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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(३४५)

गारी ॥ ४ ॥

हौं मैं सत्यनामसे राजी । जासे जीती सारी बाजी ॥ १ ॥ मैं रतन अमोलक पाया । ताते कौडी हाथ न लाया ॥ २ ॥ मैं पहिरौं मुक्ता मोती । ताते छाडी कांचकी ज्योती ॥ ३ ॥ जहाँ ब्रह्मा विष्णु महेशा । हम छोडे तिनके देशा ॥ ४ ॥ जहाँ कोटि भानु प्रकाशा । तहाँ का दीपककी आशा ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लगी प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ५ ॥

जाको चरणामृत लीजे । तिहिं गारी काहेको दीजे ॥ १ ॥ जासे मुक्ति पदारथ पव्ये । ताको हृदय माहिं समव्ये ॥ २ ॥ जाको लोभ मोह भर्मावे । ताको हीरा हाथ न आवे ॥ ३ ॥ जो काम क्रोध मद माता । सो बांधे जमपुर जाता ॥ ४ ॥ संसार जाल है भारी । मेरे सन्तनकी मति न्यारी ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लागे प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ६ ॥

जोरा जोर जनावे, या माया पर पनचनिया ॥ दोय रूप बनावे, इक कनक इक कामिनिया ॥ १ ॥ इक जावे इक रहावे, इक संशय यह मारनिया ॥ ताको काटिये कैसा, संत जन लेउ विचारनिया ॥ १ ॥ चलि सतगुरु सरना, करिय जाय पुकारनिया ॥ हम माया फांसे, जन्म जन्म जम डांडनिया ॥ २ ॥ हम बहु दुख पाये, सतगुरु लेहु उबारनिया ॥ भइ अधरते वानी, विगसित कमल परकाशनिया ॥ ३ ॥ समरथ सुनि आये, विरह दुख द्रन्द निवारनिया ॥ हम हाहो दुख पावैं, सतगुरु ऊपर वारनिया ॥ ४ ॥ देहु अत्र बधाई, काम क्रोध दल मारनिया ॥ पद देह मवासी, कर देउ निस्तारनिया ॥ ५ ॥ कालहु शिर नाई, जे लूटे तिरदेवनिया । गावैं साहब कवीर, अब नहिं आऊं संसारनिया ॥ ६ ॥

(३४६)

कवीरपंथी—

गारी ॥ ७ ॥

अल मस्त दिवानी, हम लाल भई जोगिनियाँ ॥ टेक ॥ कर पंख डुरावैं, सोहें संग सहेलिनियाँ ॥ १ ॥ रस मगन भई है देखिके, साहबकी सेजडिया ॥ २ ॥ जहैं पवन न पानी, बिन बादर घन घेरनिया ॥ ३ ॥ जहैं सूर न चन्द, जहैं रैन न भोरनिया ॥ ४ ॥ जहैं काया न माया, करम नहीं जहैं लेखनिया ॥ ५ ॥ जहैं आप गुसाई, कोटि भानु परकासनिया ॥ ६ ॥ जहैं तम्बु तनाय, बिना मेखकी चाँदनिया ॥ ७ ॥ रंग सेज विछाइ, अधर नहि कोइ लागनिया ॥ ८ ॥ जहाँ चँवर डुरावैं, सुरति सोहें सहे- लिनिया ॥ ९ ॥ जहैं रमें कवीर, सुरति समानी शब्दनिया ॥ १० ॥

गारी ॥ ८ ॥

आय आय मेरे सतगुरु हो, कि हाथ लिये ज्ञानकी छडी ॥ १ ॥ तोरी जात जानू हो, कि रसिक राय शब्द घना ॥ २ ॥ तेरि माया परबल हो, कि घनेरा छन्द करै ॥ ३ ॥ अति नाच नचावे हो, कि भेष नटवा सम धरो ॥ ४ ॥ गुन तीनों रसिया हो, कि पल छिन रंग करै ॥ ५ ॥ पांचन संग राची हो, कि पचीसो तेरे संग चले ॥ ६ ॥ मन मस्त कुपलिया, कि चाली लंगर कौन घरा ॥ ७ ॥ तेतो नाह न चीन्हे हो, कि जाते डोली घराँ घराँ ॥ ८ ॥ चलु गगन महलमें हो, कि जहैं तेरो पीव बसै ॥ ९ ॥ जहैं रिम झिम वासे सो, कि मोती अजर झरै ॥ १० ॥ जहैं अनहद बाजे हो, कि शब्द झंकार करै ॥ ११ ॥ जहैं जगमगता उजियार हो, कि साधु जन ध्यान धरै ॥ १२ ॥ तू तो पिप पिप बोलिहो, कि अमृत रस पिपत फिरै ॥ १३ ॥ जहैं साहब कविरजी हो, कि ओहं सोहं चँवर डुरै ॥ १४ ॥

गारी ॥ ९ ॥

टक रंग महलमें आव, कि निरगुन सेज बिछी ॥ जहाँ पवन

सन्दावली

(३४७)

गमन नहि होय, तहां मेरि सुरति बसी ॥ जहँ निरगुन विन निर्वाण, जहां नहि सुर ससी ॥ जहां पाँच तत्त्व नहीं हो, मुक्तिकी होय हसी ॥ जहां पिप प्यारी मिलि एक, तो सोख्या अजब वनी ॥ जहां साहब कवीर गलतान, इच्छा द्वेत हरी ॥

॥ गारी १० ॥

तेरि मय्या मनिराम, गयी जुलाहाके पासवै ॥ हंसि सेज विछाइ, आयी जुलाहाकी ताक वै ॥ लगन और होनदे, उतरन द्वेत न ताप वै ॥ तेरी नली भइंगी ठीक, बुनौ चौतार वै ॥ नौतारको जामा, पचरंग सोहे पागवै ॥ तुम पहिरो मनिराम, मय्याके परसादवै ॥ सतनामको बुडला, सुमिरन पायल अस-वारवै ॥ चित चेतको चावक, देहु महाबल हाथवै ॥ लंगा हाकके घोडवा, अमर लोक चल जावै ॥

गारी ॥ ११ ॥

सुनि समझिले सुरत विचारी । तोको दीजै कहाकहि गारी ॥ घर आंगन झाड बुहारी । कर कूड़ा बाहर डारी ॥ घरके नाहिन अपने । कबहुँ ना भेटी सपने ॥ परपंची तीनों देवा । उनहु लह्यो न भेवा ॥ पाचन मिलि परपंच कौन्हा । सतसुकृत उनहु नहि चीन्हा ॥ ब्राह्मन छत्री वानी । तिनहुकी करी न कानी ॥ तुम रुंड मुंड बासी । तू करवा चौथ उपासी ॥ करवा चौथ अहोई । सब रांडनकी मति खोई ॥ कहैं कवीर ब्रह्मवानी । तै सुंहि सुनी औ जानी ॥

