भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ ३ ॥ जरा मरणके संशय भेटे । सुरत सन्तायन सतगुरु भेटे ॥ ४ ॥ कहहिँ कबीर हिरम्बर होई ॥ निरखि नाम निज सुमिरे सोई हो ॥ ५ ॥ १ ॥

अथ डोरी पद प्रारम्भः ।

चलाना चौकाका पद डोरी ॥ १ ॥

साखी-अबकी बार उबारिये, अर्जी दीन दयाल ।

जगमें कोई है नहीं, तुमरे सरिस कृपाल ॥ १ ॥

अबकी बार उबारिये, मेरी अर्जी दीन दयाल ॥ टेक ॥ आई थी ओहि देशसे, भई परदेशी नारि । वह मारग मैं भूलियाँ, बिसरि गई निज बारि ॥ १ ॥ युगन युगन भ्रमत फिरी, जमके हाथ बिकाय । कर जोरे बिनती कहैं, मोहि मिलि बिछुड़ि जनि जाय ॥ २ ॥ विषम नदी विकराल है, बहुत कटरिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ ३ ॥ शब्द जहाज कबीरके सदगुरु खेवन हार । जो कोई हंसा आवई, पलमें लेहि उबार ॥ ४ ॥

साखी-चली पूतली लवणकी, थाह सिन्धुको लैन ।

आपे गलि पानी भई, उलटि कहे को बैन ॥ २ ॥

पद डोरी ॥ २ ॥

उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।

हंस चला घर आपने, काल रहा शिर कूट ॥ ३ ॥

नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन बर जाय ॥ टेक ॥ पानीसे पैदा किया, नख शिख अंग बनाय । उस साहिबको बिसारिया, ( तेरो ) गाढमें होय सहाय ॥ १ ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब यम बैठे कण्ठमें, कोह न आवे काम ॥ २ ॥ मातु पिता सुत बान्धवा, और दुलारी नारि । यह सब हिलि मिलि बीछुडे, शोभा है दिन चारि ॥ ३ ॥ जैसे लागी