भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(३५०)

कबीरपंथी—

विछवा वाज रहे ॥ इतना धन पहिर धनी, रुठे पियाको मनाव सही ॥ पिय हमसे बोलो, साहब कबीर दया करी ॥

गारी ॥ १९ ॥

अब चित चेतले तू, काहे भूले मूरख गवॉर ॥ मय्या तो तेरी कुवैर देई, लागे उनके मनुष हजार ॥ चकर मकरकी चाची तेरी, उनहुँका यही हवाल ॥ हरफ निरफकी फूफू तिहारी, उनहुँके दश लगवार ॥ अनबुधिया तेरि बहिन बजिन्द, फादि जाय डंडवार ॥

सत्यनाम ।

श्री १०८ युतसदगुरु श्रीभक्त शम्भुदासजी साहब इन्दौरी संशोधित शब्दादि यहाँसे आरम्भ होता है ॥

  • दुमरी खंभाच ॥ १ ॥

सखीरी मेरे मनमें बस्यो है सतनाम । लोग कहैं यह भयी है बावरी, मोहि मिल्यो सुखधाम ॥ १ ॥ जबसे दृष्टि परी सतगुरुकी, मूरति ललित ललाम । तबसे जानि परचो मोहि झूठो, यहि जगको परिनाम ॥ २ ॥ मैं आयी संतनकी शरने, होय सबसे बदनाम । कोइ निन्दो चाहे कोइ वन्दो, मोहि न काहुसे काम ॥ ३ ॥ मेरे प्राण नाथ मोहि अस प्रिय, ज्यों लोभीको दाम । जो उनके उपदेश मनोहर, सो मोहि ऋग यजु साम ॥ ४ ॥ जिन अपनो पिय नहि पहिचान्यो, सो तिय निपट निकाम । सोइ धन्य सुगति जाकी है, पियमें आठो जाम ॥ ५ ॥ काहूको पति है अति ज्ञाता, काहूको नृप अभिराम । धर्मनि तो ऐसो पिय पायो, जाके है सकल गुलाम ॥ ६ ॥

• सूचना. जो छोटा बीका करते हैं जहाँ दो बार नारियल मोरना और थोड़े आबनियोंको प्रसाद देना होता है वहाँ तो जन्दा फुरसत हो जाता है, वहाँ पीछे लिखे हुए विधानके शब्दोंसे ही काम चल जाता है, अधिककी आवश्यकता नहीं होती किन्तु, जहाँ सैकड़ों नारियल मोरना, बहुतोंको कठी आदि देना और बहुतोंको प्रसाद बाँटना पड़ता है, वहाँ गानेवालोंको भी बहुत देर तक गाना बजाना पड़ता है, इस लिखे इसके आगे नाना राग रागनियोंके संकेतयुत पदादि दिये जाते हैं जिसमें गानेवालोंको सुभीता और सुननेवालोंको आनन्द होवे ।

प्रवदीय—

श्रीयुगलानन्द विहारी.