गारी ॥ १२ ॥

तुम पहिरो सुमति सिंगार, भजनकी चुनरिया ॥ तेरे ढिग ढिग विधि बिचार, पची सो घूँघरिया ॥ तेरे पायल गहर गंभीर, सदा सुख सेहडिया ॥ तेरेहि बडे हार हमेल, दयाकी टोलनिया ॥ तेरे त्रिकुटी तिलक संजोय, जगत मन मोहनिया ॥ दूध बेचन निकसी हो, सुमति भरि गवालनिया । आडे होय रहिय हो,

(३४८)

कवीरपंथी—

सतगुरु गैलनिया ॥ नहि नहि साहब हो, नहि भइ बोहनिया ॥ चलु गगन में हो, जहाँ तेरि वोहनिया ॥ जब गई गगनमें हो, गगनमें मगन भव्यनिया ॥ मैं बहुरि न आऊँ हो, भइयाकीसों वा गलिया ॥ ऐसे कहैं कवीर साहब हो, अटल भई गोवालनिया ॥

गारी ॥ १३ ॥

सुन समधिन चतुर सुजान, कहैं इक बात भली ॥ तु तो अजहूँ चेत सम्हारि, सपेदी बगर गयी ॥ तेरि खाल गई कुम्हलाय, ममता अजहुँ न मुखी ॥ चल गगन महलमें हो, निरगुन सेज विछी ॥ तेरि पायलकी झंकार, झहरमें रोर परी ॥ तेरे दो मारगके बीच, डगर इक ज्ञान गली ॥ तेरो हटकनहार कौन, निसा सो आवचली ॥ तोंसों कवीर कहैं समझाय, भजनकर घडी घडी ॥

गारी ॥ १४ ॥

सुनु समधिन संसे गारि । तोंसे बहुत विधि कहौं पुकारि ॥ एतो पीर पैगम्बर जोगी । तैं तो छलि बलि किये वियोगी ॥ एतो पारासरसे जोगी । तैं तो नाही काहूँको छोडी ॥ एतो शृंगी रिषि ब्रह्मचारी । तैं तो उनहूँकी करी खुवारी ॥ ऐसे कहैं कवीर बू दारी । मेरे साधासो बहुत विधि हारी ॥

गारी ॥ १५ ॥

तुम समझो कुमति देवरानी । तेरि कीरति जगत बखानी ॥ तेरे काम क्रोध दोउ भाई । हिरनाकुस मारि बहाई ॥ जोगी शिवशंकर ध्यानी । तेरी गति मति उनहूँ न जानी ॥ तुम रावनके घर आई । तुम सीता हरन कराई ॥ तुम पंडवनके घर आई । उन पासे खेल हराई ॥ तुम कौरवनके घर आई । सब कुनबा नाश कराई ॥ तोंसों कहैं कवीर समझाई । नकटी तोहि लाज न आई ॥

गारी ॥ १६ ॥

धनि आय सम्हारो हो, घरकी खबर भई ॥ आय धाय गहो गुरुके चरन, दया करि लइ अपनी ॥ गुरुतत्व लखायो हो, खडी

शब्दावली

(३४९)

भयी ज्ञान गली ॥ जब तत सम्हारी हो, कि सन्मुख पीवसो भयी ॥ संतोष सिला पर हो, कि षटकी पांच जनी ॥ सब मारे पिसनिया हो, कि सिलकी सांग हनी ॥ धसि आय महलमें हो, कि गगनमें मगन भई ॥ साधु तुम जिन जानो गारि, कि सुक्तिकी राह कही ॥ तो सो कहैं कविर समझाय, कि याही मत आव चली ॥

गारी ॥ १७ ॥

सुनु समधिन चतुर, अइलों मैं तोरे आंगना ॥ तेरे अंगना समधिन तीव्र छन्दना तै तो कहा रची जिवनार, पाहुन आये संतजना ॥ टे० ॥ समधी हमारे बालो भोलो, समधिन छैल-चिकनिया ॥ या समधिन सुर सुनि मोहे, कि तीन लोककी रनिया ॥ १ ॥ इक ऊठे इक बैठे समधिन, इक आवे इक जाय ॥ लख चौरासी रुयाल तुम्हारो, फिर फिर गोता खाय ॥ २ ॥ कोइ ध्यावे तीरथ बरतको, कोइ पूजे पाषान ॥ ऐसा रुयाल तुम्हारा समधिन, समधी देखि ललचान ॥ ३ ॥ कहैं कवीर सुनो हो समधी, मानो वचन हमार ॥ अबकी बार रहनिमें रहिहो, उतरो भवजल पार ॥ ४ ॥

गारी ॥ १८ ॥

जो तू पियाको पियारिनी, पिया अपनेको सिंगार करो ॥ जाकी सुमतिकी कंगही, कर्म केस निरुवार करो ॥ जाके तत्वको तेल, प्रेम डोरिसे चोटी गुहो ॥ जाके अलखकी कजरा, विरहकी बेंदी लिलार भरो ॥ जाकी नेह नथुनिया, शीलकी लटकल लटक रहे ॥ जाकी बोध चुनरिया, ज्ञानका लहैगा घूम रहे ॥ जाकी अकिलकी अंगिया, सुरति निरति द्वै बन्द लगे ॥ जाकी चितकी चुडिया, कसनीके कंगना दमक रहे ॥ जाके शीलका सोंटा, मायसे हरदम हमेल परे ॥ जाके जुगतकी जेहर, शब्दकी

(३५०)

कबीरपंथी—

विछवा वाज रहे ॥ इतना धन पहिर धनी, रुठे पियाको मनाव सही ॥ पिय हमसे बोलो, साहब कबीर दया करी ॥

गारी ॥ १९ ॥

अब चित चेतले तू, काहे भूले मूरख गवॉर ॥ मय्या तो तेरी कुवैर देई, लागे उनके मनुष हजार ॥ चकर मकरकी चाची तेरी, उनहुँका यही हवाल ॥ हरफ निरफकी फूफू तिहारी, उनहुँके दश लगवार ॥ अनबुधिया तेरि बहिन बजिन्द, फादि जाय डंडवार ॥

