कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
( ३३७ )
ओरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, ( भावे ) हार होय की जीत ॥ ४ ॥
पद डोरी ॥३॥
साखी-हंसा छूटे बाज ज्यों, कोटि सिन्धुके जोर । सुमिरत दीन दयालके, पहुँचि गया निज ठौर ॥ ४ ॥
शब्द सिंहासन पाटमें ( तुम ) हंसा बैठो आय ॥ टेक ॥ कौन नाम सुक्तामणि, कौन नाम वो अंस । कौन नाम वह पुरुष है, कौन नाम वो हंस ॥ १ ॥ अजर नाम सुक्तामणि, ऊग्र नाम वो अंस । ज्ञानी नाम वह पुरुष है, सुरत नाम वह हंस ॥२॥ मूल द्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पाहिँ । बैठे हंस उबारहीं, सोहंगमकी बाँह ॥३॥ जम्बु द्वीपके हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । कहहिँ कवीर धर्मदाससे, लावहु बाँह चढाय ॥ ४ ॥
साखी-अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल छय होय । जिहिँ सतगुरु बहियाँ मिले, हंस न जाय विगोय ॥ ५ ॥
पद डोरी ॥ ४ ॥
हंसा दुर्मति छाड़िदे, तू तो निर्मल होय घर आव ॥ टेक ॥ दूधहिसे दधि होतु है, दधि मथि माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुरि न छाँछ समोय ॥ १ ॥ ऊखहिँसे गुड़ होत है, गुड़से खाड़ हो जाय । सतगुरु मिलि मिश्री भई, बहुरि न ऊख समाय ॥ २ ॥ चीनी छिटकी रेतमें, गज मुख चुनी न जाय । जात बरण कुल खोयके, चींटी होय चुनि खाय ॥ ३ ॥ दाग जु लागी नीलकी, नौ मन साबुन धोय । कोटि यतन प्रबोधिये, कागा हंस न होय ॥ ४ ॥ कहहिँ कविर सुनु केसवा, तेरी गती अपार । बाप विनौला होय रहे, पूत भये चौतार ॥ ५ ॥
( ३३८ )
कवीरपंथी—
पद डोरी ॥ ५ ॥
साखी-उत्तर घाटी ऊतरे, पांजी बैठे जाय ।
तहँवाँ सुरति लगायके, पुरुषहि परसे पांय ॥ ६ ॥
शब्द सनेही हँसा, तुम जग तजि होय रहु न्यार ॥ टेक ॥ सत्य निज डोर है, तुम हँसा गहो बनाय । सत बीरा निज नाम है, चाखतही घर जाय ॥ १ ॥ बिना बीजके जामई, बिनु अंकुरके झार । बिनु ढण्डी फल लागिया, साधू करहिं बिचार ॥ २ ॥ अजरहिके अंकुर भये, अजरहिकी लागी डार । अजर फूल फल लागिया, साधू करहिं अहार ॥ ३ ॥ मोहि अजर कर जानहु, अम्बर देउ बताय । जिहि भाण्डे निज साँच है, तामैं रहो समाय ॥ ४ ॥ कहहिं कवीर धर्मदाससे, बेगि जाहु संसार । सोहंगमकी बाँहसे, हँस उतारहु पार ॥ ५ ॥
पद डोरी ॥ ६ ॥
साखी-बीरा बद जिन जानहु, पुरुष नाम निज मूल ।
जा दिन हँसा तन तजे, मेटे संशय शूल ॥ ७ ॥
कौन मिलावे योगिया, योगिया बिनु रहल न जाय ॥ टेक ॥ हौं हरिनी पिया पारधी, मारा शब्दके बान । जाहि लगे सोह जानिया, और दरद नहिं आन ॥ १ ॥ पिया कारण पियरी भई, लोग कहें तन रोग । जप तप लंघन मैं करौं, पिया मिलनके योग ॥ २ ॥ हौं तो पियासी पीवकी, रटौं सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीवउँ, (न तु) सहजे त्यागौं जीव ॥ ३ ॥ कहहिं कवीर सुनु योगिनी, तनीमें मनहि समाय । पिछली प्रीतिके कारणे, योगी मिलेंगे आय ॥ ४ ॥
पद डोरी ॥ ७ ॥
साखी-साथी नाद कवीर हौं, विन्दहिं देहु न भार ।
युग युग हँसा हिरम्बर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥
शब्दावली
(३३९)
ज्ञान रतनकी आंखिया, देखहु यमको जाल ॥ टेक ॥ यमके फन्दा काटहु हंसा, जग तजि होहु न्यार। सतगुरु दर्शन देईगे, उत्तरो भवजल पार ॥ १ ॥ जो तुम हंसा चाहो निर्गुण, सर्गुण करहु विचार। निर्गुण सर्गुण छोड़िके, तुम दोउ तजि होय रहु निनार ॥ २ ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भमर गुफाके घाट। सहस्र पांखुरिका कमल है, पछिम दिशाके बाट ॥ ३ ॥ नौ खण्ड हेतु विसारहु हंसा, शब्द सुरति चित धार। कह कवीर धर्मदाससे, उत्तरो भवजल पार ॥ ४ ॥
पद डोरी ॥ ८ ॥
शाखी-चलु सखि चौपर खेलिये, तन मन बाजी लाय।
सतगुरुके ठिग खेलते, दुर्मति जाय नशाय ॥ ९ ॥
