कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
( ३१६ )
कबीरपंथी—
है। पूर्व विहार आदिमें भी सब स्थानके बडे महंत सन्त लोग उस स्थानकी प्रतिष्ठा करते हैं।
वहाँके प्रधान महंत साहब श्री १०८ श्री महंत काशीदासजी साहब ब्राह्मणोंकी सर्वोच्च कान्यकुब्ज शाखामें जन्म लेकर भी, इतने निरभिमान और जात पातके भ्रमसे रहित हैं कि, कोई भी मनुष्य उनके दर्शन कर और उनसे मिलकर, लेशमात्र भी भेद भाव अनुभव नहीं करता। इसका यह आशय नहीं है कि, आप मर्यादाका उलंघन कर कूड़ापंथी चलाते हैं और हिन्दू जातिकी मर्यादाको त्यागकर सबको एकमें मिलाते हैं और सबका खान पान एक कर, देते हैं, नहीं! कदापि नहीं, किन्तु आपके—मर्यादापालनेमें बडे दृढ़ होनेपर भी, आपके शीलस्वभाव दया वृत्ति और सच्चे प्रेमके कारणही जो आपके समझ आता है, वह आपकी आज्ञा और आचार विचारको ग्रहण करना अपने श्रेयका कारण, समझता है। आपके स्थानसे निकले हुए सैकड़ों स्थान हैं, जिनमें सर्व जाति और बरणके महंत संत अपने अपने धर्म तथा व्यवहारकी मर्यादामें रहकर देशकाल वस्तुका विचार रखते हुए, अपना और संसारका कल्याण कर रहे हैं। कहाँ तक कहूँ!! आपके इन्हीं सब गुणोंपर मोहित होकर, सलोनीके मेलेंमें पं० श्रीदयानाम साहबके न आनेपर, सर्व सन्त महंतोंने आपहीको सभाका सभापति चुनकर सभाके कार्यको निर्विघ्न समाप्त किया था। जिसपर उस सभामें जानेवाले सर्व सन्त महंत सेवक सतियोंके साथ पं श्री दयानाम साहब आप पर भी बहुत नाराज हो गये थे। किन्तु ऐसा होने पर भी, आपके धर्म भाव, सौजन्यता, कार्यकुशलता, दृढ़ता आदि गुणोंके कारण आपकी इच्छा न रहते हुए भी पं० श्री दयानाम साहबनेही बडे आग्रह से आपको बुलाकर, अपने प्रधान दीवानका पद दे दिया था। अब जब कि, पं० श्री दयानाम साहब सत्यलोक सिधार गये हैं, तब कोदरमालके कबीर पंथी महासभामें, जहाँ एक लाखसे भी अधिक सन्त महंत सेवक सती इकट्ठे हुए थे, सबको सम्मतिसे आपही वंश गद्दीके अधिकारी चुने गये हैं। आपको इस बड़ाईको इच्छा न रहनेपर भी, सर्व वेषोंका कहना मानकर अनेक कठिनाइयों और अडचनोंसे पूर्ण इस पदको आपने स्वीकारकर लिया।
इस प्रकार आचार्य स्थानीय पद पाकर भी आप इतने निर्मान और निर्मोह हैं कि, इस पद तककी भी ममता आपको नहीं है, केवल धर्म समझकरही आप अपना कर्तव्य करते चले जाते हैं।
शब्दावली
( ३१७ )
इस पदपर आनेके कितने पहलेही, निवृत्तिमें सत्संग और विचार परायण रहने और आगेके लिये स्थानको सुरक्षित रखनेके हेतु, कुल जायदाद सहित स्थानको आपने कवीर साहबके नामसे समर्पण) करके, रजिष्ट्री करा दी है और स्थानपर पश्चात्के लिये ट्रस्ट्री (पंच) नियत कर दिया है तथा व्यवहारके भारसे अवकाशके लिये, अपने समझही महंत श्रीअवधदासजीको अपना उत्तराधिकारी बना दिया है ।
श्रीमहंत अवधदासजी साहब भी, योग्य गुरुके योग्य शिष्यके समान, अपने पदका कर्तव्य पूर्णरूपसे निबाह रहे हैं। आपको सहायक भी बैसेही योग्य मिले हैं ।
स्थानके समुचित प्रबन्धमें जिन लोगोंके हाथ हैं और जिनकी सज्जनता और सुप्रबन्धसे स्थान अपनी मर्यादाकी रक्षा करके आदर्शस्थान बना हुआ है उनमेंसे —
(१) पहले श्रीमान् मॅनेजर साहब श्री सूर्यदासजी साहब हैं । आप बहुत दिनोंसे स्थानके मॅनेजर रहे हैं और इस समय वृद्ध होकर एक प्रकारसे अवकाश ग्रणह करनेपर भी, आवश्यकता होनेपर सब कामोंको देखते और उनका प्रबन्ध करते हैं । आप पूर्ण अनुभवी वैद्यराज्य हैं, आपके पास रससे लेकर साधारण काष्ठादि तककी अनेक औषधियाँ सदा तय्यार रहती हैं, स्थानकी मूर्तियोंके तो आप प्राणदाताके समानही हैं, बाहरके भी अनेक दुखियोंके दुःख दूर करनेमें आप सदा तत्पर रहते हैं ।