सत्यनाम ।

श्री १०८ युतसदगुरु श्रीभक्त शम्भुदासजी साहब इन्दौरी संशोधित शब्दादि यहाँसे आरम्भ होता है ॥

  • दुमरी खंभाच ॥ १ ॥

सखीरी मेरे मनमें बस्यो है सतनाम । लोग कहैं यह भयी है बावरी, मोहि मिल्यो सुखधाम ॥ १ ॥ जबसे दृष्टि परी सतगुरुकी, मूरति ललित ललाम । तबसे जानि परचो मोहि झूठो, यहि जगको परिनाम ॥ २ ॥ मैं आयी संतनकी शरने, होय सबसे बदनाम । कोइ निन्दो चाहे कोइ वन्दो, मोहि न काहुसे काम ॥ ३ ॥ मेरे प्राण नाथ मोहि अस प्रिय, ज्यों लोभीको दाम । जो उनके उपदेश मनोहर, सो मोहि ऋग यजु साम ॥ ४ ॥ जिन अपनो पिय नहि पहिचान्यो, सो तिय निपट निकाम । सोइ धन्य सुगति जाकी है, पियमें आठो जाम ॥ ५ ॥ काहूको पति है अति ज्ञाता, काहूको नृप अभिराम । धर्मनि तो ऐसो पिय पायो, जाके है सकल गुलाम ॥ ६ ॥

• सूचना. जो छोटा बीका करते हैं जहाँ दो बार नारियल मोरना और थोड़े आबनियोंको प्रसाद देना होता है वहाँ तो जन्दा फुरसत हो जाता है, वहाँ पीछे लिखे हुए विधानके शब्दोंसे ही काम चल जाता है, अधिककी आवश्यकता नहीं होती किन्तु, जहाँ सैकड़ों नारियल मोरना, बहुतोंको कठी आदि देना और बहुतोंको प्रसाद बाँटना पड़ता है, वहाँ गानेवालोंको भी बहुत देर तक गाना बजाना पड़ता है, इस लिखे इसके आगे नाना राग रागनियोंके संकेतयुत पदादि दिये जाते हैं जिसमें गानेवालोंको सुभीता और सुननेवालोंको आनन्द होवे ।

प्रवदीय—

श्रीयुगलानन्द विहारी.

शब्दावली

(३५१)

दुभरी ॥ २ ॥

गाफिला क्यों विसरचो घनी। तेरी सुन्दर काया बनी ॥ ८० ॥ गर्भ वासमें भक्ति कबूल्यो, विनती करके घनी। भूल्यो आय गोदमें लीन्यो, जब तो को जननी ॥ १ ॥ बालपना सब खेलि गँवायो, तब कुछ नाहि गनी। तरुण भयो मदमें मत्त होय, मोह्यो लखि तरुनी ॥ २ ॥ बृद्ध भयो तन काँपन लाग्यो, कैसी औनि ठनी। तीनौपन ऐसेहि गवायो, आयुष सब अपनी ॥ कहैं कवीर चेतु नर अजहूँ, बाकी है इतनी। अब मूरख अवसर मति खोवे, यह अनमोल मनी ॥ ३ ॥

दुभरी जिला।

सखि सोइ सुन्दरी पियकी पियारी। जाकी सुरति एक पल स्वप्नहेडु, होत न पियसे न्यारी ॥ ८० ॥ धोय गुमान मैल सब तनसे, ओढ़ि शीलकी सारी। सत्यवृत्तका पहिरि घाघरा, चाल चले मतवारी ॥ प्रेमकी अँगिया भक्ति चुडिया, समताके कँगना री। बेंदी विनय विमल श्रद्धाको, उरमें हार हजारी ॥ आगमको कूंकू मस्तकपर, ज्ञानको अञ्जन सारी। यहि विधिसे निज पियको रिझावै, अटल सिंगार सिंगारी ॥ अपने मरम धर्म पति सेवा, जाने हृदय विचारी। तीरथकी इच्छा जो होवे, पीवे चरण पखारी ॥ और पुरुषको पति करि जाने, सो नारी कुलँटारी ॥ सत्य पुरुषको जो तिय सेवै, सोई पतिवर्तारी ॥ क्यों भूली तू देखि जगत सुख, विषयभोग दिन चारी ॥ हो तजि सब प्रपंच गुरुशरणे, मानिके मेरो कहा री ॥ कहैं धर्मनि सोई चतुर विचक्षण, सोई कुलवन्ती नारी। जो निजपरमात्म पिय पायो, ताकी मैं बलिहारी ॥ १ ॥

सखि ! मैं धन्य सोहागिनि नारी। मेरो पति पूर्ण परमात्म, अजर अमर अविकारी ॥ ८० ॥ औरनके पति एक दिन विछुरत,

१ आय उपस्थित हुई. २ स्त्री. ३ प्रसन्न करे ४ धोयके. ५ व्यभिचारिण ६ पतिव्रता

(३५२)

कवीरपंथी—

तजि निज सुन्दरी प्यारी । मेरे प्राणनाथ मोहि एकक्षण, करत न उरसे न्यारी ॥ जाको खोज करत निशिवासर, बडे २ तप धारी । चकित होत वरणत श्रुति गुण जेहि नेति २ कहि हारी ॥ संयम नियम शृंगार है मेरो, श्रद्धा सहित सँवारी । पहिरोँ विविध विवेकके भूषण, ज्ञानको अन्न सारी ॥ सत्य नाम कंकूका टीका, मस्तकपर सुखकारी । गुरुके वचन कानमें मोती, तिनकी बहु शोभा री ॥ इन्द्रमती सतगुरुके चरणन, तन मन धन सब वारी । प्रियतम पाय कवीर कृपानिधि, रहत सदा मतवारी ॥ २ ॥

वात्ता ।

कब करिहौ मोपे दयाकी नजरिया । तुम्हरे दरश बिन निशिदिन तलफों, जिमि तलफत बिन जलके मछरिया ॥ टे० ॥ मंगल मूरति परम मनोहर, श्वेत वसन जस चमके उजेरिया ॥ शीश सुकुट उरमाल भाल बिच, तिलक रुचिर लखि मुनि मन हरिया ॥ दरश हेतु गृहकाज छोडि सब, कबकी मैं ठाढी २ देखों डंगरिया ॥ धर्मैनिको राखों चरणनमें, करिहों सदा तुम्हरी परँवरिया ॥ १ ॥

कब मिलिहो त्रिभुवनपति स्वामी ॥ करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, विमल जलजपँरणज सुखधामी ॥ टे० ॥ परम स्वच्छन्द अनन्द ज्ञानघन, द्रन्द्व रहित मति गति अभिरामी ॥ अशरण शरण भक्तभवभजन, सेवक सुखद सन्त अनुगामी ॥ वरणत विशद विशेष वेद यश, कँस न सुनहु मम अन्तर्धामी ॥ धर्मदास कर जोरि बदत इति बार बार तव चरण नमामी ॥ २ ॥

का वरणों छबि आज तुम्हारी ! सन्तसमाज विराजमान जिमि, सुरगन बिच सुरपति अधिकारी ॥ टे० ॥ दिपत दिनेश समान

१ ब्रह्माका प्रकाश. २ मार्ग, रस्ता. ३ सेवा. ४ कमलपत्रपर. प्रगट हुये. ५ क्यों नहीं. ६ इन्द्र.

