कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
पद डोरी ॥ ५ ॥
साखी-उत्तर घाटी ऊतरे, पांजी बैठे जाय ।
तहँवाँ सुरति लगायके, पुरुषहि परसे पांय ॥ ६ ॥
शब्द सनेही हँसा, तुम जग तजि होय रहु न्यार ॥ टेक ॥ सत्य निज डोर है, तुम हँसा गहो बनाय । सत बीरा निज नाम है, चाखतही घर जाय ॥ १ ॥ बिना बीजके जामई, बिनु अंकुरके झार । बिनु ढण्डी फल लागिया, साधू करहिं बिचार ॥ २ ॥ अजरहिके अंकुर भये, अजरहिकी लागी डार । अजर फूल फल लागिया, साधू करहिं अहार ॥ ३ ॥ मोहि अजर कर जानहु, अम्बर देउ बताय । जिहि भाण्डे निज साँच है, तामैं रहो समाय ॥ ४ ॥ कहहिं कवीर धर्मदाससे, बेगि जाहु संसार । सोहंगमकी बाँहसे, हँस उतारहु पार ॥ ५ ॥
पद डोरी ॥ ६ ॥
साखी-बीरा बद जिन जानहु, पुरुष नाम निज मूल ।
जा दिन हँसा तन तजे, मेटे संशय शूल ॥ ७ ॥
कौन मिलावे योगिया, योगिया बिनु रहल न जाय ॥ टेक ॥ हौं हरिनी पिया पारधी, मारा शब्दके बान । जाहि लगे सोह जानिया, और दरद नहिं आन ॥ १ ॥ पिया कारण पियरी भई, लोग कहें तन रोग । जप तप लंघन मैं करौं, पिया मिलनके योग ॥ २ ॥ हौं तो पियासी पीवकी, रटौं सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीवउँ, (न तु) सहजे त्यागौं जीव ॥ ३ ॥ कहहिं कवीर सुनु योगिनी, तनीमें मनहि समाय । पिछली प्रीतिके कारणे, योगी मिलेंगे आय ॥ ४ ॥
पद डोरी ॥ ७ ॥
साखी-साथी नाद कवीर हौं, विन्दहिं देहु न भार ।
युग युग हँसा हिरम्बर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