(२) दूसरे खजांची नत्यूदासजी साहब हैं । आपका काम स्थानकी कुल नकदी जिन्सी आमदनीका सुप्रबन्ध करना, जमीनदारी सम्बन्धीभामला मुकद्दमाकी खबरगोरी करना खेती बाड़ी आदिका प्रबंध करना इत्यादि हैं, आपकी प्रमाणिकता इतनी बड़ी हुई है कि, सब ओरसे सब लोग द्रव्यादि लाकर आपको देते हैं, परन्तु आपके हिसाब देनेको सदा तय्यार रहनेपर भी, कोई हिसाब नहीं पूछता क्योंकि, आपके व्यवहारने सबको निश्चय दिला दिया है कि, इन्होंने अपनेको पूर्ण रूपसे कवीर साहबके अर्पण कर दिया है, शील और सदाचारकी आप मूर्ति हैं साथही स्थानकी मर्यादा रक्षाके लिये आपमें स्वाभिमान और आत्म प्रतिष्ठाकी कमी नहीं है इत्यादि ।
(३) तीसरे श्रीयुत परमहंस भित्तादासजी साहब अधिकारी हैं । आपने सर्व प्रकारके मान अभिमानके त्याग पूर्वक, भेदभाव रहित सर्वप्रकारके जीवोंकी
(३१८)
कवीरपंथी—
सेवा करना अपना आदर्श बना रखखा है। आपकी इस वृत्तिकाही प्रभाव है कि, सब मतके लोग आपसे प्रसन्न रहते हैं, ऐसा होते हुए भी आप सत्यका त्यागकर किसीकी झूठी खुशामद कभी नहीं करते। दुखियोंकी, तन मन धनसे, सेवा करना आपका स्वभावही है।
(४) चौथे श्रीगोपीदासजी अधिकारी हैं, जिन्होंने स्थानकी खेती बाड़ी काशतकारीकी देखरेख सब अपने जिम्मे ले रखा है।
(५) पांचवें भंडारी सौखी दासजी हैं, जिन्हें सदा सर्वदा दुखी जीवोंके लिये, अपने मुखका त्याग करना कोई कठिन बात नहीं दीख, पड़ती आप बड़े श्रीमहंत साहबके खास भंडारी और शिष्य हैं। इसी प्रकार भंडारी नेभूदासजी भंडारी जगादासजी कोठारी रामअधीन दासजी, रामधनीदासजी, झड़ी, दासजी, अनूपदासजी इत्यादि सर्व संत दया और प्रेमकी मूर्ति, द्वेष और भ्रमतासे रहित, सदा परोपकाररत रहनेवाले, स्थानकी मर्यादा बना रखनेमें सचेत रहते हैं।
श्रीयुत महंत चंचल दासजी, गोविन्ददासजी, भौजनदासजी, खाकीजी इत्यादि सङ्गीत द्वारा स्थानकी शोभारूप हैं।
श्रीयुत गंगादासजीको सद्गुरुकी वाणीसे इतना प्रेम है कि, आप सदा-वाणीकीही खोजमें लगे रहते हैं, आपहीके वाणी प्रेमकी प्रत्यक्ष मूर्ति गंगाशब्दावली है, जिसमेंसे लक्ष्मीपुर (रोसडा) के कवीरमन्दिरके चौकाविधानकी रमैनी पद आदि लिये गये हैं॥
इसके अतिरिक्त स्थानमें रहनेपर उससे सम्बन्ध रखनेवाले जितने व्यक्ति हैं सबमें सज्जनता कूट कूटकर भरी है, सब सदा सर्वदा अपने ऊपर कष्ट उठाकर भी दूसरोंको मुख देनेमें तय्यार रहते हैं और तो विद्यार्थी रामजी जो स्थानमेंही रहता और स्थानकी सेवा टहल करता हुआ, विद्या अध्ययन कर रहा है, साधुओंकी संगतिमें रहता हुआ ऐसे सरल स्वभावका हो गया है कि, कभी किसीकी अवज्ञा करना जानताही नहीं, जिसने जहां जिस कामके लिये पुकारा रामजी वहाँ रामजीके समान हाजिर मिलेगा। अंतमें —
श्रीरामरूपदासजीको लीजिये; आप बड़े महंत साहब या यों कहिये कि, वंशगद्दीके आचार्य स्थानापन्न धार्मिक कर्मोंके सम्पादन करनेवाले कवीर साहबके अधिकारी श्री १०८ युक्त पंथी महंत काशी दासजी साहबके परम प्रिय शिष्य
शब्दावली
(३१९)
और प्राइवेट सेक्रेट्री हैं। आप हरफन मौला हैं, आप जिस प्रकार अपने टकसार और धार्मिक ज्ञान ध्यानमें कुशल हैं, उसी प्रकार व्यवहारमें पूरे हैं, आप कवि लेखक, मुंशी, कचहरीके कार्यमें कुशल, जमीन्दारी, दुकानदारी आदि कामोंमें चतुर, अधिक क्या कहूँ जिस कामका प्रसंग आपके सम्मुख, आज्ञाचे आप सबमें अग्रसर रहनेवालोंमें हैं, साथही आप इतने दयालु और मिलनसार हैं कि, सदा सर्वदा भेदभाव रहित सबकी सहायता करनेको तय्यार रहते हैं। जिस कामको हाथमें लेते हैं उसमें पूरे तौरसे जुट जाते हैं। श्रीयुत गंगादासजीके संग्रह किये हुए शब्दोंका सम्पादन कर आपहीने उसे प्रकाशित करवाया है। कबीरचन्द्रोदय मासिकपत्रके तो आप एक प्राण स्वरूपही हैं।
