कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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भेद बतावे । पांच तत्त्व सुख भेद लखावे ॥ कहै कवीर हंसा पतियाय । धर्मदास आरती सखुपाय ॥ ७ ॥
ऐसी आरती देउँ लखाई । निरखत अघर ज्योति फैलाई ॥ गहु निरच्छर गहु निज डोरी । धरमरायसो तितुका तोरी ॥ जुग बाँधो निरखो टकसारा । जासै उत्तरो भवजल पारा ॥ कोट जनमको कर्म कटाये । चौदह काल जीत घर आये ॥ हीरा कोटि होय परकाशा । विना सुगंध पुहुपकी बासा ॥ चन्द्र लगन गहि करो प्रकाशा । चौदह यम तब माने त्रासा ॥ धरती धर्मनि उदित अकाशा । जापर सूरज करे प्रकाशा ॥ कहै कवीर सुनो धर्मदासा । जम जालिम माने त्रासा ॥ ८ ॥
आरति नाम निरन्तर भावे । तेतीसो मिलि मंगल गावे ॥ चितकर थार ज्योति जिव गाजे । शब्द अनाहद झालर बाजे ॥ घटहीमें यंत्र बजावइ बाजा । सतगुरु मिले भय सब भाजा ॥ बिन करताल पखावज बाजे । श्वेत सिंघासन छत्र विराजे ॥ कर सनमान जीव भये आगे । (साहेब) कवीर गुरुके चरनन लागे ॥ ९ ॥
आरति सतनामकी कीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ अग्रकी थाल अन्नपम बाती । ज्योति प्रकाश बरे दिन राती ॥ सुरली ध्वनि अन्नपम बाजे । शब्द अनाहद धुन तहाँ गाजे ॥ त्रिकुटी संगम झलके हीरा । चरन कमल चित राखु शरीरा ॥ सतसुकृत आरति चित दीजै । तन मन धनहि निछावर कीजै ॥ १० ॥
जाघर आरति दास करत हैं । जनम जनमको पाप हरत हैं ॥ कदलीदल पुहुपके द्वारा । सतसुकृत जाघर पग धारा ॥ परिमल अग्र गुलाल सुवासा । जा घर हंस करे सुखवासा ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । सप्त सिंघासन छत्र विराजे ॥ नाम एकोतर सुमिरे जबहीं । सतगुरु बैठ सिंहासन तबहीं । तत्वमता नरियर प्रवाना ।