कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
उसी आदर्श स्थानमें जिस प्रकार चौकाकी रमैनी आदि काममें लायी, जाती हैं, वही क्रम शब्दावलीके इस विभागमें दिया है।
यद्यपि इस प्रकार अलग लिखनेसे कितने शब्द पद और रमैनीयोंके दुबारा आनेसे पुनरुक्ति अवश्य हुई है तथापि जानकरही मैंने ऐसा रखा है क्योंकि, ऐसे किये बिना इस शब्दावली लेनेवालों को सुभौता नहीं होता। कारण यह है कि, इसके पढ़नेवाले सबके सब ऐसे विद्वान तो हैं नहीं कि, प्रयत्न करके इधर उधरसे दूँठ ढोंककर शब्द पदादि को याद करेंगे; बरन बहुतसे ऐसे पढ़नेवाले भी हैं जो सब सामग्री इकट्ठा न रहनेसे ग्रन्थसेही श्रद्धाहीन हो विरक्त हो जायेंगे। इसी लिये इच्छा न रहते हुए भी ऐसा करना पडा है।
अन्तमें इतना निवेदन कर इस सूचनाको समाप्त करता हूँ कि, रोसडाके इस किंचित गुणवर्णनको सुनकर किसीको घबराने या ईर्ष्यानिमं जलकर यह मेरा लिखा मिथ्या प्रलाप समझनेकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, यह सब मेरे स्वतः अनुभवकी बात है। सम्बत १९८६ वि. में अषाढसे कार्तिक तक बराबर वहां निवास करके मैंने स्वतः अनुभव किया है। और तो और रोसडा स्थानमें पारसाल जब भादों पूनोंपर वार्षिक चौका आरती और संगठन सभा हुई उस समय छत्तीस गढके एक मात्र कवीरपंथी विद्वान बाबू दुलारे सिंह दार्शनिक बी. ए. मालगुजार बंसूला जिला बिलासपुर जो—इस समय वंशगद्दी कवीर कॉसिलके रेजिडेंट वायस प्रेसिडेन्ट हैं; वहां जाकर और महंत साहबके गुणोंको देखकर इतने मोहित हुए कि, वंशगद्दीके लिये आपका चुना जाना परम सौभाग्य समझने लगे। इन्ही सब कारणोंसे मैं कहता हूँ, यदि कॉसिलवाले आपको यथार्थ रूपसे पहच नेंगे और आपसे लाभ लेना चाहेंगे, तो कॉसिलके सुचारु रूपसे चलनेमें कोई बाधा नहीं होगा। क्योंकि वर्तमानमें ऐसा योग्य आचार्य मिलना दुस्तर है।
इस समय जबके वंशघरके आचार्यके विन्दवंशका लोप हो गया है तब कवीर वचनानुसार नाद वंशही प्रधान है, इस लिये मेरा विचार है कि, वर्तमानके जितने स्थान हैं, सबकी एक डायक्टी इसी प्रकार बनाकर प्रकाशित कराऊँ, जिसमें सत्यधर्मके जिज्ञासुओंको अपनी आत्म उत्पत्तिके लिये सत्संग करनेमें सुभौता हो। सद्गुरु कवीर तथा संत महंतोंकी दया होगी तो, यह कार्यभी अवश्य पूरा होगा ॥
बम्बई.
२८-७-२९
श्रावण वदि ७
सम्बत् १९८८ वि.
भवदीय
सबका परमार्थी मित्र कवीर-
श्रमाचार्य
श्रीयुगलानन्द बिहारी.