भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३३९)

ज्ञान रतनकी आंखिया, देखहु यमको जाल ॥ टेक ॥ यमके फन्दा काटहु हंसा, जग तजि होहु न्यार। सतगुरु दर्शन देईगे, उत्तरो भवजल पार ॥ १ ॥ जो तुम हंसा चाहो निर्गुण, सर्गुण करहु विचार। निर्गुण सर्गुण छोड़िके, तुम दोउ तजि होय रहु निनार ॥ २ ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भमर गुफाके घाट। सहस्र पांखुरिका कमल है, पछिम दिशाके बाट ॥ ३ ॥ नौ खण्ड हेतु विसारहु हंसा, शब्द सुरति चित धार। कह कवीर धर्मदाससे, उत्तरो भवजल पार ॥ ४ ॥

पद डोरी ॥ ८ ॥

शाखी-चलु सखि चौपर खेलिये, तन मन बाजी लाय।

सतगुरुके ठिग खेलते, दुर्मति जाय नशाय ॥ ९ ॥

चलु सखि चौपर खेलिये, तन धनसे बाजी लाय ॥ टेक ॥ चौपर खेले शुन्यमें, खेले दिन औ रात। चल हंसा घर आपनो, जहँ तेरी उत्पात ॥ १ ॥ चौपर खेलौं पीवसे, बाजी लगावौं जीव। जो हारौं तो पीवकी, जीतौं तो मोर पीव ॥ २ ॥ चार गली घर एक है, चार वरण इक सार। पासो डारौं प्रेमका, जीति चले सोइ नार ॥ ३ ॥ चौपरियाके खेलमें, युगन युगनके दाव। नरद अकेली होय रही, छिन पल खावे घाव ॥ ४ ॥ चौरासी घर भरमिके, पौ में अटकी आय। अबकी पौ जो ना पड़े, फिर चौरासी जाय ॥ ५ ॥ पगरासे बाजी लगी, पड़े अठारह दाव। सार गँवाई हाथसे, शिर ऊपर लग घाव ॥ ६ ॥ जाति वरण कुल मेटिके, पाई भक्ति अटूट। कह कविर धर्मदाससे, कोइ न पकड़े खूँट हो ॥ ७ ॥

॥ इति चलावा चौकाका पद समाप्त ॥

१ उत्पत्ति। २ गोदी चौपडकी।