शब्दावली

(३५३)

तेज वपु, मङ्गलवेष परम सुखकारी । सुन्दर वदेन मदन लखि लाजत, हुलसत मन सुसक्यान निहारी ॥ भुक्कूटी कुटिल कपोल मनोहर, चोरत चित चखें चितवन न्यारी । नाशों रुचिर कपोल मनोहर चारु चिबुंक अति लागत प्यारी ॥ भाल तिलक चुरमाल सुकुट मणि, जडित तडित सम मस्तकधारी । विमल वसेन तन लसत हसत जिमि, देखि मन्द बुति चन्द उजारी ॥ अशरण शरण हरण भव संकट, तारण तरण नाथ बलिहारी । धर्मदास सब करत निछावर, तन मन धन चरणन पर वारी ॥ ३ ॥

कोइ समुझै ब्रह्मज्ञानी मेरे सह्ररुकी बानी ॥ टे० ॥ क्या समुझैं वे वेदके वक्ता, विद्याके अभिमानी ॥ यदपि दिखत कह्यु अर्थ असंगत, तदपि प्रबोधकी खानी ॥ लोक वेदसे है वह न्यारी, त्रिगुण रहित निरवानी ॥ साधु सन्त सब शीश चढावें, महामंत्र सम जानी ॥ धर्मिनिके तो परम शिरोमणि, पाय भई पटरानी ॥ ४ ॥

हुनिया अजैब दिवानी, मोरी कही एक न मानी ॥ टे० ॥ तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, इत उत फिरत मुलानी ॥ तीरथ मूरति पूजत डोले, कङ्कर पत्थर पानी ॥ विषय वासनाके फन्दे परि, मोहजाल उरझानी ॥ सुखको दुख दुखको सुख माने, हित अनहित नहि जानी ॥ औरनको मूरख ठहरावत, आप बनत है सयानी ॥ साँच कहौं तो मारन धावें, झूठेको पतियोंनी ॥ कहैं कवीर कहाँ लग बरणों, अद्भुत खेले बखानी ॥ ५ ॥

ध्वनि खन्नाच.

ध्याइये गुरुपद सुखदायक ॥ टे० ॥ विघनहरण सुदकरण सुमंगल, ऋद्धिसिद्धि वरदेशें विनॉयक ॥ नाम लेत सब पाप प्रनाशत, बहु जैनमनकृत मनैवचकायक । करुणामिन्दु कृपाल

१ मुख. २ नेत्र. ३ नासिका, नाक. ४ दृष्टी, डाली. ५ वस्त्र. ६ मनोषी, अद्भुत. ७ कंठी हुई. ८ खुर. ९ शरोसा किया. १० आशिर्वादके प्रभु. ११ श्रेष्ठ. १२ अनेक जन्मोंके किये हुये. १३ मन बाणी बीर शरीरसे.

कवीरपंथी शब्दावली १२

(३५४)

कवीरपंथी—

दयानिधि, शरणागतवत्सल सब लायक ॥ तारण तरण भक्त- भवभञ्जन, अधम उधारण सन्त सहायक ॥ धर्मदास इति वदत विनय करि, सत्य कवीर मोरे पितु मायक ॥ १ ॥

नाथ एक आश है मोहिं तुम्हारी । सुत कुपूतहू पर राखत है, ममंता पितुंमहतारी ॥ टे० ॥ मो सम को कृतैत्र खल पामर, कूर कुटिलें कुविचारी । भोग्यो श्वान समान जगत् सुख, लोक लाज भय टारी ॥ रह्यो अधीन सदा मायाके, प्रभुको नाम विसारी । सुर डुरलभ तन पाय गवाँयो, विषय विश्वा झखमारी ॥ भूलि सकल कर्तव्य आपनो, सोयो पाँव पसारी । स्वप्ननेहु सुकृत कियो नहिं कबहुँ, धर्म अधर्म विचारी ॥ और न कुछ विश्वास मोहिं प्रभु, कहै धर्मदास पुकारी । पै मैं पतित पतितपावन तुम, यह भरोस यक भारी ॥ २ ॥

मेरे निरधनके धन सतनाम । जेहि प्रताप कोई राँव रंक्से, मोहिं नहीं कुछ काम ॥ टे० ॥ कामधेनु चिन्तामणि पारस, कल्पवृक्ष अभिराम । ऋद्धि सिद्धि सब ताके सन्मुख, दीखत तुच्छ निकाम ॥ अक्षर चारि अखिल फलदायक, अतुलित ललित ललाम । महामन्त्र यहि जानि सन्तजन, जपत हैं आठो योम ॥ नासत सकल अरिष्टें दाहिने, होत विधाता वाम । उठि प्रभात जो करत है चिन्तन, क्षणधरि मन विश्राम ॥ दृढश्रद्धा धर्मदास धारि उर, तजि रहीम अरु राम । गुरु कवीरके शरणे आयो, तब पायो सुखधाम ॥ ३ ॥

मूषालो.

