भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

शब्दावली

(३२९)

॥१॥ पारसके गुण देखहु जाय । कंचन महाँगे मोल विकाय ॥१०॥ निशिदिन सुमिरो एके नाम । जिहि सुमिरे सिध होवे काम ॥११॥ साहेब कविरके पक्का खेल । तील फूल मिलि भये फुलेल ॥१२॥

साखी-तेल तीलते ऊपजे, जन्म जातिके तेल ।

संगति भई जब फूलकी, नाम धराय फुलेल ॥१॥

शब्द अर्जाँ ।

बहियाँ पकडो समुझिके, अर्ज सुनो गुरु मोर ।

पकडो तो छोडो नहीं, तब बलहारी तोर ॥२॥

समुझि गहो मेरि बाहीं परम गुरु समुझि गहो मेरि बाहीं ॥टेक॥ जो बालक दुनमुनवाखेले, सो बालक हम नहीं । हम तो चाहैं सतके सौदा, पथल पुजनको नहीं ॥ १ ॥ चौदह सो चौरासी चेला, सो चेला हम नहीं । जियत ठिकाना सबहि बतावे मुये ठिकाना नहीं ॥२॥ जो तुमरे घर उद्यम नहीं, भीख मांगि किन खाहीं । मूल सजीवन जानत नहीं, मति प्रबोधो काही ॥३॥ नाव तेरी करुअरिया नहीं, लहरि उठे विकरारा । गुरु सहित चेला सब बूडे, कौन उतारे पारा ॥४॥ सूखल लक- ड़ीमें घून लगतु है, लोहेमें लगु काई । बिनु प्रतीत गुरुका कीजे । काल घसीटे जाई ॥५॥ अमृत कुण्ड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेउल देखिके विषहर कम्पे, चपल अमी रस चाखे ॥६॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । देय कपाट महलमें पौढे, अब कछु संशय नहीं ॥७॥ समुझ न होय तो समुझो गुरुजी, न तरु होत बिगारा । कहैं कबीर सुनो गुरु रामा- नन्द, अब सिख लेहु हमारा ॥८॥

साखी-गुरु हमारा शब्द है, सदा रहतु है संग ।

रामानन्दको यु किया, जगत जनावन ढङ्क ॥