भारतकोश
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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(३६५)

अदंबसे अभिमान तजि, चरणोंमें शिर नाया करो ॥ सुनिके उपदेशोंको उनके, मनन कर फिर बारबार । निदिध्यासन करके उसको, काममे लाया करो ॥ दमैवदम् कर याद वह, धर्मदास उठते बैठते, सत्यसाहिब, सत्यसाहिब, कहके गुनगाया करो ॥१॥

गजल ध्वनि बन्धाव.

भरा सतसंगका दरियाँ, नहालो जिसका जी चाँहै । जिंगरसे दाँग पाकका, छुडालो जिसका जी चाहे ॥ टे ॥ न ऐसा और है तीरथ, जगतमें दूसरा कोई । गया हरद्वार जाके, आजैमा लो जिसका जी चाहे ॥ ऋषी सुनियोंने भी गाई, बहोत कुछ इसकी जो महिमा । लिखी वह पोथियोमें है, पढालो जिसका जी चाहे ॥ नहीं इसमें जरा तअंजुब, जो फल सन्तोंने फरमाया । कागसे हंस अपनेको, बनालो जिसका जी चाहे ॥ हजारों रत्न बेशमंत; भरे आलॉसे आला हैं । जरा इसमें लगा गोतों उठाले, जिसका जी चाहे ॥ सुकत होना चहो दुखसे, तौ धर्मदास सतगुरुके । शरण आ कालसे तिनका, तुडालो जिसका जी चाहे ॥ १ ॥

हे नाथ ! इस जगतमें, सिवा कौन तुम्हारे ? । माता पिता स्वामी सखा, बंधू है हमारे ॥ टे० ॥ ऐसा दयाल और, नहीं दूसरा धनी । करि कष्ट नष्ट जीवके, दुखद्वन्द्व निवारै ॥ जब २ तुम्हारा नाम लै, भक्तोंने पुकारा । तब २ सहाय करनेको, आपी तौ सिधारे ॥ चारों युगोंमें धारि रूप, तुम प्रगट भये । पापी अनेक तारकै, भवपार उतारे ॥ महिमा अनन्त आपकी, कोई न कह सके । यह जानि भेद वेद, नेति २ उचारे ॥ अब बेगि मोहिं दीजे, दर्शन कृपानिधे । होय अति अधीन दीन, धर्मदास पुकारे ॥२॥

विनती मेरी पै ध्यान, जो है तुम्हारा नहीं । आश्रित क्या

१ नम्रतासे. २ निरन्तर. ३ समूह. ४ इच्छा हो. ५ अन्तःकरणसे, विलसे. ६ संस्कार ७ परीक्षा कर लो. ८ आश्चर्य. ९ कथन किया. १० अमूल्य. ११ श्रेष्ठ. १२ दुबको.

(३६६)

कबीरपंथी—

दास आपका, मैं बिचारा नहीं ॥ टे० ॥ मैं तो अनाथ मेरे, कौन दूसरा धनी । एक छोड़ तुम्हे और मुझे सहाँरा नहीं ॥ मेरी तौ दौड़ें फँत, तुम्हींतक कृपानिधे । तीनों भुवनमें और, कहीं गुजारा नहीं ॥ कई एक दफे जो आफतें, भक्तोंपै आं पड़ी । तो आपने क्या उनके, दुखको निवारा नहीं ? ॥ क्या मुझसंरीके पातकी, तुमने कभी कोई । भवसिन्धु डूबतैसे, पार उतारा नहीं ? माना की मैंने पाप, मेरे है प्रबल सही । पर कम्भी भी तुम्हारी, दयाको इशारा नहीं ॥ दरशन जो अवतलक, न दिये आपने कबीर । क्या लैके धर्मदास, नाम पुकारा नहीं ? ॥ ३ ॥

गजल ध्वनि पीलू.

जगत् जिसका ये कुँल, बनाया हुआ है । वही सब घटोंमें, समाया हुआ है ॥ टे० ॥ नहीं दूसरा कोई, है उससे न्यारा । वो अपनेमें, आपी भुलाया हुआ है । हरैएक शै जो हैगी, वो रङ्गोबैरङ्गी । ये जलैवा उसीका दिखाया हुआ है ॥ उसीकी अकँलमें, ये आती है बातें । शरण सद्गुरुकी, जो आया हुआ है । है ताकैत उसीमेंही, मँखोलनेकी । जो कुछ भेद सन्तोसे, पाया हुवा है । धरमदास अपनी, उसीकी फिंकरमें । करोड़ोंकी दौलत लुटाया हुआ है ॥ १ ॥

गजल ध्वनि कहरवा.

कृपा करनेको भक्तोंपर, प्रभू सतलोकसे आये । कमलदलपर प्रगट, काशीमें हो कबीर कहवाये ॥ टे० ॥ बनाके वेष साधूका, लगे फिरने घरोघरमें । कहैं हमसे करो चर्चा, ये सुन विद्वान घबरायें ॥ चली नहिँ और कुछ युक्ति, तौ सब पण्डित लगे कहने । बतावो ये हमें पहले कि, दीक्षा किससे तुम लाये ॥ न हँरगिज

१ दीन. २ आश्व. ३ प्रयत्न. ४ कबल. ५ निवाह. ६ प्रातहुई. ७ मेरे समान. ८ सत्य. ९ कटाक्ष. १० यह संपूर्ण. ११ प्रत्येक पदार्थ. १२ नाना प्रकारके. १३ जोति, प्रकाश. १४ बुद्धिमें. १५ शक्ति. १६ कहनेको. १७ विचारमें. १८ चर्कित हुए. १९ कभी.

