कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(३५१)
दुभरी ॥ २ ॥
गाफिला क्यों विसरचो घनी। तेरी सुन्दर काया बनी ॥ ८० ॥ गर्भ वासमें भक्ति कबूल्यो, विनती करके घनी। भूल्यो आय गोदमें लीन्यो, जब तो को जननी ॥ १ ॥ बालपना सब खेलि गँवायो, तब कुछ नाहि गनी। तरुण भयो मदमें मत्त होय, मोह्यो लखि तरुनी ॥ २ ॥ बृद्ध भयो तन काँपन लाग्यो, कैसी औनि ठनी। तीनौपन ऐसेहि गवायो, आयुष सब अपनी ॥ कहैं कवीर चेतु नर अजहूँ, बाकी है इतनी। अब मूरख अवसर मति खोवे, यह अनमोल मनी ॥ ३ ॥
दुभरी जिला।
सखि सोइ सुन्दरी पियकी पियारी। जाकी सुरति एक पल स्वप्नहेडु, होत न पियसे न्यारी ॥ ८० ॥ धोय गुमान मैल सब तनसे, ओढ़ि शीलकी सारी। सत्यवृत्तका पहिरि घाघरा, चाल चले मतवारी ॥ प्रेमकी अँगिया भक्ति चुडिया, समताके कँगना री। बेंदी विनय विमल श्रद्धाको, उरमें हार हजारी ॥ आगमको कूंकू मस्तकपर, ज्ञानको अञ्जन सारी। यहि विधिसे निज पियको रिझावै, अटल सिंगार सिंगारी ॥ अपने मरम धर्म पति सेवा, जाने हृदय विचारी। तीरथकी इच्छा जो होवे, पीवे चरण पखारी ॥ और पुरुषको पति करि जाने, सो नारी कुलँटारी ॥ सत्य पुरुषको जो तिय सेवै, सोई पतिवर्तारी ॥ क्यों भूली तू देखि जगत सुख, विषयभोग दिन चारी ॥ हो तजि सब प्रपंच गुरुशरणे, मानिके मेरो कहा री ॥ कहैं धर्मनि सोई चतुर विचक्षण, सोई कुलवन्ती नारी। जो निजपरमात्म पिय पायो, ताकी मैं बलिहारी ॥ १ ॥
सखि ! मैं धन्य सोहागिनि नारी। मेरो पति पूर्ण परमात्म, अजर अमर अविकारी ॥ ८० ॥ औरनके पति एक दिन विछुरत,
१ आय उपस्थित हुई. २ स्त्री. ३ प्रसन्न करे ४ धोयके. ५ व्यभिचारिण ६ पतिव्रता