श्रीमान् संतदासजी साहब उर्फ बाबा साहेब स्थानके सरदारोंमें हैं, आप सर्व गुण पूर्ण, परम विरक्त, सत्यधर्म परायण संत हैं, आप सर्वदा, भ्रमण करके जीवोंको चेतता और सत्यधर्म का प्रचार करते रहते हैं। पूर्ण विरक्त होनेपरभी आप व्यवहारको कुशलतासेभी बँचित नहीं हैं, स्थानके किसीभी व्यवहारिक कार्यमें आवश्यकता होनेपर, आप उसको सुचारुरूपसे पूर्ण करते हैं, आपकी दर्शनोय मूर्ति और आनन्दी स्वभावके कारण सबही आपसे प्रसन्न रहते हैं। आप शान्ति रसकी मूर्ति होते हुए भी, हास्यरसमें ऐसे दक्ष हैं कि आपकी एकही बातमें शोकातुर मनुष्योंको भी हँसी आ जाती है। आप जिस प्रकार सुन्दर अक्षर लिखनेमें निपुण हैं वैसेही पाकशास्त्रमें पूर्ण प्रवीण हैं।
इसी प्रकार पण्डित वसंत दासजी वैराग्य गम्भीरता और विचारकी मूर्ति हैं। एक स्थानधारी साधुओंमें सौजन्यता, प्रेम, दया, व्यवहार, कुशलता आदि जितने गुण होने चाहिये सब आपमें वर्तमान हैं।
श्रीसाधु ज्ञानचन्द्र दासजी भी स्थानके वैसे विरक्त साधुओंमेंसे एक हैं, जो सदा भ्रमण कर सेवक सतियोंको उपदेश देकर सजग करते और कालके जालसे बचाते रहते हैं।
इसके अतिरिक्त संकटों मूर्ति इस स्थानके इस समय सत्य कबीरके उपदेशका प्रचार कर सत्यधर्मकी वृद्धिमें लगे हुए हैं।
इसी प्रकार रोसडा स्थानकी प्रत्येक बातें आदर्श रूप हैं। इस समय तो यह स्थान मेरे अनुभवसे अपने धार्मिक टकसारमें अपनी उपमा आपही है। इसका कारण और कुछ नहीं, केवल “यथा राजा तथा प्रजा” के अटल नियम काही फल है।
श्री १०८ महंत साहबके सदाचार और दया क्षमा आदि गुणों सहित धर्म प्रेमही इनका एक मात्र कारण है।
(३२०)
कवीरपंथी-
उसी आदर्श स्थानमें जिस प्रकार चौकाकी रमैनी आदि काममें लायी, जाती हैं, वही क्रम शब्दावलीके इस विभागमें दिया है।
यद्यपि इस प्रकार अलग लिखनेसे कितने शब्द पद और रमैनीयोंके दुबारा आनेसे पुनरुक्ति अवश्य हुई है तथापि जानकरही मैंने ऐसा रखा है क्योंकि, ऐसे किये बिना इस शब्दावली लेनेवालों को सुभौता नहीं होता। कारण यह है कि, इसके पढ़नेवाले सबके सब ऐसे विद्वान तो हैं नहीं कि, प्रयत्न करके इधर उधरसे दूँठ ढोंककर शब्द पदादि को याद करेंगे; बरन बहुतसे ऐसे पढ़नेवाले भी हैं जो सब सामग्री इकट्ठा न रहनेसे ग्रन्थसेही श्रद्धाहीन हो विरक्त हो जायेंगे। इसी लिये इच्छा न रहते हुए भी ऐसा करना पडा है।
अन्तमें इतना निवेदन कर इस सूचनाको समाप्त करता हूँ कि, रोसडाके इस किंचित गुणवर्णनको सुनकर किसीको घबराने या ईर्ष्यानिमं जलकर यह मेरा लिखा मिथ्या प्रलाप समझनेकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, यह सब मेरे स्वतः अनुभवकी बात है। सम्बत १९८६ वि. में अषाढसे कार्तिक तक बराबर वहां निवास करके मैंने स्वतः अनुभव किया है। और तो और रोसडा स्थानमें पारसाल जब भादों पूनोंपर वार्षिक चौका आरती और संगठन सभा हुई उस समय छत्तीस गढके एक मात्र कवीरपंथी विद्वान बाबू दुलारे सिंह दार्शनिक बी. ए. मालगुजार बंसूला जिला बिलासपुर जो—इस समय वंशगद्दी कवीर कॉसिलके रेजिडेंट वायस प्रेसिडेन्ट हैं; वहां जाकर और महंत साहबके गुणोंको देखकर इतने मोहित हुए कि, वंशगद्दीके लिये आपका चुना जाना परम सौभाग्य समझने लगे। इन्ही सब कारणोंसे मैं कहता हूँ, यदि कॉसिलवाले आपको यथार्थ रूपसे पहच नेंगे और आपसे लाभ लेना चाहेंगे, तो कॉसिलके सुचारु रूपसे चलनेमें कोई बाधा नहीं होगा। क्योंकि वर्तमानमें ऐसा योग्य आचार्य मिलना दुस्तर है।
इस समय जबके वंशघरके आचार्यके विन्दवंशका लोप हो गया है तब कवीर वचनानुसार नाद वंशही प्रधान है, इस लिये मेरा विचार है कि, वर्तमानके जितने स्थान हैं, सबकी एक डायक्टी इसी प्रकार बनाकर प्रकाशित कराऊँ, जिसमें सत्यधर्मके जिज्ञासुओंको अपनी आत्म उत्पत्तिके लिये सत्संग करनेमें सुभौता हो। सद्गुरु कवीर तथा संत महंतोंकी दया होगी तो, यह कार्यभी अवश्य पूरा होगा ॥
बम्बई.
२८-७-२९
श्रावण वदि ७
सम्बत् १९८८ वि.
भवदीय
सबका परमार्थी मित्र कवीर-
श्रमाचार्य
श्रीयुगलानन्द बिहारी.
मध्यमे कवीर साहबके अधिकारी आचार्य भिरोमणि श्री १०० पंडित काशीदासजी साहब.