चलु सखि चौपर खेलिये, तन धनसे बाजी लाय ॥ टेक ॥ चौपर खेले शुन्यमें, खेले दिन औ रात। चल हंसा घर आपनो, जहँ तेरी उत्पात ॥ १ ॥ चौपर खेलौं पीवसे, बाजी लगावौं जीव। जो हारौं तो पीवकी, जीतौं तो मोर पीव ॥ २ ॥ चार गली घर एक है, चार वरण इक सार। पासो डारौं प्रेमका, जीति चले सोइ नार ॥ ३ ॥ चौपरियाके खेलमें, युगन युगनके दाव। नरद अकेली होय रही, छिन पल खावे घाव ॥ ४ ॥ चौरासी घर भरमिके, पौ में अटकी आय। अबकी पौ जो ना पड़े, फिर चौरासी जाय ॥ ५ ॥ पगरासे बाजी लगी, पड़े अठारह दाव। सार गँवाई हाथसे, शिर ऊपर लग घाव ॥ ६ ॥ जाति वरण कुल मेटिके, पाई भक्ति अटूट। कह कविर धर्मदाससे, कोइ न पकड़े खूँट हो ॥ ७ ॥
॥ इति चलावा चौकाका पद समाप्त ॥
१ उत्पत्ति। २ गोदी चौपडकी।
(३४०)
कवीरपंथी-
शब्द व्यञ्जन भोग ॥ १ ॥
मेरे सतगुरु आये द्वार हो रसके व्यञ्जना । सखि, काहेकी बैठक देउँ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १ ॥ चंदन पिठिया गुरुकी बैठका रसके व्यञ्जना । सखि नीरन चरण पखाह, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ २ ॥ भात राँधों रस दूधमें, रसके व्यञ्जना । सखि धोय मूँगकी दाल, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ३ ॥ काहेके थार परोसों, हो रसके व्यञ्जना । सखि, काहेके कटोरेमें दूध, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ४ ॥ सोनेके थार परोसों, हो रसके व्यञ्जना । सखि, रूपे कटोरेमें दूध, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ५ ॥ जिमि लेहु सतगुरु पाहुना, रसके व्यञ्जना । सखि, मुख भरि देहु आशीष, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ६ ॥ पाथरको क्या पूजनों, रसके व्यञ्जना । सखि मुख बोले नहीं खाय, सुरतके व्यञ्जना ॥ ७ ॥ सांचे पूजहु साधुको, रसके व्यञ्जना । सखि, मुख बोले अरु खाय, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ८ ॥ खाय पियाय मुख सेज में, रसके व्यञ्जना । सखि, करिले शब्द सिंगार, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ९ ॥ पानन बिरिया खवाउँ, हो रसके व्यञ्जना । सखि, दौय कर चरण दबाउँ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १० ॥ व्यञ्जना २ सब कोई कहे, रसके व्यञ्जना । सखि, व्यञ्जना लखे नहीं कोइ, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ ११ ॥ कहहिँ कविर धर्मदाससे, रसके व्यञ्जना । सखि, रहत अमर पुर छाय, सुरत रसके व्यञ्जना ॥ १२ ॥
व्यञ्जन भोग ॥ २ ॥
सतके भोग दयाके व्यञ्जन, तुमको मालुम होय । महा पुरुष मानिये निज सोय ॥ टेक ॥ इंगला पिगला चौका पोते, क्षमा मंत्र जल ठार ॥ महा ० ॥ १ ॥ बलकी फूक अकिलकी आग, चाहकी चुल्हा सद्धार ॥ महा ० ॥ २ ॥ तिल दयाकी दाल बनी है लक्षके
शब्दावली
(३४१)
लवण मिलाय ॥ महा० ॥ ३ ॥ मनसा हींग डारु व्यञ्जनमें, चहुँ दिशि बास उड़ाय ॥ महा० ॥ ४ ॥ भाव भक्ति चूत निर्मल नीरा, लै गडुआ जल ढार ॥ महा० ॥ ५ ॥ आसन मूल बैठ हट अविचल सुषमन, बांह पसार ॥ महा० ॥ ६ ॥ सुरत निरत दाय पाक सँवारे, सन्त परोसहि थार ॥ महा० ॥ ७ ॥ सतसुकृत जहाँ भोजन पावे, घर माणिक उजियार ॥ महा० ॥ ८ ॥ सकल सन्त मिलि आरति उतारे, गावहि मङ्गल चार ॥ महा० ॥ ९ ॥ कह कवीर जो सतगुरु सेवे, सो सतलोक सिधार ॥ महा० ॥ १० ॥
व्यञ्जन भोग ॥ ३ ॥
सत्यपुरुषको भोग लागे, शब्द अनाहद घण्टा बाजे ॥ सतपु० ॥ प्रेम सुरतसे कियो है रसोई । अमृत भोजन पारस होई ॥ १ ॥ कंचन झारी सुकृत थार । जेवन बैठहि सिर्जन हार ॥ सतपु० ॥ २ ॥ जेवहि धनी सन्त सब संग । गावहीं दास सुख प्रेम उमंगा ॥ ३ ॥ पाय प्रसाद जल अचवन कीन्हा । महा प्रसाद दासको दीन्हा ॥ ४ ॥ तबसे काल भयो है आधीना, जबसे हंस भयो प्रवीना ॥ ५ ॥ कहहि कवीर पूरण भौभाग, जब सतगुरु मस्तक दियो जाग ॥ ६ ॥
शब्द अचवन ॥ १ ॥
सेवक लिये प्रेम जल झारी, खरिचा ब्रह्मज्ञान ॥ सो लेय अचवन कीजे, गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥ भाव भक्तिसे बीरा लीजे, सन्तन जीवन प्राण ॥ महा० ॥ अमी उतारि दासको दीजे, जनको परम कल्याण ॥ सो अचमन० ॥ १ ॥ हृदय विच पल्लांग बिछावों, पीठो पुरुष पुराण ॥ महा० ॥ चरण कमलकी सेवा करौ, दासातन प्रमाण ॥ सो अचमन० ॥ २ ॥ सुरतिके बेनिया डोलछै मैं ठाढी, एक टक लागे ध्यान । महा० ॥ धर्मदास पर दायो कीजे, पूरण पद निर्वान ॥ सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ ३ ॥
(३४२)
कवीरपंथी—