आवो सखी मिलि मङ्गल गावो मोरे अँगन माँरी ॥ टे० ॥ आज सुन्यो सतगुरु आवत हैं, आली मोरे भवेंनमाँ ॥ सखीरी

१ कुपात्र. २ प्रीति. ३ पितामाता. ४ किये उपकारको न माननेवाला. ५ नीच. ६ क्रोधी. ७ कपटी. ८ राजा और दीनसे ९ प्रहर. १० कष्ट ११ घरमें

शब्दावली

(३५५)

मो० ॥ शब्द सुनत प्रभुके आवनको, रस बरष्यो काननमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ फरकत नयन शकुन शुभ होवैं, अति अनन्द होय मनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ बोलत मोर पपीहा चहुँदिश कोयल कुडुकत बनमाँ ॥ सखी० ॥ बारबार मेरो हिय हुँलसत है, पुलंक उठत सब तनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ गुरु आवत धर्मिनि उठि धाई, जाय परी चरणनमाँ ॥ सखीरी मो० ॥ १ ॥

कोसिया काकी ।

आज मोरे सतगुरुको गृह लाऊँ ॥ टे० ॥ चरण धोय चरणाभूत ले करि, सिंहासन बैठाऊँ ॥ चन्दनसे चौका लिपवाऊँ, मोतियन चौक पुराऊँ ॥ नरियर पान सुपारी केला, फल अनेक मँगवाऊँ ॥ श्वेत मिठाई विविध भाँतिकी, थारन माहिँ भराऊँ ॥ कञ्चन कलश कपूरकी बाती, आरति साज धराऊँ ॥ अभूतझारी प्रेमसहितले, प्रभुजीको भोग लगाऊँ ॥ तन मन धन निछावरि करिकै, आनन्द मंगल गाऊँ ॥ धर्मदास विनवै कर जोरी, भक्तिदान गुरु पाऊँ ॥ १ ॥

आज मोरे घर साहिब आये, दर्शन करी दोड नयन जुँढाये ॥ टे० ॥ विगत छेश अखिलेश दयानिधि, मंगल वेष विशेष बनाये, । तिलक भाल उर माल मनोहर, शीश सुकुट मणिमय छबिछाये ॥ चन्दनसे चौका लिपवायो, गजमोतियनकी चौका पुराये । बाजत ताल भूदंग झाँझ डफ, साधुसन्त मिलि मङ्गल गाये ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, काम क्रोध मद मोह दुराये । भयो आनन्द भुवनमें चहुँदिश, चरण कमल रज शीश चढाये ॥ कञ्चन थार सँवारि आरती, धर्मिनि करत है हिय हुलसाये । करुणासिन्धु कवीर कृपानिधि, सत्यनाम निजमंत्र सुनाये ॥ २ ॥

ध्वनि संकोटी ।

आज गुरु दीनो नाम सुनाय । तजि सकल फन्द, भई अति

१ आनन्दित होता है, उत्साहित होता है २ रोमाञ्च होना. ३ शीतल हुए. ४ रत्नजडित. ५ शोभाको प्राप्त. ६ संजीरा. ७ छिपगये.

(३५६)

कबीरपंथी—

अनंद, जिमि रंक बिपुल धन पाय ॥ टे० ॥ लै तितुका तुरवाय कालसे, सुक्त कियो सब भ्रम जालसे; विविध भाँति उपदेश हठाय ॥ दुखदारिद्र दूरि सब भागे, सुदमंगल लखि ठांढे आगे, कुमति रही मनमें खिसियाय ॥ जब सतगुरुने नाम सुनाया, तब यमने निज शीश हिलाया, अब मेरो कुछ है न उपाय ॥ कहे धर्मनि सन्तन हितकारी, कृपाकरी मोपर बहुभारी, जन्ममरण भवरोग नशाय ॥ १ ॥

दरश कब देहो दीनदयाल । तुम्हरे दरश विन कँल न परत छिन, जिव अति होत बिहौल ॥ टे० ॥ वदन निहारि मदन छवि लाजे, शीश सुकुट अति सुन्दर आजे । उर गजमोतियन माल ॥ ललित कमण्डलु योगदण्डकर, भृकुटी कुटिल कपोल मनोहर, राजिवनयन विशाल । मंगलरूप अनूप सँहायक, भग्य वेष भक्तन वरदायक, शुभ्र तिलकयुत भाल ॥ निगमागम गुण गान करत हैं, सुरनरसुनि सब ध्यान धरत हैं, लखि भय मानत काल ॥ धर्मदास विनवै करजोरी, वेगि सुनो प्रभु विनती मोरी, करुणा-सिन्धु कृपाल ॥ २ ॥

माड.

दीनबन्धु दीनानाथ, महारी बीनती सुनौ ॥ टे० ॥ महारे तो शत्रु घणाजी, भक्ति करन नहिं देत । काम कोध मद लोभ ये महारी, सुमतीको हरि लेत ॥ तृष्णा परबल डाकिनी जी, लागी महारे लार । कंदेई तो धापे नहीं, इण खायो सब संसार ॥ शब्द स्पर्श रू रूप रस जी, गन्ध विषय ये पाँच । आप आपने खोंचकै; कोई महाने नचावे नाच ॥ मन मरकँट नहिं होत वश, कीन्है कोटि उपाय । ज्यों २ गहि परंमोधिye काई, त्यो २ भाग्यो जाय ॥

१ अत्यन्त. २ सन्मुख खडे हुये. ३ लज्जित. ४ शान्ति. ५ व्याकुल ६ आसा. ७ कमलनेत्र. ८ सहापता करनेवाले. ९ कदापि कबो भी. १० बन्दर. ११ उपदेश देना.

शब्दावली

(३५७)

भवसागरके चक्रमे, आय पडचो मँझधार। कर्कणाभवन कवीरजी, काई म्हाने करो प्रभु पार ॥ १ ॥

जहरीली योवन माती, यासे दूर भागिये॥टैक॥ इन्द्र डश्यो ब्रह्मा डश्यो काई, नागद डसिया व्यास। बात करत शिवको डशी काई, क्षण एक बैठत पास ॥ कंस वंशको नाश करिजी डश्यो रावणहि जाय। दश मस्तक कटवायकै काँई लड्डु दई लुटवाय ॥ पाराशरि शृंगी ऋषि जी, विश्वामित्र वशिष्ठ। और अनेकन सुनिन डशि काँई, कियो योगसे भ्रष्ट ॥ मोटा २ गारैडी इनसे मानी हार। कच्छ देशमें जायकै काँई, लागी गोरख लार ॥ माया काली नागिनी जी, डशिया सब संसार। बाँच्या कोई २ सन्तजन जी, कहै कवीर विचार ॥ २ ॥

ऐसो सुन्दर मुखडा पाकै, मूरख प्रभुको क्यों न भजै? ॥टे०॥ जिन जगमें सब सुख दियोजी, तिय सुत वित धन धाम। ताको नाम विसारियो काई, ऐसो निमकहराम ॥ अबही तो भूल्यो फिरे काई, ज्यों मदान्ध गजराज। एकदिन काल गिरासँहीजी, ज्यों तीतरको बाज ॥ अठावठासे लाय कर जी, सश्र्व धन दोउ हाथ। अन्त समय नहि जायगी थोर, फूटी कौडी साथ ॥ धन्देमें निशिदिन फिरे जी, आठो जौम गँवार। बणजाराका बैल ज्यू काई, गयो जमारो हार ॥ करसे दियो न दान कुछ, सुखसे लियो न नाम। खोय गमायो जन्म सब काँई, तीनो पन बेकाम ॥ विद्या पढि भूलो फिरे काई, मनमें करि अभिमान। सन्तांके उपदेशने तूं, तनक धरचो नहि कान ॥ मिथ्या जग परपंच सब तूं मतिना देखि भुलाय। कहै कवीर गुरु शरण गहु काई, ऐसो नरतन पाय ॥ ३ ॥

१ वंश भारना, काटना. २ मंत्रशास्त्री, ३ मक्षण करेगा. ४ जमा करत. है. ५ घास-ग्रह.