दिल्ली और श्री प्रलानन्दविहारी तथा भण्डारी सोखीदासजी }
बाई और-श्री वासु रामकृष्णदासजी और भाव राम रामकृष्णजी सैयक बंजरो
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सत्यनाम ।
अथ अध्यात्म साधन गुरु पूजा प्रकरण ।
दूसरा भाग ॥
पूर्व विहार विरोधकर दोसखा कबीरमन्दिरमें प्रचलित चौका विधान ग्रन्थः ।
खनो ॥ १ ॥
साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयगिरिके नाम ।
चारो कमल सुधारिये, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥
प्रथमहि मन्दिर चौका पुराये । उत्तम आसन भेत विछाये ॥ हंसा पगु आसनपर दीन्हा । सत्य कबीर कही कहि लीन्हा ॥ नाम प्रताप हंसपर छाजे । हंसहि भार रती नहि लाजे ॥ भार उतारि आप शिर लीन्हा । हंस छोड़ाय कालसे दीन्हा ॥ साधु सन्त मिलि बैठे आयी । बहु बिधि भक्ति करें चितलायी ॥ पान सुपारी नारियर भेवा । लवंग इलायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । और सवा सौ उत्तम पाना ॥ सात हाथ बसतर परमाना । सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहि भाई । जासे काल दगा मिटि जाई ॥ धन्य सन्त जिन आरति साजा । दुःख दरिद्र वा घरसे भाजा ॥ कहहिं कबीर सुनो धर्मदासा । सोहम् ओहम् शब्द परकासा ❁ ॥ २ ॥
खनो ॥ २ ॥
साखी-चौका चार सुधारहू, चार कमल असथान ।
चारो पवन उरेहिके, देखो तत्व अमान ॥ ३ ॥
- पुरानी प्रतियोंमें यह पद यों है—कहे कबीर सुनो भाई साधो । सोहँ सोहँ शब्द अराधो ॥
कबीरपंथी शब्दावली ११
(३२२)
कवीरपंथी-
अगर चन्दन घसि चौका दीन्हा । आदि नामका सुमिरण कीन्हा ॥ जब धनी मन चितवन कीन्हा । चौका श्वेत हंस करि लीन्हा ॥ धर्मदास चौका अनुसार । चौका बैठे पुरुष पियारा ॥ साधु सन्त मिलि बैठे आई । सुरत निरतसे शब्द लौ लाई । श्वेत सिंघासन अगम अपारा । सोहँ हंसो बहुत पियारा ॥ कहहिँ कवीर शब्द जो ध्यावै । शब्दै माँहि सो दर्शन पावै ॥ २ ॥
रसैनी ॥ ३ ॥
साखी-यही चाल है हंसकी, नरियर घोती पान । यहि बिधि भेद बिचारई, हंस होई निर्वान ॥ ३ ॥ उत्तम झारी अमृत जल भरिया । लवंग इलायची कपूर अनु- सरिया ॥ मन वच पान वरोना भाखा । तापर पांच सुखरिचा राखा ॥ त्रिगुण खरिचा दीन्ह बताई । दूत भूत सब चले पराई । तब दल तत्व पान जो लीन्हा । तापर अंक अगर को दीन्हा ॥ अगर वास है लोक मँझारा । तौन हंसले करइ अहारा ॥ कहहिँ कवीर सुनो धर्मदासा । हंसा पावहिँ लोक निवासा ॥ ३ ॥ कहहिँ कवीर धर्मनिनागर । अरपो दल पाओ सुखसागर ॥ ३ ॥
रसैनी ॥ ४ ॥
साखी-प्रमथे चौका कीजिये, चार खूंट अनुमान । दीप चौरासि सुधारहु, लोकरंभ सहिदान ॥ ४ ॥ आदिनाम चित चेतहु भाई, । आरति साजहु ज्योति बराई ॥ पाट पटम्बर अम्बर छाया । जहवाँ हंस करे गवनाया ॥ श्वेत सिंहासन अगम अपारा । सत सुकृत तहवाँ पगु धारा ॥ भागा तिमर भया पर- कासा । आदि ज्योति किन्हा रहिवासा ॥ हंस रूपका भेद बताऊँ । कहो तो आपन अंश दिखाऊँ ॥ श्वेतहिँ रूप शब्द है भाई । अग्र वासमें रहे समाई ॥ कहहिँ कविर निज भेद हमारा । सत्य शब्द गहि उतरो पारा ॥ ४ ॥
शब्दावली
(३२३)
खंनी ॥ ५ ॥
साखी-ऊपर पांखुरी द्वीपकी, भीतर चौकाचार । द्वादश दल निर्वाण है, देखो सुरति विचार ॥५॥ केदली दल उत्तम विस्तारा । अति सुन्दर साजो पनवारा ॥ सुघर मिठाई उत्तम पाना । नरियर अंत लेहु पहिचाना ॥ सात पांच नरियरमें नाही । ता जीवका गहो जिन वाहीं ॥ सात पांच नरियरमें रेखा । सम्पुट गुप्त प्रगट होय देखा ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । सेतु सवा सौ उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परमाना ॥ सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासे काल दगा मिटि जाई ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । तासे थाप्यो यह व्यवहारा ॥ और भेद सब राखो गोई । मति सुनिके जिव बिचलेसोई ॥ सतगुरु शरण जीव जो आवे । ताको काल सदाशिर नावे ॥ कहै कवीर सुनु धर्मनि नागर । बीरा नामसे हंस उजागर ॥५॥
खंनी ॥ ६ ॥
