कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(३३१)
लिखि कमलापति रानि, सो पतिया पठाइयां। मूर्दा न होहिं कवीर, सो बुधि विचराइयां ॥५॥ पर्दा उघारिके देखेउ, कछु नहिं पाइयां। पान फूल लिये द्वाथ, बहुत पछिताइयां ॥६॥ मगहर झगडा निवेरि, दोउ दल राखियां। गढबाँधो धर्म-दास, आपन कर थापियां ॥७॥ अटल बयालिस वंश, राज लिखि दिन्हियां। जस हम तस तुम वंश, दया बहु कीन्हियां ॥८॥ हद बाँधा दरियाव, उड़ीसा जाइके। लक्ष्मी सहित जगन्नाथ, मिले प्रभु धाइके ॥९॥ उहँवाँ सतगुरु जायके, अदल चलाइयां। महा प्रसाद पवायके भ्रम मेटाइयां ॥१०॥ आगम कहाँ पुकारि, सुनो धर्मनिनागरा। बहुत हंस लिये साथ उतरो भव सागरा ॥११॥
साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड अंश।
मुक्त राज तुमको दियो, अटल बयालिस वंश ॥२॥
॥ अथ दीहल प्रारम्भः ॥
साखी-आमिनिकी विनती यही, सुनिये बन्दी छोर।
भवसागरसे तारहु, पुनि पुनि करौं निहोर ॥१॥
दीहल । (१)
आमिनि विनती विनवई, सुनहु हो बंदी छोर। भवसागरसे मोहि तारहु, इतना मोर निहोर ॥१॥ भवसागर भयावन सूझे, वार न पार। झांझरि नाव पुरातम, खेड़ उतारहु पार ॥२॥ कोटि कर्म छूटे नहीं, यह जिव कीट समान। भुङ्गी होय गुरु तारहु, अधम उधारण नाम ॥३॥ आसन आहीं पुरुषके, धर्म दास को दीन्ह। चार अंश चौका महाँ, तामें लेहु चीन्ह ॥४॥ कहहिं कवीर सुनु आमिनि, रहो हमारी आस। जीवन पार उतारि हौं होइ चुरामणि दास ॥५॥