(३५८)

कवीरपंथी—

म्हारा साहिब महाने पाईंजी, गुरुज्ञान भाँग डली ॥ टे० ॥ सुरति शिलापर घोटिके काईं, सतगुरु ज्ञान निधान । अमृतसार निचोडियो जी, मति साफीसे छान ॥ हस्तकमल मस्तक धन्यो, भक्तिके रङ्ग लगाय । अनुभव प्यालो प्रेमको काईं, महाने दीन्हो पाय ॥ चठी खुंमारी आंखमें जी, रही निरन्तर छाय । सुख ब्रह्मा इन्द्रादिको काईं, तृणवत तुच्छ दिखाय ॥ दिव्यदृष्टि उरमें भईजी, लख्यो आतमाराम सन्ताँकी शरणो लियो महारे, जगसे रह्यो न काम ॥ पियत भाँग धर्मदासकी जी, मिटी सकल भवपीर । अटल बयालिस वंशको काईं, दीनों राज कवीर ॥ ४ ॥

गर्वा ।

देखो २ जगत् यह स्वपना है । ये तो इन्द्रजालकीसी रचना है ॥ टे० ॥ सुत द्वारा ग्रह परिवार सभी है मिथ्या सदा नहीं सत्य कभी, हाँहाँ अन्त कोई नहीं अपना है ॥ तू जो बाल बृद्ध अरु जवान भयो, सब माया कृत परपञ्च थयो, भ्रम मात्र ये तेरी कलपना है ॥ द्विज शूद्र ग्रहस्थ वनस्थ भयो, वर्णाश्रमको अभिमान गह्यो, त्रयतापसे यह सब तपना है ॥ गन्धर्वनगर जैसे दृष्टि परै, मृगतृष्णाको नीर न प्यास है, रजुसर्पसे जैसे डरपना है ॥ गुरुदेव कवीर कृपा जो करै, स्वपनेसे जगायकै दुःख है, निज आतमरूप परखना है ॥ १ ॥

बुथौ खोवे क्यों नरतन पायकैरे । मोहमायाके फन्देमें भुला- यकैरे ॥ टे० ॥ तरुनपना धन पायकै, मति हो मूढ उतैङ्ग । क्षणमें यह उडि जायगा, ज्यों पतङ्गको रङ्ग ॥ बिजली किसी चमक चमकायकैरे ? ॥ सदा न फूलै केतकी, सदा न भ्रमर लुभात । चार दिनाकी चाँदनी फेर अँधेरी रात । पछतायेगा अवसर गँवा-

१ नशा. २ घोखा. ३ बाजीगरका बनाया शहर. ४ मिथ्याजल. ५ रस्तीका लाप, ६ बिना प्रयोजन. ७ गर्ववाला. ८ एक प्रकार की रङ्गकी लकड़ी. ९ उजाली.

शब्दावली

(३५९)

यकैरे ! ॥ दो दिनाका मिहँमान तूं, आय वस्यो यहि धाम । आखिर तेरा होगया, यहाँसे कूँच मुकाम । रहेगा फिर कहाँ तूं जायकैरे ! ॥ स्वारथके साथी सभी सभी लोक कुटुम परिवार । अन्तसमय नहीं जायगा, कोई तेरे लार । घरसे डरेंगे बाहर उठायकैरे ! ॥ कहैं कवीर समुझायकै, सुन मूरख नादान । सीधे मारग जगत्वमें, चलतूंतजि अभिमान । साधु सन्तोसे शीश नवायकैरे ॥ २ ॥

दुमरी ध्वनि काकी.

पास खड़ा तेरे नजर न आवे, महँबूब पियारा वे ॥ टे० ॥ घट २ व्यापक सबकी जानै, रहे सबनसे न्यारा वे । दूंद २ कोह खोज न पायो, सब जग हारा वे ॥ स्मर्ण ध्यान योग संयम व्रत, नेम अचारा वे ॥ जाके हेत करत सुर नर मुनि, विविध प्रकारा वे ॥ वेद पुराण भागवत गीता, बहोत विचारा वे ॥ सबी अपार अगम्य अगोचर, अलख पुकारा वे ॥ छोड़िकै जिन अज्ञान कल्पना कुमति निवारा वे ॥ मिला कवीर तिन्हे दिल अन्दर, सिरजन हारा वे ॥ १ ॥

तुम कौन हो मियाँ कहाँके ? ॥ टे० ॥ कहाँसे आये, कहाँ जावोगे ?, किसे हाल अपना सुनावोगे ?, किसने भेजा, कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आते तुमने रोय दिया है, क्या लाये सो खोय दिया है ? । कौन जिकर किस फिकरमें, आँखे खोले हो के टाँके ? ॥ वतैन तुम्हारा कौन ठाम है ?, बड़ा सहर या कोई गौम है ? पूरव पश्चिम उत्तर दक्षिण, नैरित वायु ईशाँके ॥ आये हो जो इस नगरीमें, दया धरम कुछ राखो जीमें, अब ऐसी मत कीजो जिसमें, यहाँके न हो न वहाँके ॥ हिंदू हो या मुमल- मान हो ?, दाँना या बिलकुल नदाँन हो ?, कहैं कवीर कहौ कुछ हमसे, तिरछे हो के बाँके ॥ २ ॥

१ पाहुना. २ प्रयाण, जाना. ३ साथ. ४ प्रिय. ५ पूर्ण. ६ निवारन किया, लगाया, नाश किया. ७ देखा. ८ स्मरण. ९ चिन्ता. १० बंद किये. ११ जन्म स्थान. १२ ईशान कोण. १३ बुद्धिमान. १४ मूर्ख.