शब्द घुन ॥ १ ॥ राग सारंग—(समय मध्याह्न काल)
भाग जाके सन्त पाहुने आवें । द्वारे कथा कीरतन करहीं, हिलमिल मंगल गावें ॥ १ ॥ काम क्रोध मद मान कल्पना, दुर्मति दूर बहावें ॥ राग द्वेष परनिन्दा तजिके, सत उपदेश लिखावें ॥ २ ॥ प्रथम लाभ चरणोदक लैकरि, जो कोइ शीश चढावें ॥ कोटिन तीरथको कर सहजहिं, सो घर बैठे पावें ॥ ३ ॥ खीर खांड पकवान मिठाई, लखि नहिं हेत बढावें ॥ रूखा सूखा शाकपत्र अति, हितसे भोग लगावें ॥ ४ ॥ महा प्रसाद देवनको दुर्लभ, सन्त सदा सो पावें ॥ दुष्ट सदा दुर्मतिके घरे, मिथ्या जन्म गवावें ॥ ५ ॥ गुरु प्रतापसे पूर्वकी सुकृत, कर्म उदय हो आवें ॥ कहैं कवीर साधु मूरति धरि, साहिब दर्श दिखावें ॥ ६ ॥
॥ शब्द घुन ॥ २ ॥
भाग जाको सन्त पाहुने आवें ॥ द्वारहिं होत कथा अरु कीरतन, हिलिमिल मंगल गावें ॥ भाग० ॥ १ ॥ प्रथमहिं लाभ शीत चरणाभृत, महा प्रसादको पावें ॥ भाग० ॥ जेहि कारण योगि जप तप करहीं, सो फल साधु जिमावें ॥ भाग० ॥ २ ॥ खीर खांड घृत अमृत भोजन, सन्त सदा यहि पावें ॥ भाग० ॥ दुष्ट सदा दुर्मतिके घरे, मिथ्या जन्म गवावें ॥ भाग० ॥ ३ ॥ शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सतगुरु यही लखावें ॥ भाग० ॥ कहहिं कवीर सन्तनकी महिमा, साधुमें साहेब पावें ॥ भाग० ॥ ४ ॥
शब्द घुन ॥ ३ ॥
सोहं हंसा सकल समाना । कायाके गुण आनहिं आना ॥ सोहं० ॥ टेक ॥ माटी एक सकल संसारा । आन आन बासन गढे कुम्हारा ॥ सोहं० ॥ १ ॥ सरिता सिन्धु औ कूप तलाई । एकै नीर सकल रहु छाई ॥ सोहं० ॥ २ ॥ पांच बरणकी दुहिये गाय । श्वेत दूध देखि मन पतियाय ॥ सोहं० ॥ ३ ॥ कहहिं कवीर संशय करू दूरी । सब घट ब्रह्म रहा भरपूरी ॥ ४ ॥
शब्दावली
(३४३)
शब्द धुन ॥ ४ ॥
बोलो साधु सतनाम साहिब कवीर बन्दि छोर कवीर॥ टेक॥ अकह नाम अभिअन्तर सारो। सुकृतनाम बन्दि छोर तुम्हारो॥ १ ॥ सुकृत अर्चित नाम पतित उधारण। धनि धर्मदास साहेब हंस उबारण ॥२॥ आय सन्तको कीजे मिजमानी। उनके मुख कछु सुनिये बानी ॥३॥ जो तुम सहो जगतकी हांसी। बन्द छोडाय काटहि यम फांसी ॥४॥ साधु सन्त मिलि सुमिरों मोही। आपन करि प्रतिपालों तोही ॥५॥ तीरथ जाउँ नहि पूजों देवा। सब पर श्रेष्ठ सतगुरु पद सेवा ॥६॥ कहहि कवीर समुझ नर बौरे। नष्ट जाहु जनि मोर निहोरे ॥७॥
॥ शब्द गारी प्रारम्भः ॥
गारी ॥ १ ॥
जो तू भक्ति करनको चहतु है। निन्दासे नहिं डरिहो जी ॥ टेक ॥ पांच छडी कोई शिरपर मारे। सहत बने तो सहिहो जी ॥१॥ मूरख आगे ज्ञान न कथिहो। मौनी होके रहिहो जी ॥२॥ पर तिरियासे नेह न करिहो। देखत दुरिसे डरिहो जी ॥३॥ यह संसार विषयके कांटा। निरखि परखि पगु धरिहो जी ॥४॥ साहिब कवीरजीकी निर्गुण गारी। महरम होके बुझिहो जी ॥५॥
गारी ॥ २ ॥
देहु न देहु प्रभु जन अपनेको, सामरथके गुण गावहु जी है ॥ टेक ॥ गगन मण्डल मोरे सजन वसतु हैं, उनहुंको नौति बोलावहु जी ॥१॥ काम क्रोध मद लोभ पाँवरे, भीतर भवन बिछावहु जी ॥२॥ नयनके जलसे चरण पखारहु, चितके चौक बैठावहु जी ॥३॥ करनीके पातर कथनीके दोना, साखके सीक लगावहु जी ॥४॥ भावके भात अरु दाल दयाकी, शब्दके बरा
(३४४)
कवीरपंथी—
बनावहु जी ॥ ५ ॥ मनसा मारिके सरस बनावहु, प्रेमके घृत चुआवहु जी ॥ ६ ॥ सतके दूध रु करनीके खोआ, शूकर सुमति मिलावहु जी ॥ ७ ॥ यह सुख पाव जिमि सजन हमारो, श्वासकी बेनिया डोलावहु जी ॥ ८ ॥ शीश भार भरे जल अमृत, सजनको अचवन करावहु जी ॥ ९ ॥ पाँच पचीस पकड़ि नौ नारी, सजनको गारी गवावहु जी ॥ १० ॥ तत्व तमोधिनि सुधर सुमति ले, सजनको बिरिया खवावहु जी ॥ ११ ॥ एकइस खण्ड महलके भीतर, निर्भय पल्लंग बिछावहु जी ॥ १२ ॥ धर्मदास कहैं साहेब आये, सुक्ति पदारथ पावहु जी ॥ १३ ॥
गारी ॥ ३ ॥
