कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 968 में से
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तेज वपु, मङ्गलवेष परम सुखकारी । सुन्दर वदेन मदन लखि लाजत, हुलसत मन सुसक्यान निहारी ॥ भुक्कूटी कुटिल कपोल मनोहर, चोरत चित चखें चितवन न्यारी । नाशों रुचिर कपोल मनोहर चारु चिबुंक अति लागत प्यारी ॥ भाल तिलक चुरमाल सुकुट मणि, जडित तडित सम मस्तकधारी । विमल वसेन तन लसत हसत जिमि, देखि मन्द बुति चन्द उजारी ॥ अशरण शरण हरण भव संकट, तारण तरण नाथ बलिहारी । धर्मदास सब करत निछावर, तन मन धन चरणन पर वारी ॥ ३ ॥
कोइ समुझै ब्रह्मज्ञानी मेरे सह्ररुकी बानी ॥ टे० ॥ क्या समुझैं वे वेदके वक्ता, विद्याके अभिमानी ॥ यदपि दिखत कह्यु अर्थ असंगत, तदपि प्रबोधकी खानी ॥ लोक वेदसे है वह न्यारी, त्रिगुण रहित निरवानी ॥ साधु सन्त सब शीश चढावें, महामंत्र सम जानी ॥ धर्मिनिके तो परम शिरोमणि, पाय भई पटरानी ॥ ४ ॥
हुनिया अजैब दिवानी, मोरी कही एक न मानी ॥ टे० ॥ तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, इत उत फिरत मुलानी ॥ तीरथ मूरति पूजत डोले, कङ्कर पत्थर पानी ॥ विषय वासनाके फन्दे परि, मोहजाल उरझानी ॥ सुखको दुख दुखको सुख माने, हित अनहित नहि जानी ॥ औरनको मूरख ठहरावत, आप बनत है सयानी ॥ साँच कहौं तो मारन धावें, झूठेको पतियोंनी ॥ कहैं कवीर कहाँ लग बरणों, अद्भुत खेले बखानी ॥ ५ ॥
ध्वनि खन्नाच.
ध्याइये गुरुपद सुखदायक ॥ टे० ॥ विघनहरण सुदकरण सुमंगल, ऋद्धिसिद्धि वरदेशें विनॉयक ॥ नाम लेत सब पाप प्रनाशत, बहु जैनमनकृत मनैवचकायक । करुणामिन्दु कृपाल
१ मुख. २ नेत्र. ३ नासिका, नाक. ४ दृष्टी, डाली. ५ वस्त्र. ६ मनोषी, अद्भुत. ७ कंठी हुई. ८ खुर. ९ शरोसा किया. १० आशिर्वादके प्रभु. ११ श्रेष्ठ. १२ अनेक जन्मोंके किये हुये. १३ मन बाणी बीर शरीरसे.
कवीरपंथी शब्दावली १२