(३६०)

कवीरपंथी—

ऐसी प्रबल यह चपेल, नारि सब जग वश कीनोरे॥ टे० ॥ ब्रह्मचारी योगी संन्यासी, ऋषि मुनि तपसी वनवासी, दण्डी मुण्डी सिद्ध उदासी, कहु वचन न दीनोरे ॥ गण गन्धर्व असुर सुर किन्नर, दैत्य पिशाच प्रेत विद्याधर, इनको क्या ? पर विधि हरि शङ्कर छलि लिये तीनोरे ॥ अब औरनकी कौन चलाई, जो बैठे हैं स्वांग बनाई, त्याग बताकै करे ठगाई । धिग यह जीनोरे ! ॥ बचा चहो तो मनको बांधो, सत्य नाम उरमें आराधो, कहैं कवीर सुनो भाई साधो, गुरु पद चीन्होरे ! ॥ ३ ॥

दुसरी ध्वनि जंगला.

सुन्दर तन पाय न करु अभिमान । त्यागि सकल अंनरीति प्रीतियुत, धरु सतगुरुको ध्यान ॥ टे० ॥ दुख सुख सब जीवनको जगमें, व्यापत एक समान । दया धर्म कुछ राखि हृदयमें, दे भूखेको दान ॥ कर्म भोग भोगनको आया, दो दिनका मिहँमान । सदा न रहै साहिबी तेरी, क्षणभंगुर कहि जान ॥ जन्म पाय नर सुकृत करिले, जो चाहे कल्यान । गहु सतपन्थ ग्रन्थ गुरु संमंत, कहैं जो सन्त सुजान ॥ बारम्बार कवीर कहत हैं, सुनिले मूठ अयाँन । जो मानै तौ मान नहीं यह, गोंय यह मैदान ॥ १ ॥

करो न कोई यह मनकी परंतौत । थाह बताइ डुबावत भवमें, बनि हितकारी मीतें ॥ टे० ॥ गने न उदय अस्त निशि वासर, छाहैं घूप जल शीत । भटकत फिरि निरन्तर चहुँदिश, ऐसो महा पलीतें ॥ स्वर्ग पताल जाय एक पलमें, कँपिसम अति निरंभीत । गण गन्धर्व असुर सुर किन्नर, सबको लीनो जीत ॥ ऋषी सुनी योगी वनवासी, तपसी सिद्ध अतीत । छल्यो सकल ज्ञानी वि-

१ चन्द्रल. २ दण्डधारी. ३ बंरामी, ४ गान करनेवाले देव. ५ एक प्रकारके देव. ६ गणेश. ७ बेवविशेष. ८ रोको. ९ अभ्याय. १० पाहुना. ११ नारायान. १२ पुण्य. १३ मान्य. १४ मूर्ख. १५ विरहात् १६ मित्र. १७ अघम. १८ बंर. १९ निरभय.

शब्दावली ।

(३६१)

ज्ञानी, बहुविध करि अनरीत ॥ सुनै न एक सीख काहुकी, गावै अपनीहि गीत । कहैं कवीर डरे यह तिनसे, जिनकी गुरुसे प्रीत ॥२॥

जगतमें तो सम कौन अनारी । चहत बुझावैन काम अग्निको, विषय भोग घृत डारी ॥ ८० ॥ रह्यो सदा झूठे झगरनमें, शठ प्रभुनाम विसारी । खायो पियो अघाय पेट भरी, सोयो पांव पसारी ॥ तृष्णाके वश भटकत डोल्यो, निशिवासर झख मारी । छल परंपंच कपट फैलावत, उमर गँवाई सारी ॥ कबहुँ न सुमति आनि उर तनकहु, देख्यो आँखि उधारी । अन्त समय यमदूत आयकै, का गति करहि हमारी ॥ अजहुँ मानु सीख सन्तनकी, भाव भक्ति उरधारी । गहु गुरु शरण तरण भवसागर, कहैं कवीर पुकारी ॥ ३ ॥

समय यह नीको बीतयो जात । पल २ क्षण २ घरी पहर होय, दिवस सांझ परभात ॥ ८० ॥ फूटे घट जिमि वारि आयु तिमि, क्षीण होत दिनरात । तापर जरा वाघिनीके सम, आवत है अकुलात ॥ विविध प्रकार रोग शत्रुगण, मारि २ कै लात । करत प्रहार वज्र जिमि तनपर, यहि नाना उत्पात ॥ मुखमें दांत रहै नहि एकहु, शिथिल होय सब गात । देखि न परै नयनसे मारग, तृष्णा तहुँ न बुढात ॥ कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, एक हमारी बात । मन वच सत्यनाम आराधो, जो चाहो कुशलतात ॥ ४ ॥

कृपानिधि अब तौ मोहि तँन हेरो । तुम विन कौन और है जगमें, नाथ सहायक मेरो ॥ ८० ॥ भटकत फिरत दुष्ट मन इत उत, जैसे अललंबछेरो । उर सन्तोष करब नहि पावत, एक पल आय वंसेरो ॥ कुमति प्रबल होय लरति सुमतिसे, करि घट मांहि

१ भूख. २ शीतल करना. ३ जल. ४ मारना, बार करना ५ डीला. ६ कल्याण. ७ मेरी तरफ देखो.

८ जिसको लगाम नहीं चढ़ाई गई ऐसा घोड़ेका बच्चा ९ निवास.

(३६२)

कवीरपंथी—

अँधेरो । राखा चहत मोह अपने वश, प्रभु यह न्याय निवेरो ॥ युगन २ तन धारि अनेकन, कूकर झूकर केरो । भवसागरकी प्रबल धारमें, पायो दुख बहुतेरो ॥ धर्मदास विनवे कर जोरी, चरण कमलको चेरो । अभय दान गुरुदेहु दयाकरि, मेटि चौरासी फेरो ॥६॥

शरण तोरी आयो गरीबनिवाज । कलिमल हरण करण सुद- मङ्गल, भवनधितरण जहाज ॥ टे० ॥ विश्व आय अवतार लियो तुम, अधम उधारन काँज । मो सम कौन जगतमें दूसर, पति- तनको शिरताँज ॥ कुबुधि अधीन रहों निशिवासर, खोरि विषयकी खाज । कबहुँ न सुनी सीख सन्तनकी, बैठिके साधु समाज ॥ किये अनेक अधर्म कर्म मैं, महाकुगतिको साँज । अति मलीन मति हीन दीनकी, अब तुमको है लाज ॥ करूणासिन्धु कवीर कृपा करि, कर पकन्यो गुरुराज । होय कृतार्थ धर्मदास कहत हैं, धन्य पुण्य मन आज ॥ ६ ॥

