कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
नहिं सूझे, ज्ञानकी दृष्टि बताय लीजे हो ॥२॥ विषकी लहरि उठे घट भीतर । अमृत घोरि पिलाय दीजे हो ॥३॥ गहिरि नदिया नाव पुरानी, खेड़ेके पार लगाय दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई, जीवन बन्ध छोड़ाय दीजे हो ॥५॥
शब्द कण्ठी ।
साखी—कण्ठी जाके कण्ठमें, ताही नमे यमराज ।
मारग छोड़े दिखतही, सकलो ताहि समाज ॥१॥
पायो निज नाम गलेको हरिया ॥८६॥ सतगुरु पटवा अजब निह हिया । छोटी मोटि डोलियामें चारि कहरिया ॥१॥ प्रेम प्रीती की पहिरि बुन्दरिया । निहुरि नाचो साहेव दरबरिया ॥२॥ सतगुरु कूंजी दई महलकी । जब चाहो तो खोलौ केवरिया ॥३॥ यही मोरे ब्याह यही मोरे गवना । कहहि कवीर बहुरि नहिं अवना ॥४॥
शब्द उपदेश ।
साखी—सतगुरुके उपदेश हैं, अतिशाय सुखकी, खानि ।
वेद मंत्र सम जानिके, लेहु हृदयमें मानि ॥१॥
धन सतगुरु जिन दियो उपदेश ॥ भव बूडत गहि राख्यो केस ॥८६॥ साकटसे गुरु वैष्णव कीन्ह । सत्यनामका सुमिरण दीन्ह ॥१॥ जाति बरण कुल कर्म नशाय । साधु मिले तब साधु कहाय ॥२॥ जब लगि ममिता मरी न होय । तब लगि काज एको नहिं सोय ॥ ३ ॥ जब ममिता मेरी मिटिजाय । तब प्रभु काज सुधारे धाय ॥४॥ जब लगि सिंह रहे बनमाहिं । तब लगि यहो बन फूले नाहि ॥५॥ उलटा स्यार सिंहको खाय । तब फूले सकलो वनराय ॥६॥ खाती बुन्द केदली परे । रूप वरण कहु और धरे ॥७॥ नाम कपूर वासना होय । केदली वाको कहै न कोय ॥८॥ पारस परसे कंचन होय । लोहा वाको कहे न कोय