सेवकके सतगुरु पाहुन आये। कालेकरउँ मिजमानी जी ॥ १ ॥ चरण धोय चरणामृत लेऊँ, तनकी तपन बुझावउँ जी ॥ २ ॥ चित चौका सन्तोष बैठिका, प्रेमके पातरि लावउँ जी ॥ ३ ॥ निरतिके गडुआ जल भरि लावउँ, परसहुँ सुरति सयानीजी ॥ ४ ॥ अकिलके आम रु नेहके नेसुआ, अदरख आदर मिलावउँजी ॥ ५ ॥ शीलके सेम रु भावके भण्टा, बनि है करार करैलाहुजी ॥ ६ ॥ धोयके डारो विचारके जलसे, कर्मनकी कडुआई जी ॥ ७ ॥ हियकी हलदी नामके नीमक, तत्वके तेलमें बघारहु जी ॥ ८ ॥ मनके मूंग मनसा मुँगौरा, प्रीतिके पापड लावहु जी ॥ ९ ॥ दिलकी दाल अरु हेतुके बरा, सुरतिके घृतमें छनावहु जी ॥ १० ॥ दयाके दही ले कढी बनावहु, तेहिमें बरा भिजावहुजी ॥ ११ ॥ दुबिधाकी लकड़ी बुद्धिसे चीरहु, ज्ञानकी अगिन जरावहुजी ॥ १२ ॥ महिमा पुरी मनोरथ चटनी, युक्ति जिलेबी लावहुजी ॥ १३ ॥ एत जेवनार बने घट भीतर, सतगुरु नेवति बुलावहुजी ॥ १४ ॥ साधु सन्त मिलि जेवन बैठे, छुटे प्रेम रस गारी जी ॥ १५ ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा, शोभा लेहु अधिकारीजी ॥ १६ ॥
शब्दावली
(३४५)
गारी ॥ ४ ॥
हौं मैं सत्यनामसे राजी । जासे जीती सारी बाजी ॥ १ ॥ मैं रतन अमोलक पाया । ताते कौडी हाथ न लाया ॥ २ ॥ मैं पहिरौं मुक्ता मोती । ताते छाडी कांचकी ज्योती ॥ ३ ॥ जहाँ ब्रह्मा विष्णु महेशा । हम छोडे तिनके देशा ॥ ४ ॥ जहाँ कोटि भानु प्रकाशा । तहाँ का दीपककी आशा ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लगी प्यारी ॥ ६ ॥
गारी ॥ ५ ॥
जाको चरणामृत लीजे । तिहिं गारी काहेको दीजे ॥ १ ॥ जासे मुक्ति पदारथ पव्ये । ताको हृदय माहिं समव्ये ॥ २ ॥ जाको लोभ मोह भर्मावे । ताको हीरा हाथ न आवे ॥ ३ ॥ जो काम क्रोध मद माता । सो बांधे जमपुर जाता ॥ ४ ॥ संसार जाल है भारी । मेरे सन्तनकी मति न्यारी ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लागे प्यारी ॥ ६ ॥
गारी ॥ ६ ॥
जोरा जोर जनावे, या माया पर पनचनिया ॥ दोय रूप बनावे, इक कनक इक कामिनिया ॥ १ ॥ इक जावे इक रहावे, इक संशय यह मारनिया ॥ ताको काटिये कैसा, संत जन लेउ विचारनिया ॥ १ ॥ चलि सतगुरु सरना, करिय जाय पुकारनिया ॥ हम माया फांसे, जन्म जन्म जम डांडनिया ॥ २ ॥ हम बहु दुख पाये, सतगुरु लेहु उबारनिया ॥ भइ अधरते वानी, विगसित कमल परकाशनिया ॥ ३ ॥ समरथ सुनि आये, विरह दुख द्रन्द निवारनिया ॥ हम हाहो दुख पावैं, सतगुरु ऊपर वारनिया ॥ ४ ॥ देहु अत्र बधाई, काम क्रोध दल मारनिया ॥ पद देह मवासी, कर देउ निस्तारनिया ॥ ५ ॥ कालहु शिर नाई, जे लूटे तिरदेवनिया । गावैं साहब कवीर, अब नहिं आऊं संसारनिया ॥ ६ ॥
(३४६)
कवीरपंथी—
गारी ॥ ७ ॥
अल मस्त दिवानी, हम लाल भई जोगिनियाँ ॥ टेक ॥ कर पंख डुरावैं, सोहें संग सहेलिनियाँ ॥ १ ॥ रस मगन भई है देखिके, साहबकी सेजडिया ॥ २ ॥ जहैं पवन न पानी, बिन बादर घन घेरनिया ॥ ३ ॥ जहैं सूर न चन्द, जहैं रैन न भोरनिया ॥ ४ ॥ जहैं काया न माया, करम नहीं जहैं लेखनिया ॥ ५ ॥ जहैं आप गुसाई, कोटि भानु परकासनिया ॥ ६ ॥ जहैं तम्बु तनाय, बिना मेखकी चाँदनिया ॥ ७ ॥ रंग सेज विछाइ, अधर नहि कोइ लागनिया ॥ ८ ॥ जहाँ चँवर डुरावैं, सुरति सोहें सहे- लिनिया ॥ ९ ॥ जहैं रमें कवीर, सुरति समानी शब्दनिया ॥ १० ॥
गारी ॥ ८ ॥
आय आय मेरे सतगुरु हो, कि हाथ लिये ज्ञानकी छडी ॥ १ ॥ तोरी जात जानू हो, कि रसिक राय शब्द घना ॥ २ ॥ तेरि माया परबल हो, कि घनेरा छन्द करै ॥ ३ ॥ अति नाच नचावे हो, कि भेष नटवा सम धरो ॥ ४ ॥ गुन तीनों रसिया हो, कि पल छिन रंग करै ॥ ५ ॥ पांचन संग राची हो, कि पचीसो तेरे संग चले ॥ ६ ॥ मन मस्त कुपलिया, कि चाली लंगर कौन घरा ॥ ७ ॥ तेतो नाह न चीन्हे हो, कि जाते डोली घराँ घराँ ॥ ८ ॥ चलु गगन महलमें हो, कि जहैं तेरो पीव बसै ॥ ९ ॥ जहैं रिम झिम वासे सो, कि मोती अजर झरै ॥ १० ॥ जहैं अनहद बाजे हो, कि शब्द झंकार करै ॥ ११ ॥ जहैं जगमगता उजियार हो, कि साधु जन ध्यान धरै ॥ १२ ॥ तू तो पिप पिप बोलिहो, कि अमृत रस पिपत फिरै ॥ १३ ॥ जहैं साहब कविरजी हो, कि ओहं सोहं चँवर डुरै ॥ १४ ॥
गारी ॥ ९ ॥
टक रंग महलमें आव, कि निरगुन सेज बिछी ॥ जहाँ पवन
सन्दावली
(३४७)
गमन नहि होय, तहां मेरि सुरति बसी ॥ जहँ निरगुन विन निर्वाण, जहां नहि सुर ससी ॥ जहां पाँच तत्त्व नहीं हो, मुक्तिकी होय हसी ॥ जहां पिप प्यारी मिलि एक, तो सोख्या अजब वनी ॥ जहां साहब कवीर गलतान, इच्छा द्वेत हरी ॥
॥ गारी १० ॥