धन्य नर गुरुमहिमा जो जाने । सो अति नीच त्रिलोक्य पूज्य है, अस कथि कहत सयाने ॥ टे० ॥ वेद पुराण सन्त गुरुके गुण, हरिसे अधिक बखाने । नाम लेत अघ पुञ्ज नाश होय, तीनो ताप सिराने ॥ हरिमाया वश जीव भ्रमत हैं, मोह- पाश उरझाने । गुरुकी कृपा छूटि बन्धनसे, पहुँचै मुक्ति ठिकाने ॥ जानि मनुष्य मूढ जो गुरुको, सेवत चरण विराने ॥ ते नर महा अधम है पामर, केवल कलिमल साने ॥ भवसागरमें भटकत २ अजहुँ न पावैं पिराने । धर्मदास विश्वास हीन जन जमके हाथ विकान ॥ ६ ॥

गजल, ताल दादरा.

मोहि अति अजान जानिकै, मोपै कृपा करो । जगजाल अति

१ दोनोद्वारन. २ अर्थ. ३ मुकुट. ४ खजाक. ५ साहित्य. ६ शीतल हुए. ७ स्थान. ८ अन्यके. ९ पापसे अरे.

शब्दावली

( ३६२ )

कराल झाल, मेरो प्रभु हरो ॥ टे० ॥ वह इन्द्रमतीकी पुकार, सुनि उदार हो । कीन्ही सहाय जायकै, तक्षंक बहोत डरो ॥ जब सेतु बांधनेको, पुकारा था रामने । तब धाय आये कौनसो, संकट तुम्हे परो ॥ पुनि जाय जगन्नाथमें, तुम योगदण्डसे । सागर हटाया आपने, अति कोपसे भरो ॥ साहिब कवीर मेरी पीरके, बखत कहाँ ? । सोयेहौ आप जायकै, कुछ मनमें अब धरो ॥ १ ॥

गजल ध्वनि ईमन

विषयोंसे मनको तृप्त, कराना नहीं अच्छा । जलती अगिनको, घीसे बुझाना नहीं अच्छा ॥ टे० ॥ सुख भोग ये जगतके, सबी होंगे नाशमान । तृष्णाको बढा, जीको फँसाना नहीं अच्छा ॥ ये स्वप्रका तमाशा, है झूठमूठका । रंग रंगके खेल, देख लुभाँना नहीं अच्छा ॥ धन धाम पुत्र कलत्र, रूप जो पाया । हैरगिज गहूर, इनका है लाना नहीं अच्छा ॥ पल २ अमोल जाती है, कहते हैं ये कवीर । मानुष शरीर मुँफत गँवाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥

प्रबल ये सेर्न मायाने, चलाई है कृपासिन्धू । बचाले जालसे, तेरी दुहाई है कृपासिन्धू ॥ टे० ॥ गर्भमें कौलँ था मेरा, न झूलूँ ध्यान मैं तेरा । वो बातें उसने छल बलसे भुलाई है कृपासिन्धू ॥ हमेशा लोभसे रहता है, मन मैला बना बेशंक । दिखानेको ये ऊपरकी सफाई है कृपासिन्धू ॥ पड़ा अज्ञानके वशमें, तडँफता हूँ मैं मुहँतसे । तेरेही हाथमें मेरी, रिहाई है कृपासिन्धू ॥ त्रिविध कर्मोंसे जो पैदा, जन्म अरु मरण बीमारी । वो तेरेही कृपा इसकी, दवाई है कृपासिन्धू ॥ अजैब ढँगकी यह दुनिया जो, दुँरंगी देख पडती है । सो सब तेरीही कुदँरतने, बनाई है कृपासिन्धू ॥

१ एक प्रकारका सर्प. २ आसा. ३ मोहित होना. ४ स्त्री. ५ कदापि. ६ अभिमान. ७ व्य. ८ कटाक्ष. ९ वचन १० यथार्थ. ११ स्वच्छता. १२ व्याकुल. होना. १३ बहुत कालसे. १४ मोक्ष. १५ अक्षुत प्रकारकी. १६ इन्द्रसहित. १७ माया.

( ३६४ )

कवीरपंथी—

नहीं है दोष कुछ तेग, हुआ जो होरहा होगा। ये सुखदुख सबको कर्मकी, कंमाई है कृपासिन्धू ॥ विना भक्तीसे जो कवीर, तारे हैं कई पापी। इसीसे जगत्में तेरी, बड़ाई है कृपासिन्धू ॥ २ ॥

गजल ६वनि जंगला.

वो जो गर्भमें दुख था जबैर, तुझे याद हो कि, न याद हो। आया था तब तूँ कौलकर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ टे० ॥ मलमूत्रसे तौ शरीर सब, लिपटा हुआ दुरगन्धमें। जठराग्निसे जलनेका डर, तुझे याद हो कि न याद हो। उलटा टेंगा अति कष्टसे, नीचा किये शिर पैरमें। रोता था हरदम आंख भर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ इस दुखसे काटौ सुझे, हरगिज न भूलूँगा मैं तुझे। कहता था होहोके बेखबैर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ नव मास रक्षा की प्रभू, फिर गर्भसे बाहेर किया। बलहीन बालक बेखबैर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ फिर दूधसे पालन किया हो, ज्वान मायामें फँसा। फिरने लगा तूँ इधर उधर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ कपडे अभूषण पहनकर, चलनेमें देखै छाँहको। मोहित हुवा लखि नारि पर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ रहकर जवानी कुछ दिनों, आते बुढापा देख कर। कँपने लगा शिर सर्बैसर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ अब भी तो मूरख चेत तूँ, तीनों ये पन योही गये। कवीर कहते हैं अंगर, तुझे याद हो कि न याद हो ॥ १ ॥

गजल ६वनि जिला.

तजि सकल तर्दवीर, एक कवीरको ध्याया करो। होके दीन अधीन सन्तोंके, निकट आया करो ॥ टे० ॥ फूल फल परसाद, थोडा बहुत श्रद्धाके सहित। बन सके जो कुछ सो, उनकी भेटको लाया करो ॥ धरके सन्मुख उनके, अपने हाथ दोनों जोड़कर।

१ फल प्राप्ति. २ कठिन. ३ स्मरण. ४ अवैर्य. ५ अज्ञान. ६ साक्षात्. ७ यवि. ८ प्रयत्न ९ पास.