सा०-कलश आरति दल शिला, नारियर पान मिष्ठान । पुङ्गी फल फुल श्वेत अरु, शब्द भजन धुन ध्यान ॥ ६ ॥ उग्र ज्ञानका कहौ सन्देशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चित लाई । रहो ठिकानिउचट नहीं जाई ॥ अजर लोकमें आरति कीन्हा । सो आरति हम तुमको दीन्हा ॥ जाघर आरति नाहिं न साजी । ता घर धर्म रायकी बाजी ॥ जा घर आरति करे बनाई । निर्भय हंस लोकको जाई ॥ कोटिक ज्ञान कथे नर लोई । बिनु आरति बाँचे नहीं कोई ॥ अजर ज्योति आरती प्रकाशा । दूत भूत यम माने त्रासा ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । हंसा पावे लोक निवासा ॥ ६ ॥
खंनी ॥ ७ ॥
सा०-लौंग इलायचि नारियर, आरति धरो लेसाय । कहैं
(३२४)
कवीरपंथी-
कवीर धर्मदाससे, काल दगा मिटिजाय ॥ ७ ॥ धर्मदास तुम पंथ उजागर । अपोंदल परसो सुख सागर ॥ चन्दन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहाँ बैठे आई ॥ सेत बारिसे फूल मँगावा। सो सतगुरुको आनि चढावा ॥ धर्मदास उठि विनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानि लेउँ सोई। गुरु छोड़ि और नहिं कोई ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ७ ॥
रमैनी ॥ ८ ॥
साखी-अंश रेख स्वर शिष्यको, गुरु शासा घर एक । तामैं नरियर मोरहु, टूटे विघन अनेक ॥ ८ ॥ धर्मदास तुम बीरा लेहु । जम्बू द्वीप जीवन कहैं देहु ॥ मैं का जानों पंथके आदी। जम्बूद्वीप बसे बकवादी ॥ पढै वेद औ करे अचारा । वे नहीं माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहिं माने शब्द हमारा । सो चलि जैहैं यमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा । सो चलि हैं लोक मँझारा ॥ अन्तर कपट करे मन माहीं । सो तो लोक पहुंच नहिं जाहीं ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ८ ॥
इति चौशाकी रमैनी ॥
शब्द नारियर ।
साखी-कलश आरति दल शिला, चारो अंक सुधार । रेखा लिखि कर पान धर, तहाँ कपूर प्रजार ॥ १ ॥ बनि जारिन विनती करे, संत सुनु साजना । नरियर लीन्हों हाथ, संत सुनु साजना ॥ विना बीजके वृक्ष है, सुनु साजना । विनु धरती अंकूर संत सुनु साजना ॥ जाके मूल पताल है, सुनु साजना । नारियर शीश अकाश, संत सुनु साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु, सुनु साजना । जीव एकोत्तर हानि, संत सुनु साजना ॥
शब्दावली
(३२५)
गुरुके शब्दलै मोरहू सुनु साजना । यम शिर मर्दहु मान, संत सुनु साजना ॥ सखियाँ पांच सहेलरी, सुनु साजना । नौन री विस्तार, संत सुनु साजना ॥ कहहिं कवीर बघेलसे, सुनु साजना। इन्द्रमती शिर ताज संत, सुनु साजना ।
आरती चौकाकी १ ।
सारखी-पुहुप दीपमें बैठिके, सुख सागरमें पान । अंबु दीपमें बैठिके मूल करी पहिचान ॥ २ ॥ आदिनामचित चेतो भाई । आरति साजो जोत बराई ॥ पाट पटम्बर अम्बर छाया । तहवाँ हंसकरे गवनाया ॥ सेत सिघाँसन अगम अपारा । सत- सुकृत तहवाँ पगु धारा ॥ भाजा तिभिर भया परगासा । दूत- भूत जम आगम नासा ॥ बाहँ पकरि जिव सौपो भाई । सत- सुकृतकी फिरी दुहाई ॥ सुरत निरत हैं सतगुरु पासा । जराम- रनकी छूटी आसा ॥ तौन सुरतिले करो विचारा । सोहँ सोहँ हंस उबारा ॥ अहिनिंसि सुभिरे जो कोई । सुख सागर पहुँचे जन सोई ॥ हंस रूपका भेद बताऊँ । कहो तो आपन अंस दिखाऊँ ॥ सुरति हँस सत्य है भाई । अगर बासमें रहे समाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो । पद परचे आरति आराधो ॥
सारखी-आरति चौका कर धरो, जीव उधारन काज । कहैं कवीर धर्मदाससों, जुग जुग अविचल राज ॥ अगर विदेही पायकरि, जगते रहे निनार । सुख सागरमें घर करे, सत्य नाम आधार ॥ ४ ॥
आरती चौकाकी ॥ २ ॥
मृत लोक जम थान सर्वाँरा । तब सत सुकृत जुगति विचारा सावधान बान यक कीन्हा । ताते काल भयो अधीना ॥ ले नरि- यर जब तिलक बनाया । काल शीघ्र शरनागत आया ॥ नरि- यर लीना हाथ उठाई । दूत भूत जग गये पराई ॥ कालहिं
(३२६)
कबीरपंथी—
मारि जगत यसलीन्हा । नरियर मोरि सुरहरि कीन्हा ॥ कहैं कवीर सुन हंसपति राई । धर्मदास आरति सत्तु पाई ॥
साखी-नामी मिलि नामी भया, रही न दूजी आस । सुख सागरमें घर किया, सत्यनाम विस्वास ॥