तेरि मय्या मनिराम, गयी जुलाहाके पासवै ॥ हंसि सेज विछाइ, आयी जुलाहाकी ताक वै ॥ लगन और होनदे, उतरन द्वेत न ताप वै ॥ तेरी नली भइंगी ठीक, बुनौ चौतार वै ॥ नौतारको जामा, पचरंग सोहे पागवै ॥ तुम पहिरो मनिराम, मय्याके परसादवै ॥ सतनामको बुडला, सुमिरन पायल अस-वारवै ॥ चित चेतको चावक, देहु महाबल हाथवै ॥ लंगा हाकके घोडवा, अमर लोक चल जावै ॥
गारी ॥ ११ ॥
सुनि समझिले सुरत विचारी । तोको दीजै कहाकहि गारी ॥ घर आंगन झाड बुहारी । कर कूड़ा बाहर डारी ॥ घरके नाहिन अपने । कबहुँ ना भेटी सपने ॥ परपंची तीनों देवा । उनहु लह्यो न भेवा ॥ पाचन मिलि परपंच कौन्हा । सतसुकृत उनहु नहि चीन्हा ॥ ब्राह्मन छत्री वानी । तिनहुकी करी न कानी ॥ तुम रुंड मुंड बासी । तू करवा चौथ उपासी ॥ करवा चौथ अहोई । सब रांडनकी मति खोई ॥ कहैं कवीर ब्रह्मवानी । तै सुंहि सुनी औ जानी ॥
गारी ॥ १२ ॥
तुम पहिरो सुमति सिंगार, भजनकी चुनरिया ॥ तेरे ढिग ढिग विधि बिचार, पची सो घूँघरिया ॥ तेरे पायल गहर गंभीर, सदा सुख सेहडिया ॥ तेरेहि बडे हार हमेल, दयाकी टोलनिया ॥ तेरे त्रिकुटी तिलक संजोय, जगत मन मोहनिया ॥ दूध बेचन निकसी हो, सुमति भरि गवालनिया । आडे होय रहिय हो,
(३४८)
कवीरपंथी—
सतगुरु गैलनिया ॥ नहि नहि साहब हो, नहि भइ बोहनिया ॥ चलु गगन में हो, जहाँ तेरि वोहनिया ॥ जब गई गगनमें हो, गगनमें मगन भव्यनिया ॥ मैं बहुरि न आऊँ हो, भइयाकीसों वा गलिया ॥ ऐसे कहैं कवीर साहब हो, अटल भई गोवालनिया ॥
गारी ॥ १३ ॥
सुन समधिन चतुर सुजान, कहैं इक बात भली ॥ तु तो अजहूँ चेत सम्हारि, सपेदी बगर गयी ॥ तेरि खाल गई कुम्हलाय, ममता अजहुँ न मुखी ॥ चल गगन महलमें हो, निरगुन सेज विछी ॥ तेरि पायलकी झंकार, झहरमें रोर परी ॥ तेरे दो मारगके बीच, डगर इक ज्ञान गली ॥ तेरो हटकनहार कौन, निसा सो आवचली ॥ तोंसों कवीर कहैं समझाय, भजनकर घडी घडी ॥
गारी ॥ १४ ॥
सुनु समधिन संसे गारि । तोंसे बहुत विधि कहौं पुकारि ॥ एतो पीर पैगम्बर जोगी । तैं तो छलि बलि किये वियोगी ॥ एतो पारासरसे जोगी । तैं तो नाही काहूँको छोडी ॥ एतो शृंगी रिषि ब्रह्मचारी । तैं तो उनहूँकी करी खुवारी ॥ ऐसे कहैं कवीर बू दारी । मेरे साधासो बहुत विधि हारी ॥
गारी ॥ १५ ॥
तुम समझो कुमति देवरानी । तेरि कीरति जगत बखानी ॥ तेरे काम क्रोध दोउ भाई । हिरनाकुस मारि बहाई ॥ जोगी शिवशंकर ध्यानी । तेरी गति मति उनहूँ न जानी ॥ तुम रावनके घर आई । तुम सीता हरन कराई ॥ तुम पंडवनके घर आई । उन पासे खेल हराई ॥ तुम कौरवनके घर आई । सब कुनबा नाश कराई ॥ तोंसों कहैं कवीर समझाई । नकटी तोहि लाज न आई ॥
गारी ॥ १६ ॥
धनि आय सम्हारो हो, घरकी खबर भई ॥ आय धाय गहो गुरुके चरन, दया करि लइ अपनी ॥ गुरुतत्व लखायो हो, खडी
शब्दावली
(३४९)
भयी ज्ञान गली ॥ जब तत सम्हारी हो, कि सन्मुख पीवसो भयी ॥ संतोष सिला पर हो, कि षटकी पांच जनी ॥ सब मारे पिसनिया हो, कि सिलकी सांग हनी ॥ धसि आय महलमें हो, कि गगनमें मगन भई ॥ साधु तुम जिन जानो गारि, कि सुक्तिकी राह कही ॥ तो सो कहैं कविर समझाय, कि याही मत आव चली ॥
गारी ॥ १७ ॥
सुनु समधिन चतुर, अइलों मैं तोरे आंगना ॥ तेरे अंगना समधिन तीव्र छन्दना तै तो कहा रची जिवनार, पाहुन आये संतजना ॥ टे० ॥ समधी हमारे बालो भोलो, समधिन छैल-चिकनिया ॥ या समधिन सुर सुनि मोहे, कि तीन लोककी रनिया ॥ १ ॥ इक ऊठे इक बैठे समधिन, इक आवे इक जाय ॥ लख चौरासी रुयाल तुम्हारो, फिर फिर गोता खाय ॥ २ ॥ कोइ ध्यावे तीरथ बरतको, कोइ पूजे पाषान ॥ ऐसा रुयाल तुम्हारा समधिन, समधी देखि ललचान ॥ ३ ॥ कहैं कवीर सुनो हो समधी, मानो वचन हमार ॥ अबकी बार रहनिमें रहिहो, उतरो भवजल पार ॥ ४ ॥
गारी ॥ १८ ॥
जो तू पियाको पियारिनी, पिया अपनेको सिंगार करो ॥ जाकी सुमतिकी कंगही, कर्म केस निरुवार करो ॥ जाके तत्वको तेल, प्रेम डोरिसे चोटी गुहो ॥ जाके अलखकी कजरा, विरहकी बेंदी लिलार भरो ॥ जाकी नेह नथुनिया, शीलकी लटकल लटक रहे ॥ जाकी बोध चुनरिया, ज्ञानका लहैगा घूम रहे ॥ जाकी अकिलकी अंगिया, सुरति निरति द्वै बन्द लगे ॥ जाकी चितकी चुडिया, कसनीके कंगना दमक रहे ॥ जाके शीलका सोंटा, मायसे हरदम हमेल परे ॥ जाके जुगतकी जेहर, शब्दकी