शब्दावली

(३६७)

ज्ञान दुनियाँमें, कभी परमान होता है। बिना कोई गुरुके पास, जाकर कौन फुंकुंवाये ॥ ये सुन कौतुक किया ऐसा, धन्यो लंघु रूप बालकका, जाय गङ्गा किनारे घाट पर सोये ये शिर नांये ॥ नहानेके समय जातेमें, रामानन्द स्वामीकी। खड़ाऊँ आ लगी शिरमें, तो दैयाँ। कहके चिल्लाये ॥ दयालू सन्त ये स्वामी, उठाके गोदमें बोले। भजो श्रीराम मत रोवो, मिटै दुख हरिका गुण गाये ॥ करी ऐसी कई लीला, कहाँतक कह सके कोई। सुक्ति धर्मदास है जगमें, उन्हीकी शरणमें जाये ॥ १ ॥

लीला अनेक देखके, सतगुरु कवीरकी। भई अकृ परेशान है सुलतान मीरकी ॥ टे० ॥ सलंतनत् बादशाही थी उस वखत अंजीब। सब हो रहे थे हिन्दू, हरहाँलसे गरीब ॥ धर्मों करमसे रहना, था किसके तब नँसीब। यह बात सम्भव पन्द्गा, सौके कि है करीब ॥ फैली जगत्में चरचा, थी धर्मवीरकी। भई अकृ० ॥ होलीके दिनों वेश्याको, लैकै अपने साथ। फिरते फिरे काशीमें, डाले गलेमें हाथ ॥ रीवाँ नरेशें था वहीं, हाजिर बघेलैनाथ। आते कवीर देख, झुकाया न उसने माँथ ॥ चरणोंपै लगे ठारने, लै धार नीरकी। भई अकृ० ॥ बोला बघेल वीरसिंह, देखिये कल्लां। चरणोंमें वँरि डारिके, करते हौ क्या भला ? ॥ कहने लगे जगदीशमें, पण्डा जो लै चला। अँटका उठाके हाथसे, छूटा तौ पग जला ॥ पानीसे जलत उसके, बुझाई सरीरकी। भई अकृ० ॥ राजाने भेजा कॉसिद फौरन बुलायके। ला खँवर खाँस जलदी जगदीश जायकै ॥ कहते कवीर सच है, कि बातें बनायकै। झूठी हमारे सामने, दुर्गुण छिपायकै ॥ ठहरावो हाल

१ मंत्र सुने. २ चरित्र. ३ छोटा. ४ मस्तक नीचा किये. ५ मां. ६ रोये. ७ राज्य. ८ अबसृत.

९ सर्व प्रकार. १० प्रारब्धमें. ११ राजा. १२ क्षत्रीजातिविशेष. १३ मस्तक. १४ चरित्र. १५ जल. १६ वृत्त. १७ जलवी. १८ समाचार. १९ यथार्थ.

(३६८)

कवीरपंथी—

ठीकं २, बेनंजीरकी । भई अक्क० ॥ उस बरुंत सिकन्दर कहीं, काशीमें था आया । संग अपने शेखतकी पीरकों भी था लाया ॥ लोगोंने जाके सारो, हाल उसको सुनाया । सुनतेही सिकन्दरसे, कहके उनको बुलाया ॥ देखो हुजूर कर्माता, इस फँकीरकी । भई अक्क ॥ आतेहि सिकन्दरको, रहँम न जरा आई । गरदनमें तौक हतकडी, हाथोंमें डलाई ॥ बेडी भराके पांवमें, सुशकें भी कसाई । फिकवा दिया गद्दामें, गठड़ीमें बँधाई ॥ पर थी उन्हें परवाह कब ?, लोहे जँजीरकी । भई अक्क० ॥ बुलवाके कँतिलोंको, टुकडे करा वदँनके । मँगवाके देगँ उगमें, भरवाके कँनके कनके ॥ चढवाके आगपै वहीँ हाजिर खडा था तँनके । सब कर लिये इरादे, पूरे जो कुछ थे मनके ॥ सतगुरु खड़े खड़े तखँत, नजर आये वजीरकी । भई अक्क० ॥ आर्यौ वजीर पास, बादशाहके धायके । कहने लगा करते हो क्या आतिशें जलायके ॥ बैठे कवीर तो हैं, वहाँ तख्त जायके । शरमाके सिकन्दर है, गिरा चरण आयके ॥ गति धन्य धर्मदास है, अति गुणगँभीरकी । भई अक्क० ॥ ८४ ॥

लावनी ध्वनि गारो.

चलो सखी दरशनको सरतीर ।

प्रगट भये सतगुरु सत्य कवीर ॥ टे० ॥

समय अरुणोदयके परभात । विमल है जल बिच पुरइनके पात, अवतरे बालरूप मृदुगात । देखि सुन्दरता काम लजाय ॥

परम मनोहर रूप अति, शोभा वरणि न जाय ।

उपमा काह त्रिलोकमें, जो कोई देवे लाय ॥

मनो रवि उदय भयो तम चीर । प्रगट भये० ॥

१ सत्य. २ अपूर्व. ३ समय. ४ गुरु. ५ संवर्ण. ६ सिद्धि. ७ साधु. ८ क्या. ९ चिन्ता. १० चांडाल. ११ शरीर. १२ हंटा. १३ बारीक टुकड़ा, १४ वृद्ध होकर. १५ सिंहासन. १६ मंत्रो. १७ अग्नि. १८ सूर्योदय.

शब्दावली ।

( ३६९ )

जुलाहा गमन लिये घर जाय, सरोवरके तट पहुँच्यो आय, देखि बालक तिय गई लोभाय, धायके लीन्हो गाद उठाय ॥

