कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मो० ॥ शब्द सुनत प्रभुके आवनको, रस बरष्यो काननमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ फरकत नयन शकुन शुभ होवैं, अति अनन्द होय मनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ बोलत मोर पपीहा चहुँदिश कोयल कुडुकत बनमाँ ॥ सखी० ॥ बारबार मेरो हिय हुँलसत है, पुलंक उठत सब तनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ गुरु आवत धर्मिनि उठि धाई, जाय परी चरणनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ १ ॥
कोसिया काकी ।
आज मोरे सतगुरुको गृह लाऊँ ॥ टे० ॥ चरण धोय चरणाभूत ले करि, सिंहासन बैठाऊँ ॥ चन्दनसे चौका लिपवाऊँ, मोतियन चौक पुराऊँ ॥ नरियर पान सुपारी केला, फल अनेक मँगवाऊँ ॥ श्वेत मिठाई विविध भाँतिकी, थारन माहिँ भराऊँ ॥ कञ्चन कलश कपूरकी बाती, आरति साज धराऊँ ॥ अभूतझारी प्रेमसहितले, प्रभुजीको भोग लगाऊँ ॥ तन मन धन निछावरि करिकै, आनन्द मंगल गाऊँ ॥ धर्मदास विनवै कर जोरी, भक्तिदान गुरु पाऊँ ॥ १ ॥
आज मोरे घर साहिब आये, दर्शन करी दोड नयन जुँढाये ॥ टे० ॥ विगत छेश अखिलेश दयानिधि, मंगल वेष विशेष बनाये, । तिलक भाल उर माल मनोहर, शीश सुकुट मणिमय छबिछाये ॥ चन्दनसे चौका लिपवायो, गजमोतियनकी चौका पुराये । बाजत ताल भूदंग झाँझ डफ, साधुसन्त मिलि मङ्गल गाये ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, काम क्रोध मद मोह दुराये । भयो आनन्द भुवनमें चहुँदिश, चरण कमल रज शीश चढाये ॥ कञ्चन थार सँवारि आरती, धर्मिनि करत है हिय हुलसाये । करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, सत्यनाम निजमंत्र सुनाये ॥ २ ॥
ध्वनि संकोटी ।
आज गुरु दीनो नाम सुनाय । तजि सकल फन्द, भई अति
१ आनन्दित होता है, उत्साहित होता है २ रोमाञ्च होना. ३ शीतल हुए. ४ रत्नजडित. ५ शोभाको प्राप्त. ६ संजीरा. ७ छिपगये.