भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर मोरत बास उड़ाई ॥ पल एक साहेब विलमैं आई ॥ सतगुरु दया प्रगट जब होई । पाय प्रसाद महाफल सोई ॥ महा प्रसाद तत्त्व विधि पावे । कहैं कवीर सतलोक सिधावे ॥ ११ ॥

मंगलरूप आरति होई । शब्द सुरति चित राखु समोई ॥ दीप अमोल अगम उजियारा । सन्त पुरुष कीन्हो विस्तारा ॥ हंस हिरम्बर शब्द समाई । वृक्ष गुरुम्बर बैठक पाई ॥ शीतल नीर सुरति भर लावे । हंस सोहंगम चौर डुरावे ॥ मणि माणिक हंसनकी पांती । शब्द स्वरूप सुरतिकी कांती ॥ हंस मुजन जन आज्ञाकारी । हंसन काज देह निज धारी ॥ मन बच कर्म जो आरति साजे । कहै कवीर सतलोक विराजे ॥ १२ ॥

आरति सतगुरु साहेब कवीर बंदी छोरकी । करत किलोल हंस पति आगर आनंद विमल विनोदकी ॥ त्रिगुन तेल पंच मुख बाती मानिक ज्योति अपार । हीरन धार संजोय सकल विधि पूरन नाम अधार ॥ संगति सकल सुकृत भये ठाढे कहत संदेश अपार । जाकी सुरति भई तन व्याकुल अति आतुर दीदार ॥ बाजत ताल मृदंग झालरी वीना शब्द रसाल । धुधुक धुधुक जहाँ तुरही बाजे गरजत शब्द विशाल ॥ पूरण पुरुष सिघासन राजे बहु शोभा इस्थीर । धर्मदास आरति कर जारे गावहिँ साहब कवीर । ॥ १३ ॥

आरति निज नाम तुम्हारी । अविगति अगम अलेख मुरारी ॥ पहली आरति पियाजीको पाये । रोम रोममें अलख लखाये ॥२॥ दुसरी आरति दुतिया नहीं कोई । जहाँ देखो तहाँ हरिहरि होई ॥३॥ तिसरी आरती त्रिगुण नाई । चौथे पदमें रहे समाई ॥४॥ चौथी आरति चहुँ दिशि भरपूर । गगन मंडल बाजे अनहद तूर

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