देखत बालक गोदमें, जुलहा कह्यो सरोष ।

धरु जहँ ते लाई तहाँ, लोग लगावें दोष ॥

तबे तिय बोली उर धरि धीर । प्रगट भये० ॥

देखि यह बालक मोहि सुसकात । मनो कुछ कहन चहत है बात ॥

पिया मोहि ताते अधिक सोहात । ले चलो घर सब तजि उतपात ॥

सुनत बात यह नारिकी, काढ़ि लई तलवार ।

धरि चलु बालकको यहाँ, नहिं तो डारूं मार ॥

कह्यो यहि विधि त्रास दिखाय । नाय शिर रहगई तिय सकुचाय ॥

हाय अब कहूं मैं कौन उपाय ? । जायके दूबपै दियो सोवाय ॥

सजैल नयन अति विकल तन, कहि न सकै कुछ बात ।

धरणि परी जिमि माँछली, विन जलके अकुलात ॥

भई तब नभसे गिराँ गँभीर । प्रगट भये० ॥

तोहि तारण कारण सर्वेश । धन्यो निज बालरूप यहि देशँ ॥

धामलै जागकै सुनु उपदेश । मिटे सब जन्म मरण भवकेश ॥

सुनि अकाशवाणी विमल, चकित भयो चितमाहिं ।

तियहि कह्यो ले चलु घरे, अब मैं बरजौं नाहिं ॥

बहन लगी सुदमय मलय समीर । प्रगट भये० ॥

प्रभू जुलहाके घर आये । सन्त सब दर्शनको धाये ॥

सुमन सुर नभसे वरषाये । विरद यश बन्दीजन गाये ॥

दीनबन्धु करुणा भवन, समन सकल दुखद्वन्द्व ।

पन्थ चलायो जगत्में, करि गुरु रामानन्द ॥

मेठि धर्मदासकी भवनिधि पीर । प्रगट भये० ॥

१ बखेडा. २ अबू मरे हुए. ३ मच्छी. ४ आकाश. ५ वाणी. ६ स्थान. ७ स्त्रीको. ८ मना करता हूँ.

९ पुनः.

(३७०)

कवीरपंथी—

लावनी रंगत लंगडी.

करुणा भवन कवीर, समन भवपीर वीर विग्रह धारी । अति उपकारी, कमल दल प्रगटे निज इच्छाचारी ॥ ८० ॥ कुन्द इन्दु अनुरूप, देखि वंपु अति अनूप मनमंथ लाजे । करत पराजय, कौमुदा दिव्य वसन भूषण साजे ॥ दिपंति अमित मणि जड़ित, तड़ित आर्भाजित शीश सुकुट राजे । तिलक मनोहर, माल सुचि सुमन माल उरमं आजे ॥

निरविकार अकार निरमल, नित्यसुक्त निरामयम् । निजानन्दानन्दकन्द, स्वच्छन्दमद्भुतमद्भयम् ॥ निरनिमित्त्य परमार्थकारी, निरममंत्त्व मुदालयम् । निरविवाद विषाद निरगत, निष्ठप्रपञ्चस निरभयम् ॥ आन्ति ध्वान्त ध्वंसक प्रधान, निरआन्ति विमल विद्या धारी । अति उपकारी, कमल० ॥

मुद मङ्गल मय वेष, सुखद सर्वेश सर्वविद विज्ञानी । निर- अभिमानी, विगत मल द्वेष क्लेश हत निरबौनी ॥ ध्यावत सन्त महन्त, अन्त नहि पावत है ज्ञानी । परम सयानी, भारैती चकित होत वरणत वानी ॥ यस्य विविध चरित्र, चारु विचित्र सुरसरि निरमलम् ॥ वकनि मंजि मरौल, काकः पिक्के भवन्ति निरैर्गलम् ॥ सिद्ध मुनि योगिन्द्र, यति सुरवृन्द वन्द्य पदुत्पलम् । शेष वदत अशेष सुख, गुण शक्यते न कथेत्यलम् ॥

योगदण्ड धारी अखण्ड पाखण्ड प्रचण्ड खण्डन कारी । अति उपकारी, कमल० ॥

सेवक सुखद कृपाल, काल कलि व्याल खगेश्वर अति अभिराम । धाम सुधामय, सौम गावत निशिवासर जेहि गुण

१ शरीर. २ सदृश. ३ शरीर. ४ कामदेव. ५ चन्द्रमा का प्रकाश. ६ प्रकाशित. ७ विद्युत. ८ प्रकाशकोठीतनेवाला. ९ अभिमानरहित. १० अंधकार. ११ मोक्षरूप. १२ सरस्वति. १३ स्नान करि १४ हंस. १५ कोयल. १६ सत्य. १७ पूर्ण. १८ गल्ल. १९ सामदेव.

शब्दावला

(३७१)

ग्राम ॥ नाम जाप जपि विमल होत जन, मननशील मुनिवत निष्काम । वांमदेव सम, प्रसन्न सेवत भवन्ति प्रभु पूर्ण काम ॥

धर्मधुरीण प्रवीण गति, मति अपार विशारदम् । अज्ञान हरण प्रधान, निर्गदित ज्ञान भव निधि पारदम् । वेद बोधित कर्म वर्म, विचार सार असारदम् । आपत्तिहर सम्पत्ति सुख, प्रतिपेत्ति प्रचुर प्रकारदम् । वरदायक वरदेश विनायक, विश्वविदित वर ब्रह्मचारी । अति उपकारी, कमल० ॥

अति अनरूप तरुकल्प, सत्य संकल्प अखिल अन्तर्यामी । अपैर त्रिविष्टप परात्पर प्रवर परमतरसुखधामी । अविनाशी अव्यक्त, अजर अज अमर चराचरके स्वामी ॥ अधम उधारण, तरण तारण कारण निज अनुगंामी ॥ ये विधिवरुणेन्द्र इन्द्र, सुराः स्तुवन्ति निरन्तरम् । चिद्घनं दिव्यं ह्यभूतिं, पुरुषेति परात्परम् । निराकार निरीह निरगुण, किञ्चिदस्ति न तत्परम् । कञ्च पर्ण ससुन्द्रवं, पारदं भवाब्ध्यति दुस्तैरम् ॥ धर्मदास दासानुदास, भवदीय दास आज्ञाकारी । अति उपकारी, कमल दल प्रगटे निजइच्छा० ॥

लावनी रंगत मोहिनी ॥

आनन्दकन्द अखिलेश्वर, अन्तर्यामी । अघ ओघ हरण तव, चरण कवीर नमामी ॥ टे० ॥ भव भ्रमित भ्रमित लखि, जीव दुखित अति भारी । करुणानिधि दीनदयाल परम उपकारी ॥ सब काम क्रोध मद, मोह द्रोह रिपु मारी । काशीमें कमल पत्र, पर स्वेच्छाचारी ॥ धरि बालरूप प्रगटे, त्रिभुवनपति स्वामी । अघ ओघ० ॥ जग श्रेष्ठाचार प्रचार, करनको भाई । गंगातटपै कियो रामानंद गुरु जाई ॥ तजि पक्षपात विज्ञान, विविध विधि

१ महादेव. २ विद्यान्. ३ कहा हुआ. ४ कवच. ५ प्राप्ति ६ बहोत. ७ इष्टर. ८ स्वर्ग. ९ अतीव १० सेवक. ११ जिसको. १२ स्तुति करते हैं. १३ उल्लज. १४ पार करनेवाले. १५ अपार. १६ आपका.

