भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

(३३२)

कवीरपंथी-

दीहल (२)

साखी-मानहु शब्द हमार यह, सतगुरु सुमिरण सार । नतु पाछे पछताइहो, जब पडिहैं जम मार ॥ २ ॥

फेरु पछितायव हे कामिनि, मानहु शब्द हमार ॥ टेक ॥ चन्दन जानि विरछा रोपल, सेहू भेल सेमर पलास । फुलवा देखि धीरज बांधल, फल देखि भयल निरास ॥ १ ॥ बिनारे सोनाके कैसन आभरण, बिन मोती कैसन गरहार । बिनारे मज्याके कैसन नेहर, बिनु स्वामी कैसन सिंगार २ कायारे कंचन गढ टूटल, छूटल कुल परिवार । दशो दुआरिया जमुआ रोकल, कौनेविधि होयब पार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहि दीहल, शब्द परखु टकसार । बहुरि न यहि जगमें आयब, फिर न मनुष अव- तार ॥ ४ ॥

दीहल (३)

साखी-कामिनि अचरज देखहु, जहँ नहिं धरनि अकाश ।

चान्द सूर जहवाँ नहीं सत्य, शब्द परकाश ॥ ३ ॥

अचरज देखहु कामिनि, कहौं तो को पति आय । अधर साहेब हम देखलौं, सतगुरु डोलिया फनाय ॥ १ ॥ चांद सुरज है वहां नहीं, वहां नहिं धरनि अकाश । तौने पुरुष मोरे प्रिय- तम, केहि विधि करौं निवास ॥ २ ॥ गुरु दर्शनके कारने, सर- वस दियो लुटाय । एक पलकके बीछुडे, अब मोहिं कछु न सोहाय ॥ ३ ॥ गुरु दर्शन हम पायलौं, छूटल कुल परिवार । अब जेहौं पुर आपने, परखु टकसार ॥ ४ ॥ साहिब कवीर कहे दीहल, हृदय करहु विचार । अरस परस करु कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ५ ॥

दीहल (४)

सा०-सुमिरहु कामिनि नाह निज, जहँवाँ धूप न छाँहिं ।

देखत अतिसुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाहि ॥ ४ ॥