भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 318

(३०६)

कवीरपंथी—

सहजे देखिये, सहजे सुरत समाय । कहवे की कछु ना रही, देखे मन पतियाय ॥ साहब कवीर कहि दीहल, रहन गहन समुझाय । बूझे संत विचारिके, गुरुमुख मंगल गाय ॥ २७ ॥ पांच तत्वके भीतरे, गुप्त वस्तु अस्थान । बिरले मरम कोइ पावई, सतगुरु वचन प्रमान ॥ दिल अंदर दीदार है, बाद भ्रमें संसार । सतगुरु शब्द के मसकला, मांज दिखावन हार ॥ महल लेत कोई सूरमा, बाजे अनहद तूर । बिना पिंडका पुरुष है, झिलमिल दरसे नूर ॥ सहज समाधी लगिरही, मनका छूटा मैल । अनहद बाजा बाजते, सहजे पहुँचा गैल ॥ बिना पांव को पंथ है, बिन बस्ती को देश । बिना पिंडको पुरुष है, कहै कवीर संदेश ॥ २८ ॥ पारब्रह्म जासों कहो, ताहि निरंजन नाम । तहवांसे मन ऊपजो, तीन लोक लिये ग्राम ॥ पारब्रह्म के अगुवा, मन राजा सरदार । जो चाहे सोई करो, कोइ न पावे पार ॥ चौरासी उपजावई, आशा बीज जमाय । दशो जन्म राजा भये, ममता अमल चलाय ॥ तीन लोकके भीतरे, सब जिव भये किसान । चौदह काल जगातिया, मारग रोक समान ॥ तीन लोक के बाहिरें जहैं, सन्नथ को देश । चेतो हंसा चित धरो, छाड़ सकल भर्म भेश ॥ पारब्रह्म की महिमा, सुनो संत चितलाय । साहब कवीर के दीहल, परख परख टकसार ॥ २९ ॥