(३७२)

कवीरपंथी—

गाई । सद्ग्रन्थ अनेकन, रचे करी प्रभुताई ॥ निजपंथ चलायो, वीतरांग निष्कामी । अघ ओघ० ॥ जिस समय सिकन्दर, काशीजीमें आया । बावन परिचय सतगुरुने जाय दिखाया ॥ यह कौतुक लखिकै शेखतकी चवराया । जीता करवावो, सुरदेको फरमाया ॥ कीन्हो कँमाल जिन्हँदा, तबहीं सतनामी । अघ ओघ० ॥ ऐसी अनेक लीला, प्रभुने बहु कीनी । नहिं जाने मूरख जिनकी बुद्धि मँलीनी ॥ बांधो गढमें धर्म दासको दीक्षा दीनी । कहैलंग गुण वरणे इन्द्र मती मति हीनी ॥ सत रूप सत्य संकल्प, सत्य सुख धामी । अघ ओघ० ॥

झूठे झगडेमें पडि, क्यों जन्म गमावै । यह मनुष्य देह फिर, बारबार नहिं पावै ॥ टे० ॥ मति मूरख इतनी वेसरँमाई धारे । हित अनहित अपनो, तू नहिं जरा विचारे ॥ यह वृथा डुबोवै, आई नाव किनारे । विषयोके वशपरि जीती बाजी हारे । अब कहांतलक, तुझको कोई समुझावै ॥ यह मनुष्य० ॥ वे भूली बातें तुझे, सकल दुखदाई । जो गर्भवासमें, तूने यातना पाई । अब चढी आय तेरे तनपर तरुणाई । मर्ग चलत निहारे सुन्दर नारि परौई ॥ करकै गुमान ले तान, रागिनी गावै । यह मनुष्य० ॥ छल कपट त्यागि भजु, सत्य नाम सुखदाई । जिससे कुछ होवे, तेरी मूढ भलाई ॥ सुख संपत्ति माया, दो दिनकी है भाई । बन सके सो कर ले, परमारथ जग आई ॥ जब काल अचॉनक, आय तुझे ले जावे । यह मनुष्य० ॥ सत संगति कर सन्तोकी, शरणमें जाके । वे कहैं सो सुन उपदेश, तू ध्यान लगाके ॥ है तेरा यही कर्तव्यै, जगतमें आके । कहते कवीर गुरु है, तुझको

१ बैराग्यवान्. २ तिद्धि. ३ नामविशेष, अद्भुतता. ४ जीता. ५ वृषित मँलो. ६ निर्लज्जता. ७ दुःख. ८ मार्ग. ९ दूसरेको १० एकाएकी. ११ काम.

शब्दावली

(३७३)

समझाके ॥ करि चतुराई मति, बातें बहुत बनावे। यह मनुष देह फिर बार बार नहीं पावे ॥

मलार-समय वर्षा ऋतु.

उमड़ि घुमड़ि चहुँ दिशिसे आय, कर्मनके बादर वरषे ॥ टे० ॥ सस्त्रिंत अरु प्रारंभ विविध विध, और करत जो करसे। सो सब भोग हेतु शरीर धरि, जीव जगत्में संरसे ॥ विषयके सुख सब चमकि डुरंत पुनि, बुति दामिनिसे दृशे। ताको सूठ प्राप्ति इच्छा करि, देखि २ के तरेंसे ॥ त्रिविध ताप नाना अनर्थयुत, नाश करनको जरेंसे। अर्थ धर्म अरु काम मोक्षकी, करत याचना हरसे ॥ कोई लै वैराग त्यागि सब, निकरि चले निज घरसे। जप तप व्रत संयम आराधत, जन्म मरणके डरसे ॥ गुरु कवीर सब कर्म नाश करि, निजमति परख प्रवरसे। निश्चय करि सिद्धान्त लखायो, न्यारा क्षर अक्षरसे ॥

आज धैंन ज्ञान घटा घिरि आई। शीतल बहत संभौर, सुगन्धित मन्द २ सरसाई ॥ टे० ॥ सुमति दामिनीकी बुति दमकत, तम अज्ञान नशाई। बरषत विविध विचार सार पद, अखंड धार धरोंई ॥ सकल विकार रहित अस पावैंस, की ऋतु लहि सुखदाई। धर्म विटैप वन कुञ्ज, सुकृत तृणपुञ्ज उठे हरियाई ॥ लखि मयूर सुनि मनेनशील धुनि, प्रमुदित कूकभैंचाई। दाहुँर दीन अधीन हीनजन, बोले अति हरैंघाई ॥ चहुँ दिशि धर्मदास चित चाँत्रिक, चितैवत आस लगाई। स्वातिबुन्द सतगुरु बानो विन, नहिं मम प्यास बुझाई ॥

१ पूर्व. कृतकर्म जो एकत्रित हैं. २ फलोन्मुख कर्म. ३ प्रवृत्त हुए. ४ छिन्ती है. ५ अभिलाष करता है. ६ समूल. ७ मीगना. ८ नाशमान. ९ अविनाशी. १० बादर. ११ वायु. १२ गर्जना करि. १३ वर्षा. १४ वृक्ष. १५ लताच्छादित स्थान. १६ विचारमान १७ चिल्लाकर. १८ मंडक. १९ आनन्द हो. २० पीहा. २१ देखता है.

