भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(३४६)

कवीरपंथी—

गारी ॥ ७ ॥

अल मस्त दिवानी, हम लाल भई जोगिनियाँ ॥ टेक ॥ कर पंख डुरावैं, सोहें संग सहेलिनियाँ ॥ १ ॥ रस मगन भई है देखिके, साहबकी सेजडिया ॥ २ ॥ जहैं पवन न पानी, बिन बादर घन घेरनिया ॥ ३ ॥ जहैं सूर न चन्द, जहैं रैन न भोरनिया ॥ ४ ॥ जहैं काया न माया, करम नहीं जहैं लेखनिया ॥ ५ ॥ जहैं आप गुसाई, कोटि भानु परकासनिया ॥ ६ ॥ जहैं तम्बु तनाय, बिना मेखकी चाँदनिया ॥ ७ ॥ रंग सेज विछाइ, अधर नहि कोइ लागनिया ॥ ८ ॥ जहाँ चँवर डुरावैं, सुरति सोहें सहे- लिनिया ॥ ९ ॥ जहैं रमें कवीर, सुरति समानी शब्दनिया ॥ १० ॥

गारी ॥ ८ ॥

आय आय मेरे सतगुरु हो, कि हाथ लिये ज्ञानकी छडी ॥ १ ॥ तोरी जात जानू हो, कि रसिक राय शब्द घना ॥ २ ॥ तेरि माया परबल हो, कि घनेरा छन्द करै ॥ ३ ॥ अति नाच नचावे हो, कि भेष नटवा सम धरो ॥ ४ ॥ गुन तीनों रसिया हो, कि पल छिन रंग करै ॥ ५ ॥ पांचन संग राची हो, कि पचीसो तेरे संग चले ॥ ६ ॥ मन मस्त कुपलिया, कि चाली लंगर कौन घरा ॥ ७ ॥ तेतो नाह न चीन्हे हो, कि जाते डोली घराँ घराँ ॥ ८ ॥ चलु गगन महलमें हो, कि जहैं तेरो पीव बसै ॥ ९ ॥ जहैं रिम झिम वासे सो, कि मोती अजर झरै ॥ १० ॥ जहैं अनहद बाजे हो, कि शब्द झंकार करै ॥ ११ ॥ जहैं जगमगता उजियार हो, कि साधु जन ध्यान धरै ॥ १२ ॥ तू तो पिप पिप बोलिहो, कि अमृत रस पिपत फिरै ॥ १३ ॥ जहैं साहब कविरजी हो, कि ओहं सोहं चँवर डुरै ॥ १४ ॥

गारी ॥ ९ ॥

टक रंग महलमें आव, कि निरगुन सेज बिछी ॥ जहाँ पवन