भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३४५)

गारी ॥ ४ ॥

हौं मैं सत्यनामसे राजी । जासे जीती सारी बाजी ॥ १ ॥ मैं रतन अमोलक पाया । ताते कौडी हाथ न लाया ॥ २ ॥ मैं पहिरौं मुक्ता मोती । ताते छाडी कांचकी ज्योती ॥ ३ ॥ जहाँ ब्रह्मा विष्णु महेशा । हम छोडे तिनके देशा ॥ ४ ॥ जहाँ कोटि भानु प्रकाशा । तहाँ का दीपककी आशा ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लगी प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ५ ॥

जाको चरणामृत लीजे । तिहिं गारी काहेको दीजे ॥ १ ॥ जासे मुक्ति पदारथ पव्ये । ताको हृदय माहिं समव्ये ॥ २ ॥ जाको लोभ मोह भर्मावे । ताको हीरा हाथ न आवे ॥ ३ ॥ जो काम क्रोध मद माता । सो बांधे जमपुर जाता ॥ ४ ॥ संसार जाल है भारी । मेरे सन्तनकी मति न्यारी ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लागे प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ६ ॥

जोरा जोर जनावे, या माया पर पनचनिया ॥ दोय रूप बनावे, इक कनक इक कामिनिया ॥ १ ॥ इक जावे इक रहावे, इक संशय यह मारनिया ॥ ताको काटिये कैसा, संत जन लेउ विचारनिया ॥ १ ॥ चलि सतगुरु सरना, करिय जाय पुकारनिया ॥ हम माया फांसे, जन्म जन्म जम डांडनिया ॥ २ ॥ हम बहु दुख पाये, सतगुरु लेहु उबारनिया ॥ भइ अधरते वानी, विगसित कमल परकाशनिया ॥ ३ ॥ समरथ सुनि आये, विरह दुख द्रन्द निवारनिया ॥ हम हाहो दुख पावैं, सतगुरु ऊपर वारनिया ॥ ४ ॥ देहु अत्र बधाई, काम क्रोध दल मारनिया ॥ पद देह मवासी, कर देउ निस्तारनिया ॥ ५ ॥ कालहु शिर नाई, जे लूटे तिरदेवनिया । गावैं साहब कवीर, अब नहिं आऊं संसारनिया ॥ ६ ॥