(३७४)

कवीरपंथी—

पूर्वी । (समय वर्णान्धुः)

पीले प्याला हो मंतवाला प्याला प्रेम अंमी रसकारे ॥टे०॥ पाप पुण्य भुगतंतनको आया, कौन तेरा और तूं किसकारे ? । जहँलग स्वाँस नाम ले प्रभुका धन यौवन स्वपना निझिका रे ॥ बालापन सब खेलि गँवाये । तरुण भयो नारी वशकारे । बृद्ध भयो तन काँपन लागै, फिर न जाय कतहूं सरकारे ॥ नाभिक- मलमें है कस्तूरी, वन वन मृग डोलै भटकारे । बिन सतगुरु इतना दुख पायो, कैसे भयं मिटै पशुकारे ॥ जन्म मरणसे बचना चाहो, तौ छोड़ो कामिनी चसकँारे । कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, नखंशिख रूप भरा विषकारे ॥ १ ॥

करन मंतैसो करै करतारे । और सबनको झूठ मतारे ॥टे०॥ कबहुँक शैलें शैलपर सागर, कबहुँक शोषै सब सरितारे । कबहुँक नृपको करत है भिक्षुक, कबहुँ रंक शिर क्षत्र धरतारे ॥ पूतना कौन सुकृत करि आई, गुन अवगुन तजि करि प्रभुंतारे । ताहि मारि वैकुण्ठ पठायो, बलिराजामें कौन खंतारे ॥ एक पुत्रको नृप पचिहारे, जाके हती सहस्र वनिंतारे ॥ साठ पुत्र नारदको दीन्यो, माया त्यागि विरंति रहतारे ॥ पञ्चभैतारीको व्रत राख्यो, दोष लगायो पतिवरतारे । कहैं कवीर कर्ताकी गसि को, दूजा जगमें लखि सकतारे ॥ २ ॥

वसन्त ( समय, वसन्तच्छु)

वन्दों सतगुरु साहिब कृपाल । जासे छूटे भवद्वैन्द जाल ॥ टे०॥ धरि ध्यान हृदय ध्यावे महेश । पदपङ्कज सेवैं अज सुरेश ॥ नारद सारद अरु श्रुति अशेष, मुख सहस्र करत गुणगान शेष ॥ अभिमान नांग मृगंपति प्रचण्ड । त्रयताप अनल पावस अखण्ड ॥

१ सांसारिक ज्ञान शून्य, उन्मत्त. २ अमृत. ३ प्रोगकरनेको. ४ प्राण. ५ उठा बैठ. ६ अभ्यास. ७ नखते चोटी पर्यंत. ८ इरावा. ९ पर्वत. १० सोखे. ११ एवयव. १२ अपराध. १३ स्त्री. १४ उपराज. १५ द्वीपदी. १६ जन्म मरणादि मुख दुःख. १७ हन्त. १८ वेद. १९ हस्ती. २० सिंह.

शब्दावली

(३७५)

सुरंतरु विशाल फल प्रद यथेष्टं, भवरोग हरण वर भिषग् श्रेष्ठ ॥ अनुरोधरहित गति मति उदार । कश्मेल अरण्य तीक्ष्ण कुठार ॥ अद्वैत अखिल पति संप्रमेय रागादि व्यालंगण वैनतेय ॥ वैरबन्ध विगत मल अति स्वच्छन्द । अनवद्य अनघ आनन्दकन्द ॥ धर्मदास और तजि सकल आस, राखत कवीरको हँठ विश्वास ॥ ३ ॥

ऋतुराज आज आयो वसन्त । सतगुरु यश जग प्रगटचो अनन्त ॥ टे० ॥ चहुँ दिशि अनुशासन मय समीर । लगि बहन हरण भवजाल पीर ॥ तेहि पैरसि बुद्धि कलिकै अन्तुप । भई विकैशि सुमुशु सुप्रसन्नरूप ॥ श्रद्धा रसैलतरु धर्म मौर । झौरनैपर झूलत भक्त भौर ॥ पतिझौर भयो कर्मनको सर्व । बहु जन्म २ कृत धारी गेर्व ॥ अति प्रीतिसहित सत मत विधीन । करि कोकिलें साधू करत गान ॥ करुणानिधान मुख चन्द्र ओर । चित्तवत सज्जन जन चित्त चैकोर ॥ सतसंगनि उपैवनमें विचार । पल्लवित भयो सिद्धांत सार ॥ लखि शान्त होय उर जेहि प्रताप । धर्मदास नाश होय त्रिविध ताप ॥ ४ ॥

मोरे सतगुरु खेलैं नित वसन्त । मिलि सन्त विशौरद मति महन्त ॥ टे० ॥ अनुराग भक्तिको घोरि रंग । छिरकें एकपर एक करि उर्मैङ्ग ॥ उर झोरीमें समता गुलाल । भरि वचन मूठि मारै कृपाल ॥ नहिं सुर दुर्लैभ तन बारबार । ताते भजिले सतनाम सार ॥ ना तो भवसागरकी धार जाय । तन कीट कुमी योनिनमें पाय ॥ दुख भूख प्यास तप शीत द्रन्द । अति कठिन क्लेशके परहिं फन्द ॥ औघटमें करि हो कहैं उपाव । जहाँ नाहिं खेवैयौं

१ कल्पवृक्ष. २ इच्छानुसार. ३ वैद्य. ४ निर्बन्ध. ५ पाप. ६ पैनो. धारवार. ७ प्रमाणसहित. ८ सर्प. ९ गद्द. १० निश्चय. ११ उपदेशरूप १२ स्वर्गकरि. १३ कलि. १४ फूलिक. १५ फूल. १६ वास्वके वृक्ष १७ गुच्छोपर. १८ पत्र गिरना. १९ अभिमान. २० दर्शन. २१ कोपल. २२ पक्षी विशेष. २३ बाण. २४ कोपल फूटे. २५ पंडित. २६ उत्साह. २७ बुझाय. २८ पार करनेवाला.

