कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
तजि निज सुन्दरी प्यारी । मेरे प्राणनाथ मोहि एकक्षण, करत न उरसे न्यारी ॥ जाको खोज करत निशिवासर, बडे २ तप धारी । चकित होत वरणत श्रुति गुण जेहि नेति २ कहि हारी ॥ संयम नियम शृंगार है मेरो, श्रद्धा सहित सँवारी । पहिरोँ विविध विवेकके भूषण, ज्ञानको अन्न सारी ॥ सत्य नाम कंकूका टीका, मस्तकपर सुखकारी । गुरुके वचन कानमें मोती, तिनकी बहु शोभा री ॥ इन्द्रमती सतगुरुके चरणन, तन मन धन सब वारी । प्रियतम पाय कवीर कृपानिधि, रहत सदा मतवारी ॥ २ ॥
वात्ता ।
कब करिहौ मोपे दयाकी नजरिया । तुम्हरे दरश बिन निशिदिन तलफों, जिमि तलफत बिन जलके मछरिया ॥ टे० ॥ मंगल मूरति परम मनोहर, श्वेत वसन जस चमके उजेरिया ॥ शीश सुकुट उरमाल भाल बिच, तिलक रुचिर लखि मुनि मन हरिया ॥ दरश हेतु गृहकाज छोडि सब, कबकी मैं ठाढी २ देखों डंगरिया ॥ धर्मैनिको राखों चरणनमें, करिहों सदा तुम्हरी परँवरिया ॥ १ ॥
कब मिलिहो त्रिभुवनपति स्वामी ॥ करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, विमल जलजपँरणज सुखधामी ॥ टे० ॥ परम स्वच्छन्द अनन्द ज्ञानघन, द्रन्द्व रहित मति गति अभिरामी ॥ अशरण शरण भक्तभवभजन, सेवक सुखद सन्त अनुगामी ॥ वरणत विशद विशेष वेद यश, कँस न सुनहु मम अन्तर्धामी ॥ धर्मदास कर जोरि बदत इति बार बार तव चरण नमामी ॥ २ ॥
का वरणों छबि आज तुम्हारी ! सन्तसमाज विराजमान जिमि, सुरगन बिच सुरपति अधिकारी ॥ टे० ॥ दिपत दिनेश समान
१ ब्रह्माका प्रकाश. २ मार्ग, रस्ता. ३ सेवा. ४ कमलपत्रपर. प्रगट हुये. ५ क्यों नहीं. ६ इन्द्र.