कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
अनंद, जिमि रंक बिपुल धन पाय ॥ टे० ॥ लै तितुका तुरवाय कालसे, सुक्त कियो सब भ्रम जालसे; विविध भाँति उपदेश हठाय ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, सुदमंगल लखि ठांढे आगे, कुमति रही मनमें खिसियाय ॥ जब सतगुरुने नाम सुनाया, तब यमने निज शीश हिलाया, अब मेरो कुछ है न उपाय ॥ कहे धर्मनि सन्तन हितकारी, कृपाकरी मोपर बहुभारी, जन्ममरण भवरोग नशाय ॥ १ ॥
दरश कब देहो दीनदयाल । तुम्हरे दरश विन कँल न परत छिन, जिव अति होत बिहौल ॥ टे० ॥ वदन निहारि मदन छवि लाजे, शीश सुकुट अति सुन्दर आजे । उर गजमोतियन माल ॥ ललित कमण्डलु योगदण्डकर, भृकुटी कुटिल कपोल मनोहर, राजिवनयन विशाल । मंगलरूप अनूप सँहायक, भग्य वेष भक्तन वरदायक, शुभ्र तिलकयुत भाल ॥ निगमागम गुण गान करत हैं, सुरनरसुनि सब ध्यान धरत हैं, लखि भय मानत काल ॥ धर्मदास विनवै करजोरी, वेगि सुनो प्रभु विनती मोरी, करुणा-सिन्धु कृपाल ॥ २ ॥
माड.
दीनबन्धु दीनानाथ, महारी बीनती सुनौ ॥ टे० ॥ महारे तो शत्रु घणाजी, भक्ति करन नहिं देत । काम कोध मद लोभ ये महारी, सुमतीको हरि लेत ॥ तृष्णा परबल डाकिनी जी, लागी महारे लार । कंदेई तो धापे नहीं, इण खायो सब संसार ॥ शब्द स्पर्श रू रूप रस जी, गन्ध विषय ये पाँच । आप आपने खोंचकै; कोई महाने नचावे नाच ॥ मन मरकँट नहिं होत वश, कीन्है कोटि उपाय । ज्यों २ गहि परंमोधिye काई, त्यो २ भाग्यो जाय ॥
१ अत्यन्त. २ सन्मुख खडे हुये. ३ लज्जित. ४ शान्ति. ५ व्याकुल ६ आसा. ७ कमलनेत्र. ८ सहापता करनेवाले. ९ कदापि कबो भी. १० बन्दर. ११ उपदेश देना.