भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३४९)

भयी ज्ञान गली ॥ जब तत सम्हारी हो, कि सन्मुख पीवसो भयी ॥ संतोष सिला पर हो, कि षटकी पांच जनी ॥ सब मारे पिसनिया हो, कि सिलकी सांग हनी ॥ धसि आय महलमें हो, कि गगनमें मगन भई ॥ साधु तुम जिन जानो गारि, कि सुक्तिकी राह कही ॥ तो सो कहैं कविर समझाय, कि याही मत आव चली ॥

गारी ॥ १७ ॥

सुनु समधिन चतुर, अइलों मैं तोरे आंगना ॥ तेरे अंगना समधिन तीव्र छन्दना तै तो कहा रची जिवनार, पाहुन आये संतजना ॥ टे० ॥ समधी हमारे बालो भोलो, समधिन छैल-चिकनिया ॥ या समधिन सुर सुनि मोहे, कि तीन लोककी रनिया ॥ १ ॥ इक ऊठे इक बैठे समधिन, इक आवे इक जाय ॥ लख चौरासी रुयाल तुम्हारो, फिर फिर गोता खाय ॥ २ ॥ कोइ ध्यावे तीरथ बरतको, कोइ पूजे पाषान ॥ ऐसा रुयाल तुम्हारा समधिन, समधी देखि ललचान ॥ ३ ॥ कहैं कवीर सुनो हो समधी, मानो वचन हमार ॥ अबकी बार रहनिमें रहिहो, उतरो भवजल पार ॥ ४ ॥

गारी ॥ १८ ॥

जो तू पियाको पियारिनी, पिया अपनेको सिंगार करो ॥ जाकी सुमतिकी कंगही, कर्म केस निरुवार करो ॥ जाके तत्वको तेल, प्रेम डोरिसे चोटी गुहो ॥ जाके अलखकी कजरा, विरहकी बेंदी लिलार भरो ॥ जाकी नेह नथुनिया, शीलकी लटकल लटक रहे ॥ जाकी बोध चुनरिया, ज्ञानका लहैगा घूम रहे ॥ जाकी अकिलकी अंगिया, सुरति निरति द्वै बन्द लगे ॥ जाकी चितकी चुडिया, कसनीके कंगना दमक रहे ॥ जाके शीलका सोंटा, मायसे हरदम हमेल परे ॥ जाके जुगतकी जेहर, शब्दकी