(३५०)
कबीरपंथी—
विछवा वाज रहे ॥ इतना धन पहिर धनी, रुठे पियाको मनाव सही ॥ पिय हमसे बोलो, साहब कबीर दया करी ॥
गारी ॥ १९ ॥
अब चित चेतले तू, काहे भूले मूरख गवॉर ॥ मय्या तो तेरी कुवैर देई, लागे उनके मनुष हजार ॥ चकर मकरकी चाची तेरी, उनहुँका यही हवाल ॥ हरफ निरफकी फूफू तिहारी, उनहुँके दश लगवार ॥ अनबुधिया तेरि बहिन बजिन्द, फादि जाय डंडवार ॥
सत्यनाम ।
श्री १०८ युतसदगुरु श्रीभक्त शम्भुदासजी साहब इन्दौरी संशोधित शब्दादि यहाँसे आरम्भ होता है ॥
- दुमरी खंभाच ॥ १ ॥
सखीरी मेरे मनमें बस्यो है सतनाम । लोग कहैं यह भयी है बावरी, मोहि मिल्यो सुखधाम ॥ १ ॥ जबसे दृष्टि परी सतगुरुकी, मूरति ललित ललाम । तबसे जानि परचो मोहि झूठो, यहि जगको परिनाम ॥ २ ॥ मैं आयी संतनकी शरने, होय सबसे बदनाम । कोइ निन्दो चाहे कोइ वन्दो, मोहि न काहुसे काम ॥ ३ ॥ मेरे प्राण नाथ मोहि अस प्रिय, ज्यों लोभीको दाम । जो उनके उपदेश मनोहर, सो मोहि ऋग यजु साम ॥ ४ ॥ जिन अपनो पिय नहि पहिचान्यो, सो तिय निपट निकाम । सोइ धन्य सुगति जाकी है, पियमें आठो जाम ॥ ५ ॥ काहूको पति है अति ज्ञाता, काहूको नृप अभिराम । धर्मनि तो ऐसो पिय पायो, जाके है सकल गुलाम ॥ ६ ॥
• सूचना. जो छोटा बीका करते हैं जहाँ दो बार नारियल मोरना और थोड़े आबनियोंको प्रसाद देना होता है वहाँ तो जन्दा फुरसत हो जाता है, वहाँ पीछे लिखे हुए विधानके शब्दोंसे ही काम चल जाता है, अधिककी आवश्यकता नहीं होती किन्तु, जहाँ सैकड़ों नारियल मोरना, बहुतोंको कठी आदि देना और बहुतोंको प्रसाद बाँटना पड़ता है, वहाँ गानेवालोंको भी बहुत देर तक गाना बजाना पड़ता है, इस लिखे इसके आगे नाना राग रागनियोंके संकेतयुत पदादि दिये जाते हैं जिसमें गानेवालोंको सुभीता और सुननेवालोंको आनन्द होवे ।
प्रवदीय—
श्रीयुगलानन्द विहारी.
शब्दावली
(३५१)
दुभरी ॥ २ ॥
गाफिला क्यों विसरचो घनी। तेरी सुन्दर काया बनी ॥ ८० ॥ गर्भ वासमें भक्ति कबूल्यो, विनती करके घनी। भूल्यो आय गोदमें लीन्यो, जब तो को जननी ॥ १ ॥ बालपना सब खेलि गँवायो, तब कुछ नाहि गनी। तरुण भयो मदमें मत्त होय, मोह्यो लखि तरुनी ॥ २ ॥ बृद्ध भयो तन काँपन लाग्यो, कैसी औनि ठनी। तीनौपन ऐसेहि गवायो, आयुष सब अपनी ॥ कहैं कवीर चेतु नर अजहूँ, बाकी है इतनी। अब मूरख अवसर मति खोवे, यह अनमोल मनी ॥ ३ ॥
दुभरी जिला।
सखि सोइ सुन्दरी पियकी पियारी। जाकी सुरति एक पल स्वप्नहेडु, होत न पियसे न्यारी ॥ ८० ॥ धोय गुमान मैल सब तनसे, ओढ़ि शीलकी सारी। सत्यवृत्तका पहिरि घाघरा, चाल चले मतवारी ॥ प्रेमकी अँगिया भक्ति चुडिया, समताके कँगना री। बेंदी विनय विमल श्रद्धाको, उरमें हार हजारी ॥ आगमको कूंकू मस्तकपर, ज्ञानको अञ्जन सारी। यहि विधिसे निज पियको रिझावै, अटल सिंगार सिंगारी ॥ अपने मरम धर्म पति सेवा, जाने हृदय विचारी। तीरथकी इच्छा जो होवे, पीवे चरण पखारी ॥ और पुरुषको पति करि जाने, सो नारी कुलँटारी ॥ सत्य पुरुषको जो तिय सेवै, सोई पतिवर्तारी ॥ क्यों भूली तू देखि जगत सुख, विषयभोग दिन चारी ॥ हो तजि सब प्रपंच गुरुशरणे, मानिके मेरो कहा री ॥ कहैं धर्मनि सोई चतुर विचक्षण, सोई कुलवन्ती नारी। जो निजपरमात्म पिय पायो, ताकी मैं बलिहारी ॥ १ ॥
सखि ! मैं धन्य सोहागिनि नारी। मेरो पति पूर्ण परमात्म, अजर अमर अविकारी ॥ ८० ॥ औरनके पति एक दिन विछुरत,
१ आय उपस्थित हुई. २ स्त्री. ३ प्रसन्न करे ४ धोयके. ५ व्यभिचारिण ६ पतिव्रता
(३५२)
कवीरपंथी—
तजि निज सुन्दरी प्यारी । मेरे प्राणनाथ मोहि एकक्षण, करत न उरसे न्यारी ॥ जाको खोज करत निशिवासर, बडे २ तप धारी । चकित होत वरणत श्रुति गुण जेहि नेति २ कहि हारी ॥ संयम नियम शृंगार है मेरो, श्रद्धा सहित सँवारी । पहिरोँ विविध विवेकके भूषण, ज्ञानको अन्न सारी ॥ सत्य नाम कंकूका टीका, मस्तकपर सुखकारी । गुरुके वचन कानमें मोती, तिनकी बहु शोभा री ॥ इन्द्रमती सतगुरुके चरणन, तन मन धन सब वारी । प्रियतम पाय कवीर कृपानिधि, रहत सदा मतवारी ॥ २ ॥
वात्ता ।
