कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
शब्द व्यञ्जन भोग ॥ १ ॥
मेरे सतगुरु आये द्वार हो रसके व्यञ्जना । सखि, काहेकी बैठक देउँ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १ ॥ चंदन पिठिया गुरुकी बैठका रसके व्यञ्जना । सखि नीरन चरण पखाह, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ २ ॥ भात राँधों रस दूधमें, रसके व्यञ्जना । सखि धोय मूँगकी दाल, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ३ ॥ काहेके थार परोसों, हो रसके व्यञ्जना । सखि, काहेके कटोरेमें दूध, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ४ ॥ सोनेके थार परोसों, हो रसके व्यञ्जना । सखि, रूपे कटोरेमें दूध, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ५ ॥ जिमि लेहु सतगुरु पाहुना, रसके व्यञ्जना । सखि, मुख भरि देहु आशीष, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ६ ॥ पाथरको क्या पूजनों, रसके व्यञ्जना । सखि मुख बोले नहीं खाय, सुरतके व्यञ्जना ॥ ७ ॥ सांचे पूजहु साधुको, रसके व्यञ्जना । सखि, मुख बोले अरु खाय, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ८ ॥ खाय पियाय मुख सेज में, रसके व्यञ्जना । सखि, करिले शब्द सिंगार, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ९ ॥ पानन बिरिया खवाउँ, हो रसके व्यञ्जना । सखि, दौय कर चरण दबाउँ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १० ॥ व्यञ्जना २ सब कोई कहे, रसके व्यञ्जना । सखि, व्यञ्जना लखे नहीं कोइ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ११ ॥ कहहिँ कविर धर्मदाससे, रसके व्यञ्जना । सखि, रहत अमर पुर छाय, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १२ ॥
व्यञ्जन भोग ॥ २ ॥
सतके भोग दयाके व्यञ्जन, तुमको मालुम होय । महा पुरुष मानिये निज सोय ॥ टेक ॥ इंगला पिगला चौका पोते, क्षमा मंत्र जल ठार ॥ महा ० ॥ १ ॥ बलकी फूक अकिलकी आग, चाहकी चुल्हा सद्धार ॥ महा ० ॥ २ ॥ तिल दयाकी दाल बनी है लक्षके