(३७६)

कबीरपंथी—

और नाव ॥ मनही मन संकट घृटिघृटि । सहि रहिजैहो शिर कूटिकूटि ॥ तेहि कारण चेतहु अबहि वीर समुझाय कहैं तुमको कवीर ॥ ५ ॥

सतसङ्गतिकी महिमा अनन्त । सुनि साधुसन्त खेलैं वसन्त ॥ टे० ॥ गावैं नारद वीणा बजाय । शङ्कर ताण्डव नृत करत आय॥ शुक्रदेव व्यास सनकादि सङ्ग । लियो भाव भक्तिको घोरि रङ्ग ॥ गुरु ज्ञान गुलाल चढावैं शीश । प्रह्लाद सुदामा अम्बरीष ॥ बलभद्र विभीषण विदुर सूत । अति प्रबल वीर हनुमन्त दूत ॥ नामा पीपा अरु अजामील । रंका वङ्गा पुनि अग्र कील ॥ जेदेव सैन नाईको ठाट । रैदास भक्त अरु धना जाट ॥ गुरु रामानंदसे लै अबीर, सब संतनपर डारै कवीर ॥ ६ ॥

होरी ॥

ऐसे नाम उजाकर, होरी खेलन जग आये ॥ टे० ॥ कमल पत्र पर प्रगट भये हैं, नीहूँ निज गृह लाये । होय शिष्य रामा- नन्द गुरुके, निरगुण पंथ चलाये ॥ कथि निरणय निरवान अभय पद, साखी शब्द बनाये । जड पूजाको खण्डन करिकै, आत्मज्ञान हढाये ॥ सत्य यथार्थ वचन सतगुरुके, सुनि पण्डित खिसिआये । षट् दर्शन चरचाको आये, पार कोई नहिं पाये । काशीमें हाँसी करवाई, गणिका सङ्ग लगाये । निजचरणन जल दारि दयानिधि, पण्डा जरत बचाये ॥ शाह सिकन्दर कसनी लीना, जरत अग्निमें डराये । ले यमुनामें पकरि डुबायो, निज समीप गुरु पाये । मस्ता हाथी आनि झुकायो, सिंहरूप दर्शाये । हाथी आय पन्यो चरणनमें, सत्य कवीर कहाये ॥ ७ ॥

हमारे को ! खेले ऐसी होरी । जामे आवांगमन लगी ढोरी

१ पीपीकर. २ पटक पटक. ३ भाई. ४ संज्ञाविशेष. ५ निकट, पास. ६ आना जाना. ७ तार.

शब्दावली

(३७७)

॥ टे० ॥ श्रवण सुन्यो नयनन नहिं देख्यो पिय २ लागी लोरी । पन्थ निहारत जन्म सिरान्यो, प्रगट मिल्यो नहिं चोरी ॥ जा कारण सब गृह तजि निकरे, लोकलाज कुछ तौरी । तासे भेटं भई नहि अबलों, तनमें विरंह बढोरी ॥ कोई मस्तक जटा बढाये, काहुको मूड़े मुड़ोरी । षट् दृशन मिलि स्वांग बनायो, रचि जग मांहि ठंगोरी ॥ अङ्ग भभूति गले मुगछाला, कोई लिये गूदरी झोरी । कोई कमण्डल दण्ड ग्रहण करि, कपड़ा भगवा रंगोरी ॥ जगन्नाथ बन्दी रामेश्वर, देश देशान्तर दोरी । अरसठ तीर्थ पृथ्वि परिकरमा, पुष्करमें लटबोरी ॥ वेद पुराण भागवत गीता, आठा जाम रटोरी ॥ कहै कवीर विना सतगुरुके, भर्म मिटै नहिं भोरी ॥ ८ ॥

मोपे रङ्ग न डारो, मैं तो दिननकी थोरी ॥ टे० ॥ पिय देखनको घरसे मैं निकरी, सास ननदकी चोरी । सखि अपने सँग पकरि ले आई, करि मोसे बरंजोरी ॥ फागको नाम सुनत डर लागत, कांपत तन संगरोरी । तनक छुवत छाती धरकत है, बहियाँ जनि षकरोरी ॥ चोवा चन्दन अनिर अरगजा, केसरि घोरि धरोरी । अबके फागमें खेलि न जानो, पैरके मैं खेल्हूँगी होरी ॥ ऐसी कहि रंगमें नहिं भीजी, कोटि उपाव करोरी । कहै कवीर सुनो भाई साधो, तृष्णा रहगई कैरोरी ॥ ९ ॥

काया नगरकी 'पौरी, मन खेलत होरी ॥ टे० ॥ या नगरिमें चेतन राजा, प्रेमकी चाचैर जोरी । वनिता वृत्ति लिये अपने सँग, हिलमिल फाग रचोरी ॥ सुरतिकी वीना बाजन लागी, निरतिको डफ ठनकोरी । उठत तरङ्ग छतीस रागिनी, अनहैंतकी घनंघोरी ॥ ज्ञान गुलाल लियो भरि झोरी, क्षमाकी केशर घोरी । पांचपचीस

१ व्यान. २ तोखकर ३ प्राप्ति. ४ मिलनेको अभिलाषा. ५ मस्तक. ६ घुटा हुवा. ७ ठगाई. ८ मोली. ९ बलपूर्वक. १० संपूर्ण. ११ अगलें वर्ष. १२ शुष्क. १३ हारपर. १४ होली खेलनेवालोंका मुंड १५ योगनाद. १६ ध्वनि बुजबोरको

(३७८)

कबीरपंथी-

सखी संग आई, तिनको रँगमें बोरी॥ घूँघट खोलि खेलु सन्मुख होय, अपने पिय सँग गोरी । कहैं कबीर फोरि नहिं पड़हो, ऐसो दौंव बँहोरी ॥ १० ॥