चौकाकी आरती ॥ ३ ॥
साखी-सत्य पुरुषकी आरती, जा घर होय प्रकास । कहैं कविर सुनु धर्मनि, निर्मल होय सु दास ॥ १ ॥ जाघर आरती दास करतु हैं, जन्म जन्मके पाप हरतु हैं ॥ टेक ॥ केदली दल पुष्पनकी माला । सतसुकृत जाघर पगु चाला ॥ परिमल अगर गुलाल सुवासा । जाघर हंस करे सुख वासा ॥ १ ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । श्वेत सिंहासन छत्र विराजे । नाम एको- त्तर सुमिरे तबहीं । सतगुरु बैठे सिंहासन जबहीं ॥ २ ॥ तत्व मता नरियर प्रमाना । सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर मोरत बास उड़ाई । पल यक साहिब विलमे आई ॥ ३ ॥ सत- गुरु दया प्रगट जब होई । पाये प्रसाद महाफल सोई ॥ महा- प्रसाद तत्व विधि पावे, कहहिं कविर सतलोक सिधाये ॥ ३ ॥
शब्द भोग
सत्यपुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे ॥ टेका ॥ केदली पत्र साजो पनवारा । शीतल शब्द ज्योति उजियारा । नारियर मोरि सुररुहु कीना । आदि नाम अन्तर घट चीना १ ॥ मधुर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीतिभावसे सन्त बोलाई ॥ लौंग इलायची किसमिस मेवा । मधुर मधुर रस दाख घनेवा ॥ २ ॥ सुखसागरके निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सत्य पुरुषको अर्पण कीना शंख शब्द धुन बाजे वीना ॥ ३ ॥ सो पनवार दासको दीना । जाते काल भयो है अधीना ॥ पान प्रसाद जीवको पाव । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ४ ॥ ऐसा भेद
शब्दावली
(३२७)
करो प्रकासा । सत्य शब्द मानो विश्वासा ॥ कहहिँ कवीर सुनो धर्मदासा । वीरा नाम करो प्रकासा ॥५॥
साखी-गुरुमुक्तावें जीवको, चौरासी बन्ध छोर ।
मुक्त प्रवाना देहिं गुरु, यमसे तिनुका तोर ॥१॥
शब्द तिनुकाका ॥ १ ॥
जमुनियाकी डार साहेब तोड़ दीजे हो ॥ एक जमुनियाकी चौदह डार । सार शब्दसे मोड़ दीजे हो ॥ १ ॥ सुरति हमारी अजब पियासी, प्रेम अमीरस घोरि दीजे हो ॥२॥ गुरु हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारस मोल दीजे हो ॥ ३ ॥ यह संसार विषय रस माते । भर्म केवरिया खोल दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई । जीवन बन्ध छोड़ दीजे हो ॥५॥
शब्द तिनकाका ॥ २ ॥
जमुनियाकी डार मोरि तोरदे सतगुरु तोरदे ॥ टेक ॥ काया कंचन अजब प्याला, नाम बूटी रस घोरदे । घोरदे सतगुरु घोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ १ ॥ सुरति सुहागिन अजब पियासी, अमृत रसमें बोरदे । बोरदे सतगुरु बोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥२॥ तू है सतगुरु ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ खोल दे । खोल दे सतगुरु खोल दे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ ३ ॥ धरमदासकी अरज गुसाई, जीवनको बन्धन छोर दे । छोर दे साहब छोर दे, जमुनियाकी डार साहब तोर दे ॥४॥ साखी-धन्य भाग उस दासको, सतगुरु दिये सुसाज ।
माथ नवावे काल तिहीं, पायो नाम जहाज ॥६॥
शब्द नाम लखावन ।
गुरु पैया लागु नाम लखाय दीजे हो ॥ युगन युगनके सोवल मनुआ, दे सत शब्द जगाय दीजे हो ॥१॥ घट अधियार वस्तु
(३२८)
कवीरपंथी—
नहिं सूझे, ज्ञानकी दृष्टि बताय लीजे हो ॥२॥ विषकी लहरि उठे घट भीतर । अमृत घोरि पिलाय दीजे हो ॥३॥ गहिरि नदिया नाव पुरानी, खेड़ेके पार लगाय दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई, जीवन बन्ध छोड़ाय दीजे हो ॥५॥
शब्द कण्ठी ।
साखी—कण्ठी जाके कण्ठमें, ताही नमे यमराज ।
मारग छोड़े दिखतही, सकलो ताहि समाज ॥१॥
पायो निज नाम गलेको हरिया ॥८६॥ सतगुरु पटवा अजब निह हिया । छोटी मोटि डोलियामें चारि कहरिया ॥१॥ प्रेम प्रीती की पहिरि बुन्दरिया । निहुरि नाचो साहेव दरबरिया ॥२॥ सतगुरु कूंजी दई महलकी । जब चाहो तो खोलौ केवरिया ॥३॥ यही मोरे ब्याह यही मोरे गवना । कहहि कवीर बहुरि नहिं अवना ॥४॥
शब्द उपदेश ।
साखी—सतगुरुके उपदेश हैं, अतिशाय सुखकी, खानि ।
वेद मंत्र सम जानिके, लेहु हृदयमें मानि ॥१॥
