कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ओरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, ( भावे ) हार होय की जीत ॥ ४ ॥
पद डोरी ॥३॥
साखी-हंसा छूटे बाज ज्यों, कोटि सिन्धुके जोर । सुमिरत दीन दयालके, पहुँचि गया निज ठौर ॥ ४ ॥
शब्द सिंहासन पाटमें ( तुम ) हंसा बैठो आय ॥ टेक ॥ कौन नाम सुक्तामणि, कौन नाम वो अंस । कौन नाम वह पुरुष है, कौन नाम वो हंस ॥ १ ॥ अजर नाम सुक्तामणि, ऊग्र नाम वो अंस । ज्ञानी नाम वह पुरुष है, सुरत नाम वह हंस ॥२॥ मूल द्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पाहिँ । बैठे हंस उबारहीं, सोहंगमकी बाँह ॥३॥ जम्बु द्वीपके हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । कहहिँ कवीर धर्मदाससे, लावहु बाँह चढाय ॥ ४ ॥
साखी-अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल छय होय । जिहिँ सतगुरु बहियाँ मिले, हंस न जाय विगोय ॥ ५ ॥
पद डोरी ॥ ४ ॥
हंसा दुर्मति छाड़िदे, तू तो निर्मल होय घर आव ॥ टेक ॥ दूधहिसे दधि होतु है, दधि मथि माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुरि न छाँछ समोय ॥ १ ॥ ऊखहिँसे गुड़ होत है, गुड़से खाड़ हो जाय । सतगुरु मिलि मिश्री भई, बहुरि न ऊख समाय ॥ २ ॥ चीनी छिटकी रेतमें, गज मुख चुनी न जाय । जात बरण कुल खोयके, चींटी होय चुनि खाय ॥ ३ ॥ दाग जु लागी नीलकी, नौ मन साबुन धोय । कोटि यतन प्रबोधिये, कागा हंस न होय ॥ ४ ॥ कहहिँ कविर सुनु केसवा, तेरी गती अपार । बाप विनौला होय रहे, पूत भये चौतार ॥ ५ ॥