कब करिहौ मोपे दयाकी नजरिया । तुम्हरे दरश बिन निशिदिन तलफों, जिमि तलफत बिन जलके मछरिया ॥ टे० ॥ मंगल मूरति परम मनोहर, श्वेत वसन जस चमके उजेरिया ॥ शीश सुकुट उरमाल भाल बिच, तिलक रुचिर लखि मुनि मन हरिया ॥ दरश हेतु गृहकाज छोडि सब, कबकी मैं ठाढी २ देखों डंगरिया ॥ धर्मैनिको राखों चरणनमें, करिहों सदा तुम्हरी परँवरिया ॥ १ ॥
कब मिलिहो त्रिभुवनपति स्वामी ॥ करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, विमल जलजपँरणज सुखधामी ॥ टे० ॥ परम स्वच्छन्द अनन्द ज्ञानघन, द्रन्द्व रहित मति गति अभिरामी ॥ अशरण शरण भक्तभवभजन, सेवक सुखद सन्त अनुगामी ॥ वरणत विशद विशेष वेद यश, कँस न सुनहु मम अन्तर्धामी ॥ धर्मदास कर जोरि बदत इति बार बार तव चरण नमामी ॥ २ ॥
का वरणों छबि आज तुम्हारी ! सन्तसमाज विराजमान जिमि, सुरगन बिच सुरपति अधिकारी ॥ टे० ॥ दिपत दिनेश समान
१ ब्रह्माका प्रकाश. २ मार्ग, रस्ता. ३ सेवा. ४ कमलपत्रपर. प्रगट हुये. ५ क्यों नहीं. ६ इन्द्र.
शब्दावली
(३५३)
तेज वपु, मङ्गलवेष परम सुखकारी । सुन्दर वदेन मदन लखि लाजत, हुलसत मन सुसक्यान निहारी ॥ भुक्कूटी कुटिल कपोल मनोहर, चोरत चित चखें चितवन न्यारी । नाशों रुचिर कपोल मनोहर चारु चिबुंक अति लागत प्यारी ॥ भाल तिलक चुरमाल सुकुट मणि, जडित तडित सम मस्तकधारी । विमल वसेन तन लसत हसत जिमि, देखि मन्द बुति चन्द उजारी ॥ अशरण शरण हरण भव संकट, तारण तरण नाथ बलिहारी । धर्मदास सब करत निछावर, तन मन धन चरणन पर वारी ॥ ३ ॥
कोइ समुझै ब्रह्मज्ञानी मेरे सह्ररुकी बानी ॥ टे० ॥ क्या समुझैं वे वेदके वक्ता, विद्याके अभिमानी ॥ यदपि दिखत कह्यु अर्थ असंगत, तदपि प्रबोधकी खानी ॥ लोक वेदसे है वह न्यारी, त्रिगुण रहित निरवानी ॥ साधु सन्त सब शीश चढावें, महामंत्र सम जानी ॥ धर्मिनिके तो परम शिरोमणि, पाय भई पटरानी ॥ ४ ॥
हुनिया अजैब दिवानी, मोरी कही एक न मानी ॥ टे० ॥ तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, इत उत फिरत मुलानी ॥ तीरथ मूरति पूजत डोले, कङ्कर पत्थर पानी ॥ विषय वासनाके फन्दे परि, मोहजाल उरझानी ॥ सुखको दुख दुखको सुख माने, हित अनहित नहि जानी ॥ औरनको मूरख ठहरावत, आप बनत है सयानी ॥ साँच कहौं तो मारन धावें, झूठेको पतियोंनी ॥ कहैं कवीर कहाँ लग बरणों, अद्भुत खेले बखानी ॥ ५ ॥
ध्वनि खन्नाच.
ध्याइये गुरुपद सुखदायक ॥ टे० ॥ विघनहरण सुदकरण सुमंगल, ऋद्धिसिद्धि वरदेशें विनॉयक ॥ नाम लेत सब पाप प्रनाशत, बहु जैनमनकृत मनैवचकायक । करुणामिन्दु कृपाल
१ मुख. २ नेत्र. ३ नासिका, नाक. ४ दृष्टी, डाली. ५ वस्त्र. ६ मनोषी, अद्भुत. ७ कंठी हुई. ८ खुर. ९ शरोसा किया. १० आशिर्वादके प्रभु. ११ श्रेष्ठ. १२ अनेक जन्मोंके किये हुये. १३ मन बाणी बीर शरीरसे.
कवीरपंथी शब्दावली १२
(३५४)
कवीरपंथी—
दयानिधि, शरणागतवत्सल सब लायक ॥ तारण तरण भक्त- भवभञ्जन, अधम उधारण सन्त सहायक ॥ धर्मदास इति वदत विनय करि, सत्य कवीर मोरे पितु मायक ॥ १ ॥
नाथ एक आश है मोहिं तुम्हारी । सुत कुपूतहू पर राखत है, ममंता पितुंमहतारी ॥ टे० ॥ मो सम को कृतैत्र खल पामर, कूर कुटिलें कुविचारी । भोग्यो श्वान समान जगत् सुख, लोक लाज भय टारी ॥ रह्यो अधीन सदा मायाके, प्रभुको नाम विसारी । सुर डुरलभ तन पाय गवाँयो, विषय विश्वा झखमारी ॥ भूलि सकल कर्तव्य आपनो, सोयो पाँव पसारी । स्वप्ननेहु सुकृत कियो नहिं कबहुँ, धर्म अधर्म विचारी ॥ और न कुछ विश्वास मोहिं प्रभु, कहै धर्मदास पुकारी । पै मैं पतित पतितपावन तुम, यह भरोस यक भारी ॥ २ ॥
मेरे निरधनके धन सतनाम । जेहि प्रताप कोई राँव रंक्से, मोहिं नहीं कुछ काम ॥ टे० ॥ कामधेनु चिन्तामणि पारस, कल्पवृक्ष अभिराम । ऋद्धि सिद्धि सब ताके सन्मुख, दीखत तुच्छ निकाम ॥ अक्षर चारि अखिल फलदायक, अतुलित ललित ललाम । महामन्त्र यहि जानि सन्तजन, जपत हैं आठो योम ॥ नासत सकल अरिष्टें दाहिने, होत विधाता वाम । उठि प्रभात जो करत है चिन्तन, क्षणधरि मन विश्राम ॥ दृढश्रद्धा धर्मदास धारि उर, तजि रहीम अरु राम । गुरु कवीरके शरणे आयो, तब पायो सुखधाम ॥ ३ ॥
मूषालो.