धन सतगुरु जिन दियो उपदेश ॥ भव बूडत गहि राख्यो केस ॥८६॥ साकटसे गुरु वैष्णव कीन्ह । सत्यनामका सुमिरण दीन्ह ॥१॥ जाति बरण कुल कर्म नशाय । साधु मिले तब साधु कहाय ॥२॥ जब लगि ममिता मरी न होय । तब लगि काज एको नहिं सोय ॥ ३ ॥ जब ममिता मेरी मिटिजाय । तब प्रभु काज सुधारे धाय ॥४॥ जब लगि सिंह रहे बनमाहिं । तब लगि यहो बन फूले नाहि ॥५॥ उलटा स्यार सिंहको खाय । तब फूले सकलो वनराय ॥६॥ खाती बुन्द केदली परे । रूप वरण कहु और धरे ॥७॥ नाम कपूर वासना होय । केदली वाको कहै न कोय ॥८॥ पारस परसे कंचन होय । लोहा वाको कहे न कोय
शब्दावली
(३२९)
॥१॥ पारसके गुण देखहु जाय । कंचन महाँगे मोल विकाय ॥१०॥ निशिदिन सुमिरो एके नाम । जिहि सुमिरे सिध होवे काम ॥११॥ साहेब कविरके पक्का खेल । तील फूल मिलि भये फुलेल ॥१२॥
साखी-तेल तीलते ऊपजे, जन्म जातिके तेल ।
संगति भई जब फूलकी, नाम धराय फुलेल ॥१॥
शब्द अर्जाँ ।
बहियाँ पकडो समुझिके, अर्ज सुनो गुरु मोर ।
पकडो तो छोडो नहीं, तब बलहारी तोर ॥२॥
समुझि गहो मेरि बाहीं परम गुरु समुझि गहो मेरि बाहीं ॥टेक॥ जो बालक दुनमुनवाखेले, सो बालक हम नहीं । हम तो चाहैं सतके सौदा, पथल पुजनको नहीं ॥ १ ॥ चौदह सो चौरासी चेला, सो चेला हम नहीं । जियत ठिकाना सबहि बतावे मुये ठिकाना नहीं ॥२॥ जो तुमरे घर उद्यम नहीं, भीख मांगि किन खाहीं । मूल सजीवन जानत नहीं, मति प्रबोधो काही ॥३॥ नाव तेरी करुअरिया नहीं, लहरि उठे विकरारा । गुरु सहित चेला सब बूडे, कौन उतारे पारा ॥४॥ सूखल लक- ड़ीमें घून लगतु है, लोहेमें लगु काई । बिनु प्रतीत गुरुका कीजे । काल घसीटे जाई ॥५॥ अमृत कुण्ड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेउल देखिके विषहर कम्पे, चपल अमी रस चाखे ॥६॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । देय कपाट महलमें पौढे, अब कछु संशय नहीं ॥७॥ समुझ न होय तो समुझो गुरुजी, न तरु होत बिगारा । कहैं कबीर सुनो गुरु रामा- नन्द, अब सिख लेहु हमारा ॥८॥
साखी-गुरु हमारा शब्द है, सदा रहतु है संग ।
रामानन्दको यु किया, जगत जनावन ढङ्क ॥
(३३०)
कवीरपंथी-
पान परवानाका शब्द ॥
पान छत्रपति कर धरो, अनुभव सन्धि विचार । विषम त्रिच्छ जमकी दशी, रेखगुंज निरुचार ॥१॥ जुगकी रेख सम्हारहु, पान अखण्डित सार । ताते हंस न वीगरे, चन्द्र लगन विस्तार ॥२॥ चार तत्व घटमें धरो, पांचो लेहु समोय । जेहि अक्षरते जिव- भया, जाते हंसा होय ॥३॥ वहि अक्षरते सब भयो, लोकदीप- स्थूल । ताको चान्हो सन्तो, विज अक्षर निजमूल ॥४॥ चार कमल घर भीतरे, परखो संत सुजान । जामे वासा जीवको, तहां सुधारो पान ॥५॥ आन कमलमें जिव बसे, अन्ते पान प्रकाश । अधर पान जमलेत है, जीव परे जम फाँस ॥ ६ ॥ चारो मुहर सुधारहु, अंक छत्रकी छाँह । लच्छन लगन विचारके, देहु हंसको बाँह ॥७॥ सतजुग संधि सम्हारहु, सब विधि पूरन होय । सुरति निरति गहि धर्मनि, देखो शब्द विलोय ॥ ८ ॥ पान छत्रपति साजहु, जुगकी रेख सुधार । कहैं कवीर धर्मदास सो, हंस उतारो पार ॥ ९ ॥
॥ इति आनन्दी चौकाविधान समाप्ता ॥
॥ अथ चलावा चौका ॥
साखी-हंस उबारण कारने, सतगुरु जगमें आय । काशीमें परगट भये, नाम कवीर कहाय ॥१॥
मंगल ।
सतगुरु हंस उबारण जगमें आइयाँ । प्रगट भये निज काशीमें दास कहाइयाँ ॥१॥ रामानन्द गुरु कीन सो शिष्य कहाइयाँ । बुधि बल दीक्षा लीन बहुरि समझाइयाँ ॥ २ ॥ ब्राह्मण औ सन्यासी हांसी कीन्हियाँ । तजि काशी गये मगहर काहु न चिन्हियाँ ॥ ३ ॥ बिजुलीखाँ पैठान तो कबुर खोदाइयाँ । बिरसिह राय बचेल, साजि दल आइयाँ ॥ ४ ॥
शब्दावली
(३३१)
लिखि कमलापति रानि, सो पतिया पठाइयां। मूर्दा न होहिं कवीर, सो बुधि विचराइयां ॥५॥ पर्दा उघारिके देखेउ, कछु नहिं पाइयां। पान फूल लिये द्वाथ, बहुत पछिताइयां ॥६॥ मगहर झगडा निवेरि, दोउ दल राखियां। गढबाँधो धर्म-दास, आपन कर थापियां ॥७॥ अटल बयालिस वंश, राज लिखि दिन्हियां। जस हम तस तुम वंश, दया बहु कीन्हियां ॥८॥ हद बाँधा दरियाव, उड़ीसा जाइके। लक्ष्मी सहित जगन्नाथ, मिले प्रभु धाइके ॥९॥ उहँवाँ सतगुरु जायके, अदल चलाइयां। महा प्रसाद पवायके भ्रम मेटाइयां ॥१०॥ आगम कहाँ पुकारि, सुनो धर्मनिनागरा। बहुत हंस लिये साथ उतरो भव सागरा ॥११॥
साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड अंश।
मुक्त राज तुमको दियो, अटल बयालिस वंश ॥२॥
॥ अथ दीहल प्रारम्भः ॥
साखी-आमिनिकी विनती यही, सुनिये बन्दी छोर।
भवसागरसे तारहु, पुनि पुनि करौं निहोर ॥१॥
दीहल । (१)
आमिनि विनती विनवई, सुनहु हो बंदी छोर। भवसागरसे मोहि तारहु, इतना मोर निहोर ॥१॥ भवसागर भयावन सूझे, वार न पार। झांझरि नाव पुरातम, खेड़ उतारहु पार ॥२॥ कोटि कर्म छूटे नहीं, यह जिव कीट समान। भुङ्गी होय गुरु तारहु, अधम उधारण नाम ॥३॥ आसन आहीं पुरुषके, धर्म दास को दीन्ह। चार अंश चौका महाँ, तामें लेहु चीन्ह ॥४॥ कहहिं कवीर सुनु आमिनि, रहो हमारी आस। जीवन पार उतारि हौं होइ चुरामणि दास ॥५॥
(३३२)
कवीरपंथी-
दीहल (२)
साखी-मानहु शब्द हमार यह, सतगुरु सुमिरण सार । नतु पाछे पछताइहो, जब पडिहैं जम मार ॥ २ ॥
फेरु पछितायव हे कामिनि, मानहु शब्द हमार ॥ टेक ॥ चन्दन जानि विरछा रोपल, सेहू भेल सेमर पलास । फुलवा देखि धीरज बांधल, फल देखि भयल निरास ॥ १ ॥ बिनारे सोनाके कैसन आभरण, बिन मोती कैसन गरहार । बिनारे मज्याके कैसन नेहर, बिनु स्वामी कैसन सिंगार २ कायारे कंचन गढ टूटल, छूटल कुल परिवार । दशो दुआरिया जमुआ रोकल, कौनेविधि होयब पार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहि दीहल, शब्द परखु टकसार । बहुरि न यहि जगमें आयब, फिर न मनुष अव- तार ॥ ४ ॥
दीहल (३)
साखी-कामिनि अचरज देखहु, जहँ नहिं धरनि अकाश ।
चान्द सूर जहवाँ नहीं सत्य, शब्द परकाश ॥ ३ ॥
अचरज देखहु कामिनि, कहौं तो को पति आय । अधर साहेब हम देखलौं, सतगुरु डोलिया फनाय ॥ १ ॥ चांद सुरज है वहां नहीं, वहां नहिं धरनि अकाश । तौने पुरुष मोरे प्रिय- तम, केहि विधि करौं निवास ॥ २ ॥ गुरु दर्शनके कारने, सर- वस दियो लुटाय । एक पलकके बीछुडे, अब मोहिं कछु न सोहाय ॥ ३ ॥ गुरु दर्शन हम पायलौं, छूटल कुल परिवार । अब जेहौं पुर आपने, परखु टकसार ॥ ४ ॥ साहिब कवीर कहे दीहल, हृदय करहु विचार । अरस परस करु कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ५ ॥
दीहल (४)
सा०-सुमिरहु कामिनि नाह निज, जहँवाँ धूप न छाँहिं ।
देखत अतिसुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाहि ॥ ४ ॥
शब्दावली
(३३३)
सुमिरहु कामिनि सुमिरहु, सुमिरहु आपन नाह । अधर साहिब हम देखिया, जहँवाँ धूप न छाँह ॥ १ ॥ विनारे घटा घन गरजई, विनु जल तिरथ नहाय । देखतहौं सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ २ ॥ विन पानीके जीवन, विनु दीपक उजियार । ऐसो निर्गुण देखिके, पगखु शब्द टकसार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहैं दीहल, अब सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म सुफल भये, पाये मुक्तिके मूल ॥ ४ ॥
दीहल (५)
साखी-मानहु गुरुके वचन पिय, हरदम खबरजु लेय । जो चित अन्ते जाइहैं, तौ गुरु ताजन देव ॥६॥
गुरुके वचन मोरे प्रियतम, हरदम खबर जुलेय । जो चित अन्ते जाइ हैं, हँसि पिय ताजन देय ॥ १ ॥ पार बसे मोर प्रियतम, दुर्बल भइ मोरि देह । पांच भैया संग दारुण, तिनसे छुटल सनेह ॥२॥ जिनके आंगन नदिया वहे, सो कस कुआँमें नहाय । जाघर नारि सुलक्षण, सो कस पर घर जाय ॥३॥ गृहि आंगन नहि भावई, सुख संपत्त नाहि सुहाय । निर्गुन नाह न आवई, सेज गयल कुम्हिलाय ॥४॥ जो साहेब वर पाइहों, नेहर धरे उठाय । सेज बेठे सुख विलसहिं, गुरुमुख मङ्गल गाय ॥५॥ साहेब कवीर कहि दीहल, छुटल कुल पारिवार । चरण कमल चित राखहु, पूरण नाम अधार ॥ ६ ॥
दीहल (६)
सा०-नेहर आपन कोइ नहिं, जासे करूं पहिचान ।
प्रेमसहित सखि मिलिलेहु, निजप्रियसुखप्रदजान ॥६॥
मिलि रहु सखिरी तु मिलि रहु, अपने पिया सुख जान । नेहर आपन कोइ नहीं, जासे करौं पहिचान ॥ १ ॥ मोरे जिवके भावतु, छाय रहो वहि देश । मैं विरहिनि निश दिन फिरोँ, धरि