कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यनाम ।
अथ आरतिदर्शन प्रारम्भः ।
ज्ञान आरती अमृत वानी । पूरन ब्रह्म लेहु पहिचानी । त्रिदेवा मिलि ज्योति बखानी । निरंकारकी अकथ कहानी ॥ यहि आशा सबही मिलि ठानी । भरमि भरमि सुये नर प्रानी ॥ दृष्टि विना दुनिया बौरानी । साहेब छाडि यम हाथ विकानी ॥ कहहि कवीर कोइ संत सुजाना । जिन जिन शब्द हमारा माना ॥ १ ॥
कैसे मैं आरति करों तुम्हारी । महामलिन साहेब देह हमारी ॥ मैलेसे उपज्यो संसारा । हौं छुतिया गुन गाउँ तुम्हारा ॥ झरना झरे दशो दिशि द्वारे । कैसे मैं आवों निकट तुम्हारे ॥ जब तुम देहु अग्रकी देही । तब हम होइब नाम सनेही ॥ मलयगिरिमें बसे भुजंगा । विष अमृत गो एके संग ॥ तितुका तोरि देहु प्रवाना । तब हम पाएब पद निरवाना ॥ धनी धर्मदास कविर बल गाजे ॥ गुरु प्रताप आरती साजे ॥ २ ॥
अखण्ड आरती खण्ड न होई । कालहिं मारी रसातल खोई ॥ खण्डित पिंड इकइस ब्रह्मण्डा । खंडित नदी अठारह गण्डा ॥ खंडित रघुपति खंडित रावन । खंडित कृष्ण वीर बलि बावन ॥ खंडित धरती पवन अकासा । खंडित चाँद सूरज कैलासा ॥ खंडित जहँ लगि सकल पसारा । खण्ड अखण्ड कवीर पुकारा ॥ ३ ॥
मंगल रूप आरती साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥ निसि बासर जहँ सूरज न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करे अनन्दा ॥ अच्छे वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रकास अमृत फल पाया ॥ जरा मरनकी संशय मेटो । सुरति संतापन सतगुरु भेटो ॥ तन मन