भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३१२)

॥६॥ पंचयै आरति पूरन प्यार । कहहिँ कवीर सो सबसे न्यार ॥ १४॥

संज्ञा आरति सुमिरण सोई । सुमिरण करत महाफल होई ॥ १॥

पहिली आरती प्रेम प्रकाशा । कर्म भर्म सब कीन्ह विनाशा ॥ २॥

दूसरी आरति दिलहीमें देवा । योग मुक्तिसे करले सेवा ॥ ३ ॥

तीसरी आरति त्रिभुवन सूझे । गुरुगमज्ञान अगोचर बूझे ॥ ४ ॥

चौथी आरति चहुँयुग पूजा । गुरु सम देव और नहीं दूजा ॥ ५॥

पंचयै आरति पद निरबाना । कहहीं कवीर (हंसा) लोकसमाना १६॥

आरती परम पुरुष निजदेवा । अनन्त कोटि जहां लावहिँ सेवा १

ओंकार चंटाधुनि बाजे सतगुण विष्णु आरती साजे ॥ २॥ शेष

महीकर कीन्हों भारा । सूर असखन ज्योति अपारा ॥ ३॥ शिव

सनकादिक मुनि ऋषि सारै । स्तुति ब्रह्मा वेद उचारे ॥ ४॥ ध्रुव

ग्रहलाद चैवर लिये ढारे । धूप दीप गणपति बिस्तारे ॥ ५॥ वरुण

इन्द्र पुहुपनकी माला । नाना रूप अनंत विशाला ॥ ६॥ व्यास

वसिष्ठ कपिल सत धारी । विविधि विधान सब साज सँवारी ॥ ७॥

शुकदेव नारद वेनु बजावैं । साहेब कवीर आरति गावैं ॥ १६ ॥

ऐसी आरति घुरै निसाना । सुनहु चितदै सन्त सुजाना ॥ १॥

जिह्वा वचन झूठ मति भाखो । सत्य शब्दमें चित दे राखो ॥ २॥

परधन त्यागो और पर नारी । शब्द अनाहद लेहु विचारी ॥ ३॥

काम क्रोध छाडो यह क्षण । हंस दशा धरि होहु सुलक्षण ॥ ४॥

तन मनसे परचे करु भाई । बिन परचे यम हाथ बिकार्ई ॥ ५॥

छाड़हु दूर दुरकेर बसेरा । उल्टा मिलै सो हंस हैं मेरा ॥ ६॥ पक्ष

वेष तजो चतुराई । सतसुकृत तब होहि सहाई ॥ ७ ॥ आशा

तृष्णा तजहु विकारा । सो ज्ञानी कहिये तत सारा ॥ ८ ॥ संत

विवेकी शीतल अंगा । अगर वास जस चन्दन संगा ॥ ९॥ प्रेम

प्रकाश भक्ति लौलीना । निर्मल हीरा न कबहुँ मलीना ॥ १० ॥