काहूको मारैगी, हग अन्न नयन सँवार ॥८०॥ भौंह कमान तानि तनकहु जो, तिरछी देत निहार । विरहबान लागत जहरीले, होत करेजे पार ॥ चन्द्रवंदनि मुर्गलोचनि माया, करि सोरह शृङ्गार । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तीनों देव बनाये जाँर ॥ नरसे नारी कियो नारदको, आप बनी भर्तार । साठ पुत्र तिनके उपजाये, करिके कपट अपार ॥ विश्वामित्र पराशर आदिक, वायू करत अहार । शृंगी ऋषिसे और अनेकन, तपसी छले हजार् ॥ जीव उबारन हम जग आये, हमरेहु लागी लाँर । कहैं कबीर सुनौ भाई साधो, यासे रहो हुशियाँर ॥ ११ ॥

होरीके खिलारीने, कैसी ? मजा करडारी ॥८०॥ भारी भर-मकी सारी फारी, वरवश पकर हमारी । त्रिगुण तनी अँगियाकी तोरी, शब्द कुम्कुमा मारी ॥ ज्ञान गुलाल पन्यो नयननमें, मिटिगइ सब अँधियारी । एकहि भाव विलैंस करत हैं, कौन पुरुषको नारी ? ॥ नित्यानित्य देत है गारी, लोकलाज सब टारी । मोहकी वेसँरि कुमतिके कंगना, मानकी वेदी उतारी ॥ पूरण लखि मन भुलि गयो है, ऐसी न देखी धर्मारी । साहिब कबीर परख रँग रँगिया, परखिके कीनी न्यारी ॥ १२ ॥

सतगुरु प्रियतम पाऊं, हरषि हिय होरी खेलाऊँ ॥ ८० ॥ प्रवृति पन्थमें जात सखिनको, दै २ सयन बुलाऊँ । हिलमिल धाय जाय कृपालको, लै अपने गृह आऊँ ॥ चरण गहि फाग मचाऊँ । सतगुरु ० ॥ प्रेमप्रीतिकी करि पिचकारी, भक्तिको रंग

१ दुबाई. २ पुनः ३ अवसर. ४ पुनः फिरसे ५ चंद्रमुखी. ६ मृगनयनी. ७ उपपति. ८ पति. ९ भोवन. १० अनन्त. ११ पीछे. १२ सावधान. १३ केलि. १४ नव. १५ होरी.

शब्दावली

(३७९)

बनाऊँ । अनहत नाद झांझ डफ वीना ढोल मृदंग बजाऊँ । लोभको नाच नचाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ त्रिविधि कर्मकी धूरि उड़ाऊँ रथ दिनेश ठहराऊँ ॥ जलप्रवाह स्थिर करि सरितनको, विधिको वेद भुलाऊँ ॥ ध्यान शंकरको डिगाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ तन अरपों मन वारों चरणपर, सब धन धाम लुटाऊँ। साहिब कवीरसे फगुवा मै लेऊँ तो धर्मदास कहाऊँ ॥ मुक्तिको पन्थ चलाऊँ सतगुरु० ॥ १३ ॥

मैं तो जात हती निज बाँटे २, मोहि सतगुरु होरी खेलाई ॥ टे० ॥ कृपाकी केसर घोरि बोरि तन, चूनरि रंगमें भिगाई । शब्द कुम्कुमा मारि हजारन, ज्ञान गुलाल उड़ाई ॥ जाय नभ ऊपर छाई । मोहि सतगुरु० ॥ आय विवेक अबीर पन्यो, मेरे नयनन अति सुखदाई । विविध प्रकार उपाय कियो, नहि निकस्यो रह्यो समाई ॥ कछू मोसे बन नहि आई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ त्यागि दियो धन धाम काम सब, बास एकान्त सोहाई । मिल्यो अचानक आय प्राणपति, कर गहि कण्ठ लगाई ॥ भूल गई सब चतुराई । मोहि सतगुरु० ॥ सगरो शृंगार बिगार दियो मेरो, भरमकी गाँठ छुड़ाई । लाजकी बात न जात कही कछु, निज उपदेश हटाई ॥ दियो एक मन्त्र सुनाई । मोहि सतगुरु० ॥ अँस्ति भाँति प्रिय रूप है तोरो, सब तेरो प्रभुताई । गाय कवीर अबीर उड़ायो, धर्मनि अति सुख पाई ॥ बजी तिहुँ लोक बधाई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ १४ ॥

आज मैंने देखो अँनोखो खिलारी । मोसे करि झकंझोरी होरी खेले वरजोरी, मोरी सर्गरो भिजोय दीनी सारी ॥ टे० ॥ लोक वेद मग जात अचानक, रोकत गैल हमारी । कर गहि कँगन मोहके तोरत, अरु मारत पिचकारी ॥ देत गुरुगंमकी गारी ।

१ रज. २ भाग ३ सत. ४ चित. ५ आनन्द. ६ अद्भुत. ७ छाना सपटी. ८ संपूर्ण. ९ गुक्का ज्ञान.

(३८०)

कवीरपंथो—

मैंने देखो० ॥ न्याय मीमाँसा सारुय पतञ्जल, वैशेषिकहू विचारी। प्रक्रिया सहित वेदान्त व्यासकृत, षट दर्शन निधारौ ॥ परख वाकी सबसे है न्यारी ॥ मैंने देखो० ॥ शिव सनकादि और ब्रह्मादिक, गौतम शुक् ब्रह्मचारी। गोरखदत्त वशिष्ठ श्रेष्ठ जग, ये महान आचारी ॥ बुद्धि इन सबकी हारी। मैंने देखो० ॥ निज पदके रंग बोरि दियो मोहि, आंति भेद सब टारी। तापर ज्ञान गुलाल सुरङ्गी, मारि कुम्कुमन डारी ॥ भरमकी अँगिया फारी ॥ मैंने देखो० ॥ धर्मिनि गुरुके चरण कमलपर, तन मन धन सब वारी। बजन लगी तिहुँ लोक बधार्ई, मँगन लगी फगुवारी ॥ भक्ति मोहि दीजे तुम्हारी। मैंने देखो० ॥ १५ ॥

