कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
योगिनिकी भेस ॥२॥ तात मात कोइ संग नहिं, संग नहीं संग भाय । काम न काहु कुटुम्बसे, चली निसान बजाय ॥३॥ चाँद सूरजकी पालकी, तोह चढ़ि बैठी नार । सुखमनि संग सहेलरी, दुलहिनि उतरी पार ॥४॥ कमल जो फुले अकाशमें, अलि गुंजे चहुँ और । पियाको ले बैठी तहां, ढुरे सोहंगम चौर ॥ ५ ॥ सोहंगम मूरत मोर, हिरदय रही समाय । कहहिं कवीर धर्मदा-ससे, सो लीजे दरसाय ॥ ६ ॥
दीहल (७)
साखी-पांच सखीके संगमें, सासुर झगडा होय ।
भैंसुर घर मूसे सदा, काहि कहों दुख रोय ॥ ७ ॥
पांच सखी संग दुलहिनि, सासुर झगडा होय । भैंसुर चोर घर मूसई, काहि कहों दुख रोय ॥ टेक ॥ वासर चन्दा ऊगई, निशिमें ऊगै सूर । गङ्गा जमुना दोउ संग बहे, हंस गमन बढि दूर ॥ १ ॥ गंगा जमुनाके अन्तरे, पर्वत धवल सुजान । चितवत नजर न आवई, जमके अमल अमान ॥ २ ॥ ध्रुव मण्डल नहीं दरशई, नेत्र गुंज अनुसार । चित गहि चेतहु सन्त हो, मास पडे जम धार ॥ ३ ॥ श्वासा सूर न बन्द हो, केहरि बन्द न लेय । आठ पखहिंके भीतरे, हंस पयाना देय ॥ ४ ॥ कायापुर पाटन परिचय, कायाको एहि सुभाव । चित चेतो कडिहार हो, अवघट लगे न नाव ॥ ५ ॥ जैमुनि लगन सम्हारहु, सुमिरहु निर्गुण सार । पान छत्र पत साजहु, हंस उतारो पार ॥ ६ ॥ पच्छिम लहरि जोगावहु, पूरव चन्दा तान । निर्गुण शब्द उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ ७ ॥ चन्द उदय सुर आवे कूच नगारा होय । साहेब कवीर कहि दीहल, देखहु शब्द बिलोय ॥