भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३४१)

लवण मिलाय ॥ महा० ॥ ३ ॥ मनसा हींग डारु व्यञ्जनमें, चहुँ दिशि बास उड़ाय ॥ महा० ॥ ४ ॥ भाव भक्ति चूत निर्मल नीरा, लै गडुआ जल ढार ॥ महा० ॥ ५ ॥ आसन मूल बैठ हट अविचल सुषमन, बांह पसार ॥ महा० ॥ ६ ॥ सुरत निरत दाय पाक सँवारे, सन्त परोसहि थार ॥ महा० ॥ ७ ॥ सतसुकृत जहाँ भोजन पावे, घर माणिक उजियार ॥ महा० ॥ ८ ॥ सकल सन्त मिलि आरति उतारे, गावहि मङ्गल चार ॥ महा० ॥ ९ ॥ कह कवीर जो सतगुरु सेवे, सो सतलोक सिधार ॥ महा० ॥ १० ॥

व्यञ्जन भोग ॥ ३ ॥

सत्यपुरुषको भोग लागे, शब्द अनाहद घण्टा बाजे ॥ सतपु० ॥ प्रेम सुरतसे कियो है रसोई । अमृत भोजन पारस होई ॥ १ ॥ कंचन झारी सुकृत थार । जेवन बैठहि सिर्जन हार ॥ सतपु० ॥ २ ॥ जेवहि धनी सन्त सब संग । गावहीं दास सुख प्रेम उमंगा ॥ ३ ॥ पाय प्रसाद जल अचवन कीन्हा । महा प्रसाद दासको दीन्हा ॥ ४ ॥ तबसे काल भयो है आधीना, जबसे हंस भयो प्रवीना ॥ ५ ॥ कहहि कवीर पूरण भौभाग, जब सतगुरु मस्तक दियो जाग ॥ ६ ॥

शब्द अचवन ॥ १ ॥

सेवक लिये प्रेम जल झारी, खरिचा ब्रह्मज्ञान ॥ सो लेय अचवन कीजे, गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥ भाव भक्तिसे बीरा लीजे, सन्तन जीवन प्राण ॥ महा० ॥ अमी उतारि दासको दीजे, जनको परम कल्याण ॥ सो अचमन० ॥ १ ॥ हृदय विच पल्लांग बिछावों, पीठो पुरुष पुराण ॥ महा० ॥ चरण कमलकी सेवा करौ, दासातन प्रमाण ॥ सो अचमन० ॥ २ ॥ सुरतिके बेनिया डोलछै मैं ठाढी, एक टक लागे ध्यान । महा० ॥ धर्मदास पर दायो कीजे, पूरण पद निर्वान ॥ सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ ३ ॥