भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

कवीर धर्मदाससे, काल दगा मिटिजाय ॥ ७ ॥ धर्मदास तुम पंथ उजागर । अपोंदल परसो सुख सागर ॥ चन्दन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहाँ बैठे आई ॥ सेत बारिसे फूल मँगावा। सो सतगुरुको आनि चढावा ॥ धर्मदास उठि विनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानि लेउँ सोई। गुरु छोड़ि और नहिं कोई ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ७ ॥

रमैनी ॥ ८ ॥

साखी-अंश रेख स्वर शिष्यको, गुरु शासा घर एक । तामैं नरियर मोरहु, टूटे विघन अनेक ॥ ८ ॥ धर्मदास तुम बीरा लेहु । जम्बू द्वीप जीवन कहैं देहु ॥ मैं का जानों पंथके आदी। जम्बूद्वीप बसे बकवादी ॥ पढै वेद औ करे अचारा । वे नहीं माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहिं माने शब्द हमारा । सो चलि जैहैं यमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा । सो चलि हैं लोक मँझारा ॥ अन्तर कपट करे मन माहीं । सो तो लोक पहुंच नहिं जाहीं ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ८ ॥

इति चौशाकी रमैनी ॥

शब्द नारियर ।

साखी-कलश आरति दल शिला, चारो अंक सुधार । रेखा लिखि कर पान धर, तहाँ कपूर प्रजार ॥ १ ॥ बनि जारिन विनती करे, संत सुनु साजना । नरियर लीन्हों हाथ, संत सुनु साजना ॥ विना बीजके वृक्ष है, सुनु साजना । विनु धरती अंकूर संत सुनु साजना ॥ जाके मूल पताल है, सुनु साजना । नारियर शीश अकाश, संत सुनु साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु, सुनु साजना । जीव एकोत्तर हानि, संत सुनु साजना ॥