कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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॥६॥ पंचयै आरति पूरन प्यार । कहहिँ कवीर सो सबसे न्यार ॥ १४॥
संज्ञा आरति सुमिरण सोई । सुमिरण करत महाफल होई ॥ १॥
पहिली आरती प्रेम प्रकाशा । कर्म भर्म सब कीन्ह विनाशा ॥ २॥
दूसरी आरति दिलहीमें देवा । योग मुक्तिसे करले सेवा ॥ ३ ॥
तीसरी आरति त्रिभुवन सूझे । गुरुगमज्ञान अगोचर बूझे ॥ ४ ॥
चौथी आरति चहुँयुग पूजा । गुरु सम देव और नहीं दूजा ॥ ५॥
पंचयै आरति पद निरबाना । कहहीं कवीर (हंसा) लोकसमाना १६॥
आरती परम पुरुष निजदेवा । अनन्त कोटि जहां लावहिँ सेवा १
ओंकार चंटाधुनि बाजे सतगुण विष्णु आरती साजे ॥ २॥ शेष
महीकर कीन्हों भारा । सूर असखन ज्योति अपारा ॥ ३॥ शिव
सनकादिक मुनि ऋषि सारै । स्तुति ब्रह्मा वेद उचारे ॥ ४॥ ध्रुव
ग्रहलाद चैवर लिये ढारे । धूप दीप गणपति बिस्तारे ॥ ५॥ वरुण
इन्द्र पुहुपनकी माला । नाना रूप अनंत विशाला ॥ ६॥ व्यास
वसिष्ठ कपिल सत धारी । विविधि विधान सब साज सँवारी ॥ ७॥
शुकदेव नारद वेनु बजावैं । साहेब कवीर आरति गावैं ॥ १६ ॥
ऐसी आरति घुरै निसाना । सुनहु चितदै सन्त सुजाना ॥ १॥
जिह्वा वचन झूठ मति भाखो । सत्य शब्दमें चित दे राखो ॥ २॥
परधन त्यागो और पर नारी । शब्द अनाहद लेहु विचारी ॥ ३॥
काम क्रोध छाडो यह क्षण । हंस दशा धरि होहु सुलक्षण ॥ ४॥
तन मनसे परचे करु भाई । बिन परचे यम हाथ बिकार्ई ॥ ५॥
छाड़हु दूर दुरकेर बसेरा । उल्टा मिलै सो हंस हैं मेरा ॥ ६॥ पक्ष
वेष तजो चतुराई । सतसुकृत तब होहि सहाई ॥ ७ ॥ आशा
तृष्णा तजहु विकारा । सो ज्ञानी कहिये तत सारा ॥ ८ ॥ संत
विवेकी शीतल अंगा । अगर वास जस चन्दन संगा ॥ ९॥ प्रेम
प्रकाश भक्ति लौलीना । निर्मल हीरा न कबहुँ मलीना ॥ १० ॥