कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 968 में से
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(३२३)
खंनी ॥ ५ ॥
साखी-ऊपर पांखुरी द्वीपकी, भीतर चौकाचार । द्वादश दल निर्वाण है, देखो सुरति विचार ॥५॥ केदली दल उत्तम विस्तारा । अति सुन्दर साजो पनवारा ॥ सुघर मिठाई उत्तम पाना । नरियर अंत लेहु पहिचाना ॥ सात पांच नरियरमें नाही । ता जीवका गहो जिन वाहीं ॥ सात पांच नरियरमें रेखा । सम्पुट गुप्त प्रगट होय देखा ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । सेतु सवा सौ उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परमाना ॥ सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासे काल दगा मिटि जाई ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । तासे थाप्यो यह व्यवहारा ॥ और भेद सब राखो गोई । मति सुनिके जिव बिचलेसोई ॥ सतगुरु शरण जीव जो आवे । ताको काल सदाशिर नावे ॥ कहै कवीर सुनु धर्मनि नागर । बीरा नामसे हंस उजागर ॥५॥
खंनी ॥ ६ ॥
सा०-कलश आरति दल शिला, नारियर पान मिष्ठान । पुङ्गी फल फुल श्वेत अरु, शब्द भजन धुन ध्यान ॥ ६ ॥ उग्र ज्ञानका कहौ सन्देशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चित लाई । रहो ठिकानिउचट नहीं जाई ॥ अजर लोकमें आरति कीन्हा । सो आरति हम तुमको दीन्हा ॥ जाघर आरति नाहिं न साजी । ता घर धर्म रायकी बाजी ॥ जा घर आरति करे बनाई । निर्भय हंस लोकको जाई ॥ कोटिक ज्ञान कथे नर लोई । बिनु आरति बाँचे नहीं कोई ॥ अजर ज्योति आरती प्रकाशा । दूत भूत यम माने त्रासा ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । हंसा पावे लोक निवासा ॥ ६ ॥
खंनी ॥ ७ ॥
सा०-लौंग इलायचि नारियर, आरति धरो लेसाय । कहैं