कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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करो प्रकासा । सत्य शब्द मानो विश्वासा ॥ कहहिँ कवीर सुनो धर्मदासा । वीरा नाम करो प्रकासा ॥५॥
साखी-गुरुमुक्तावें जीवको, चौरासी बन्ध छोर ।
मुक्त प्रवाना देहिं गुरु, यमसे तिनुका तोर ॥१॥
शब्द तिनुकाका ॥ १ ॥
जमुनियाकी डार साहेब तोड़ दीजे हो ॥ एक जमुनियाकी चौदह डार । सार शब्दसे मोड़ दीजे हो ॥ १ ॥ सुरति हमारी अजब पियासी, प्रेम अमीरस घोरि दीजे हो ॥२॥ गुरु हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारस मोल दीजे हो ॥ ३ ॥ यह संसार विषय रस माते । भर्म केवरिया खोल दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई । जीवन बन्ध छोड़ दीजे हो ॥५॥
शब्द तिनकाका ॥ २ ॥
जमुनियाकी डार मोरि तोरदे सतगुरु तोरदे ॥ टेक ॥ काया कंचन अजब प्याला, नाम बूटी रस घोरदे । घोरदे सतगुरु घोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ १ ॥ सुरति सुहागिन अजब पियासी, अमृत रसमें बोरदे । बोरदे सतगुरु बोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥२॥ तू है सतगुरु ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ खोल दे । खोल दे सतगुरु खोल दे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ ३ ॥ धरमदासकी अरज गुसाई, जीवनको बन्धन छोर दे । छोर दे साहब छोर दे, जमुनियाकी डार साहब तोर दे ॥४॥ साखी-धन्य भाग उस दासको, सतगुरु दिये सुसाज ।
माथ नवावे काल तिहीं, पायो नाम जहाज ॥६॥
शब्द नाम लखावन ।
गुरु पैया लागु नाम लखाय दीजे हो ॥ युगन युगनके सोवल मनुआ, दे सत शब्द जगाय दीजे हो ॥१॥ घट अधियार वस्तु