कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीहल (८)
साखी-आरति साजहु दुलहिनी, आवहि कन्त सनेर । निर्गुन मङ्गल गावहु, अब जनि लावहु बेर ॥ ८ ॥
दीहल (९)
साखी-यहि बिधि श्वास विचार है, सुनहु सन्त मतिधीर । साधन करिके जानि हो, रहे कि जाय शरीर ॥ ९ ॥ ❁
शब्द नारियर ॥ १ ॥
साखी-मोरहु नारियर मोरहु, आपन अंश बचाय । बिना शब्द जो मोरहु, जिव परलय तर जाय ॥
मोरहु नारियर मोरहु, आपन अंश बचाय । बिना शब्द जनि मोरहु, जिव परलय तर जाय ॥ टेक ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामैं एक हमार । आपन अंश बचाय के, यमके अंश निनार ॥ १ ॥ जमके अमल मिटावहु, बत्तिस पवन विलोय । नीर नेह निर्वारहु, चलहु महा तम खोय ॥ २ ॥ धरती रेख सुधारहु, पुरुष पवन अनुमान । बिना भेद जनि मोरहु, जीव एको तर हान ॥ ३ ॥ सोहं को निज गहिरहु, नारियर बास समोय । तीनो तत्व सुधारहु, काल निकट नहिं होय ॥ ४ ॥ धरती गुण गहि प्रगटहु, करौ शब्द परकास । साहिब कवीर कहि दीहल दिठ मानहु धर्मदास ॥ ५ ॥
आरती ॥ १ ॥
साखी-आरति सत्य कवीरकी, जा घर होय प्रकाश ।
दुःख दरिद्र आपे भगे, पूरे मनकी आश ॥ १ ॥
मङ्गल रूप आरति साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥ टेक ॥ अछै वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥ १ ॥ निशि वासर जहाँ सूर्य न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करहि अनन्दा ॥ २ ॥ तन मन धन जिन अर्पण कीन्हा । परम
- नोट-इसके आगेके दीहल सब पहिले पृष्ठ ३४३ से आरंभ होकर बहुत आ गये हैं तो देख लेना चाहिये और भी पांचवें छठे खण्डमें आनेवाले हैं वहाँ से देख लेना.