आवो सखी मिलि मङ्गल गावो मोरे अँगन माँरी ॥ टे० ॥ आज सुन्यो सतगुरु आवत हैं, आली मोरे भवेंनमाँ ॥ सखीरी
१ कुपात्र. २ प्रीति. ३ पितामाता. ४ किये उपकारको न माननेवाला. ५ नीच. ६ क्रोधी. ७ कपटी. ८ राजा और दीनसे ९ प्रहर. १० कष्ट ११ घरमें
शब्दावली
(३५५)
मो० ॥ शब्द सुनत प्रभुके आवनको, रस बरष्यो काननमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ फरकत नयन शकुन शुभ होवैं, अति अनन्द होय मनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ बोलत मोर पपीहा चहुँदिश कोयल कुडुकत बनमाँ ॥ सखी० ॥ बारबार मेरो हिय हुँलसत है, पुलंक उठत सब तनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ गुरु आवत धर्मिनि उठि धाई, जाय परी चरणनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ १ ॥
कोसिया काकी ।
आज मोरे सतगुरुको गृह लाऊँ ॥ टे० ॥ चरण धोय चरणाभूत ले करि, सिंहासन बैठाऊँ ॥ चन्दनसे चौका लिपवाऊँ, मोतियन चौक पुराऊँ ॥ नरियर पान सुपारी केला, फल अनेक मँगवाऊँ ॥ श्वेत मिठाई विविध भाँतिकी, थारन माहिँ भराऊँ ॥ कञ्चन कलश कपूरकी बाती, आरति साज धराऊँ ॥ अभूतझारी प्रेमसहितले, प्रभुजीको भोग लगाऊँ ॥ तन मन धन निछावरि करिकै, आनन्द मंगल गाऊँ ॥ धर्मदास विनवै कर जोरी, भक्तिदान गुरु पाऊँ ॥ १ ॥
आज मोरे घर साहिब आये, दर्शन करी दोड नयन जुँढाये ॥ टे० ॥ विगत छेश अखिलेश दयानिधि, मंगल वेष विशेष बनाये, । तिलक भाल उर माल मनोहर, शीश सुकुट मणिमय छबिछाये ॥ चन्दनसे चौका लिपवायो, गजमोतियनकी चौका पुराये । बाजत ताल भूदंग झाँझ डफ, साधुसन्त मिलि मङ्गल गाये ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, काम क्रोध मद मोह दुराये । भयो आनन्द भुवनमें चहुँदिश, चरण कमल रज शीश चढाये ॥ कञ्चन थार सँवारि आरती, धर्मिनि करत है हिय हुलसाये । करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, सत्यनाम निजमंत्र सुनाये ॥ २ ॥
ध्वनि संकोटी ।
आज गुरु दीनो नाम सुनाय । तजि सकल फन्द, भई अति
१ आनन्दित होता है, उत्साहित होता है २ रोमाञ्च होना. ३ शीतल हुए. ४ रत्नजडित. ५ शोभाको प्राप्त. ६ संजीरा. ७ छिपगये.
(३५६)
कबीरपंथी—
अनंद, जिमि रंक बिपुल धन पाय ॥ टे० ॥ लै तितुका तुरवाय कालसे, सुक्त कियो सब भ्रम जालसे; विविध भाँति उपदेश हठाय ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, सुदमंगल लखि ठांढे आगे, कुमति रही मनमें खिसियाय ॥ जब सतगुरुने नाम सुनाया, तब यमने निज शीश हिलाया, अब मेरो कुछ है न उपाय ॥ कहे धर्मनि सन्तन हितकारी, कृपाकरी मोपर बहुभारी, जन्ममरण भवरोग नशाय ॥ १ ॥
दरश कब देहो दीनदयाल । तुम्हरे दरश विन कँल न परत छिन, जिव अति होत बिहौल ॥ टे० ॥ वदन निहारि मदन छवि लाजे, शीश सुकुट अति सुन्दर आजे । उर गजमोतियन माल ॥ ललित कमण्डलु योगदण्डकर, भृकुटी कुटिल कपोल मनोहर, राजिवनयन विशाल । मंगलरूप अनूप सँहायक, भग्य वेष भक्तन वरदायक, शुभ्र तिलकयुत भाल ॥ निगमागम गुण गान करत हैं, सुरनरसुनि सब ध्यान धरत हैं, लखि भय मानत काल ॥ धर्मदास विनवै करजोरी, वेगि सुनो प्रभु विनती मोरी, करुणा-सिन्धु कृपाल ॥ २ ॥
माड.
दीनबन्धु दीनानाथ, महारी बीनती सुनौ ॥ टे० ॥ महारे तो शत्रु घणाजी, भक्ति करन नहिं देत । काम कोध मद लोभ ये महारी, सुमतीको हरि लेत ॥ तृष्णा परबल डाकिनी जी, लागी महारे लार । कंदेई तो धापे नहीं, इण खायो सब संसार ॥ शब्द स्पर्श रू रूप रस जी, गन्ध विषय ये पाँच । आप आपने खोंचकै; कोई महाने नचावे नाच ॥ मन मरकँट नहिं होत वश, कीन्है कोटि उपाय । ज्यों २ गहि परंमोधिye काई, त्यो २ भाग्यो जाय ॥
१ अत्यन्त. २ सन्मुख खडे हुये. ३ लज्जित. ४ शान्ति. ५ व्याकुल ६ आसा. ७ कमलनेत्र. ८ सहापता करनेवाले. ९ कदापि कबो भी. १० बन्दर. ११ उपदेश देना.