भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

शब्दावली

(३५७)

भवसागरके चक्रमे, आय पडचो मँझधार। कर्कणाभवन कवीरजी, काई म्हाने करो प्रभु पार ॥ १ ॥

जहरीली योवन माती, यासे दूर भागिये॥टैक॥ इन्द्र डश्यो ब्रह्मा डश्यो काई, नागद डसिया व्यास। बात करत शिवको डशी काई, क्षण एक बैठत पास ॥ कंस वंशको नाश करिजी डश्यो रावणहि जाय। दश मस्तक कटवायकै काँई लड्डु दई लुटवाय ॥ पाराशरि शृंगी ऋषि जी, विश्वामित्र वशिष्ठ। और अनेकन सुनिन डशि काँई, कियो योगसे भ्रष्ट ॥ मोटा २ गारैडी इनसे मानी हार। कच्छ देशमें जायकै काँई, लागी गोरख लार ॥ माया काली नागिनी जी, डशिया सब संसार। बाँच्या कोई २ सन्तजन जी, कहै कवीर विचार ॥ २ ॥

ऐसो सुन्दर मुखडा पाकै, मूरख प्रभुको क्यों न भजै? ॥टे०॥ जिन जगमें सब सुख दियोजी, तिय सुत वित धन धाम। ताको नाम विसारियो काई, ऐसो निमकहराम ॥ अबही तो भूल्यो फिरे काई, ज्यों मदान्ध गजराज। एकदिन काल गिरासँहीजी, ज्यों तीतरको बाज ॥ अठावठासे लाय कर जी, सश्र्व धन दोउ हाथ। अन्त समय नहि जायगी थोर, फूटी कौडी साथ ॥ धन्देमें निशिदिन फिरे जी, आठो जौम गँवार। बणजाराका बैल ज्यू काई, गयो जमारो हार ॥ करसे दियो न दान कुछ, सुखसे लियो न नाम। खोय गमायो जन्म सब काँई, तीनो पन बेकाम ॥ विद्या पढि भूलो फिरे काई, मनमें करि अभिमान। सन्तांके उपदेशने तूं, तनक धरचो नहि कान ॥ मिथ्या जग परपंच सब तूं मतिना देखि भुलाय। कहै कवीर गुरु शरण गहु काई, ऐसो नरतन पाय ॥ ३ ॥

१ वंश भारना, काटना. २ मंत्रशास्त्री, ३ मक्षण करेगा. ४ जमा करत. है. ५ घास-ग्रह.