भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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सन्दावली

(३४७)

गमन नहि होय, तहां मेरि सुरति बसी ॥ जहँ निरगुन विन निर्वाण, जहां नहि सुर ससी ॥ जहां पाँच तत्त्व नहीं हो, मुक्तिकी होय हसी ॥ जहां पिप प्यारी मिलि एक, तो सोख्या अजब वनी ॥ जहां साहब कवीर गलतान, इच्छा द्वेत हरी ॥

॥ गारी १० ॥

तेरि मय्या मनिराम, गयी जुलाहाके पासवै ॥ हंसि सेज विछाइ, आयी जुलाहाकी ताक वै ॥ लगन और होनदे, उतरन द्वेत न ताप वै ॥ तेरी नली भइंगी ठीक, बुनौ चौतार वै ॥ नौतारको जामा, पचरंग सोहे पागवै ॥ तुम पहिरो मनिराम, मय्याके परसादवै ॥ सतनामको बुडला, सुमिरन पायल अस-वारवै ॥ चित चेतको चावक, देहु महाबल हाथवै ॥ लंगा हाकके घोडवा, अमर लोक चल जावै ॥

गारी ॥ ११ ॥

सुनि समझिले सुरत विचारी । तोको दीजै कहाकहि गारी ॥ घर आंगन झाड बुहारी । कर कूड़ा बाहर डारी ॥ घरके नाहिन अपने । कबहुँ ना भेटी सपने ॥ परपंची तीनों देवा । उनहु लह्यो न भेवा ॥ पाचन मिलि परपंच कौन्हा । सतसुकृत उनहु नहि चीन्हा ॥ ब्राह्मन छत्री वानी । तिनहुकी करी न कानी ॥ तुम रुंड मुंड बासी । तू करवा चौथ उपासी ॥ करवा चौथ अहोई । सब रांडनकी मति खोई ॥ कहैं कवीर ब्रह्मवानी । तै सुंहि सुनी औ जानी ॥

गारी ॥ १२ ॥

तुम पहिरो सुमति सिंगार, भजनकी चुनरिया ॥ तेरे ढिग ढिग विधि बिचार, पची सो घूँघरिया ॥ तेरे पायल गहर गंभीर, सदा सुख सेहडिया ॥ तेरेहि बडे हार हमेल, दयाकी टोलनिया ॥ तेरे त्रिकुटी तिलक संजोय, जगत मन मोहनिया ॥ दूध बेचन निकसी हो, सुमति भरि गवालनिया । आडे होय रहिय हो,