अपने श्रेयका कारण, समझता है। आपके स्थानसे निकले हुए सैकड़ों स्थान हैं, जिनमें सर्व जाति और बरणके महंत संत अपने अपने धर्म तथा व्यवहारकी मर्यादामें रहकर देशकाल वस्तुका विचार रखते हुए, अपना और संसारका कल्याण कर रहे हैं। कहाँ तक कहूँ!! आपके इन्हीं सब गुणोंपर मोहित होकर, सलोनीके मेलेंमें पं० श्रीदयानाम साहबके न आनेपर, सर्व सन्त महंतोंने आपहीको सभाका सभापति चुनकर सभाके कार्यको निर्विघ्न समाप्त किया था। जिसपर उस सभामें जानेवाले सर्व सन्त महंत सेवक सतियोंके साथ पं श्री दयानाम साहब आप पर भी बहुत नाराज हो गये थे। किन्तु ऐसा होने पर भी, आपके धर्म भाव, सौजन्यता, कार्यकुशलता, दृढ़ता आदि गुणोंके कारण आपकी इच्छा न रहते हुए भी पं० श्री दयानाम साहबनेही बडे आग्रह से आपको बुलाकर, अपने प्रधान दीवानका पद दे दिया था। अब जब कि, पं० श्री दयानाम साहब सत्यलोक सिधार गये हैं, तब कोदरमालके कबीर पंथी महासभामें, जहाँ एक लाखसे भी अधिक सन्त महंत सेवक सती इकट्ठे हुए थे, सबको सम्मतिसे आपही वंश गद्दीके अधिकारी चुने गये हैं। आपको इस बड़ाईको इच्छा न रहनेपर भी, सर्व वेषोंका कहना मानकर अनेक कठिनाइयों और अडचनोंसे पूर्ण इस पदको आपने स्वीकारकर लिया।

इस प्रकार आचार्य स्थानीय पद पाकर भी आप इतने निर्मान और निर्मोह हैं कि, इस पद तककी भी ममता आपको नहीं है, केवल धर्म समझकरही आप अपना कर्तव्य करते चले जाते हैं।