कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(३३६)
कबीरपंथी—
पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ ३ ॥ जरा मरणके संशय भेटे । सुरत सन्तायन सतगुरु भेटे ॥ ४ ॥ कहहिँ कबीर हिरम्बर होई ॥ निरखि नाम निज सुमिरे सोई हो ॥ ५ ॥ १ ॥
अथ डोरी पद प्रारम्भः ।
चलाना चौकाका पद डोरी ॥ १ ॥
साखी-अबकी बार उबारिये, अर्जी दीन दयाल ।
जगमें कोई है नहीं, तुमरे सरिस कृपाल ॥ १ ॥
अबकी बार उबारिये, मेरी अर्जी दीन दयाल ॥ टेक ॥ आई थी ओहि देशसे, भई परदेशी नारि । वह मारग मैं भूलियाँ, बिसरि गई निज बारि ॥ १ ॥ युगन युगन भ्रमत फिरी, जमके हाथ बिकाय । कर जोरे बिनती कहैं, मोहि मिलि बिछुड़ि जनि जाय ॥ २ ॥ विषम नदी विकराल है, बहुत कटरिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ ३ ॥ शब्द जहाज कबीरके सदगुरु खेवन हार । जो कोई हंसा आवई, पलमें लेहि उबार ॥ ४ ॥
साखी-चली पूतली लवणकी, थाह सिन्धुको लैन ।
आपे गलि पानी भई, उलटि कहे को बैन ॥ २ ॥
पद डोरी ॥ २ ॥
उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।
हंस चला घर आपने, काल रहा शिर कूट ॥ ३ ॥
नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन बर जाय ॥ टेक ॥ पानीसे पैदा किया, नख शिख अंग बनाय । उस साहिबको बिसारिया, ( तेरो ) गाढमें होय सहाय ॥ १ ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब यम बैठे कण्ठमें, कोह न आवे काम ॥ २ ॥ मातु पिता सुत बान्धवा, और दुलारी नारि । यह सब हिलि मिलि बीछुडे, शोभा है दिन चारि ॥ ३ ॥ जैसे लागी