आज निज घटबिच फाग मचैहों। तजि मोह मान करूणा निधानके, ध्यान चरणमें लगैहों ॥ टे० ॥ यक स्वर साधि तँबूरा तनको, स्वासके तार मिलैहों। मोद मृदंग मँजीरा मनसा, विनयको बीन बजैहों ॥ भजन सत नामको गैहों ॥ आज निज० ॥ भक्ति उमंग रंग केसरको लै प्रभुपै ढरकैहों। प्रेम सनेह गुलाल अरगजा, उन्हींके शीश चढैहों ॥ सुरतिकी सुरति बनेहों ॥ आज निज० ॥ सार विचार शृंगार साजि मति, सन्मुख आनि नचैहों। विविध प्रकार रिझाय नाथको, फगुवा लै करि रहें ॥ अखंड मुख पाय अघैहों ॥ आज निज० ॥ कीच उलीच नीच कर्मनको, निरगुनपर वपैहों। पातिक जाति राख करि कारिखँ, विमुखके मुखपै लगैहों ॥ तबै धर्मदास कहैहों ॥ आज निज घट बिच फाग मचैहों ॥ १६ ॥

जड़ चेतनकी उरझी गॉठ, ये तो सुरझत नहि सुरझाई ॥ टे० ॥ अमल अचल अव्यय अविनाशी, जेहि श्रुति गुण बहु गाई। सो

१ व्यवस्था. २ भिन्न. जुदी. ३ सुन्दर रङ्गकी ४ बुद्धि. ५ प्रसन्नकरि. ६ काजल.

शब्दावली

(३८१)

मायावश बँध्यो आपही, शुक् मरकटका नाई ॥ अमृत चौरासी जाई। ये तो सुरझ० ॥ तीरथ व्रत आचार विविध विधि, जपतप आदि उपाई। ज्यों २ करत यत्न छूटनको, त्यों २ होय हटैताई ॥ परत फन्दू अधिकॉई ॥ ये तो सुर० ॥ यद्यपि मूषा तदपि छूटत नहिं, मोहैजनि तम पाई। देखि न परत ज्ञान दीपक विन, छूटि सकै किमि भाई ॥ अनिरवैचनी प्रभुताई। ये तो सुरझ० ॥ सतगुरु कृपा ग्रन्थि छूटनकी, युक्ति कवीर बताई। आत्मम अनु- भवैके प्रकाश करि, सहज मुक्ति होय जाई ॥ मिटत संभ्रम ससुंदाई ॥

होरी अनोखी ये भाई। सुनो साधो चित लाई ॥ टे० ॥ उतँसे अखिल वेद श्रुति बनिता, बहु प्रकारकी आई। कोइ भोरी कोइ बाल किशोरी, कोई जहरकी बुझाई ॥ भरी सब गुण चतुराई। होरी अनोखी ॥ इतँसे गुरु मुख शब्द यथार्थ, परखरूप सुखदाई। सरैल मनोहर शान्त मोहप्रद, झील सहित तहँ जाई ॥ पररूप फाग मचाई। होरी अनो० ॥ कर्मविधोंयक नवप्रेमदा यक, ले गुलाल कर धाई। ताकी पकरि बाँह सब चुनरि, निज रंग माँहि भिजाई ॥ तबै रहगई खिसियाँई। होरी अनो० ॥ दूजी अवसर जानि ठानि निज, मनमें अति हटताई। आगू चली अबीर उड़ावन, रपटि गिरी अकुलाई ॥ मानो कोई मूँठ चलाई ॥ होरी अनो० ॥ तीजी ईश मनाय विविध विधि, ले पिचकारी धाई। नहिं वश चलयो फिरी पाछे पुनि, देखि रही सकुँचाई। हाथ मीजत पछिताई। होरी अनो० ॥ योगयुक्ति आँगर चौथी पुनि, अनहत ढोल बजाई। गावत ऐसो अनोखो खिलारी, देख्यो सुन्यो नहीं माई ॥ करों

१ तोतां. २ कठिना. ३ विशेष. ४ मिथ्या. ५ अज्ञानजन्य अंधकार. ६ सत असतसे विलक्षण. ७ साक्षात्. ८ भय. ९ समूह. १० उघरते. ११ तरुण. १२ इधरते. १३ सोधा १४ विधानकर्ता. १५ नवीन स्त्री. १६ लज्जित हो १७ मंत्रमारा. १८ ईश्वरका स्मरण कर. १९ सकुचित हो २० कुशल.

(३८२)

कवीरपंथी-

यासे कौन उपाई । होरी अनो० ॥ प्रकृति पुरुष विवेक निपुन, मृग नयनी नयन नचाई । बोली पकरि लेहूँ मैं याको, पै पकरन नहिं पाई ॥ सिथिलता तनपर छाई । होरी अनो० ॥ ठानि यक अद्वैतवाद कहि, फगुवा लेहो चुकाई । साहिब कवीर कृपाल दया- निधि, जड चेतन समुझाई ॥ दियो पारख परखाई । होरी अनो० ॥ ८ ॥

इति शब्दावली तीसरे खण्डका तीसरा विभाग ॥

सत्यनाथ ।

शब्दावली तीसरे खण्डका चौथा भाग

“चौका आरती माहात्म्य” की प्रारम्भिक विज्ञप्ति ॥

कवीरपंथमें चौका आरती एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें धर्मके सर्व अंगोंका समावेश हो जाता है । यद्यपि वर्तमानकालमें, प्रायः रोजगारी कडिहारोंने इसे, अपने रोजगारका एक साधन बना रक्खा है, तथापि इसके भेदके सम्बन्धने वालोंका अभी तक अभाव नहीं हुआ है, किन्तु अधिकारीकी कमीसे उन्हें इसके भेदको प्रकट करनेका अवसरही नहीं मिलता । और इसके भेदके न जाननेवाले अज्ञानता वश, प्रायः इसकी निन्दा उठाया करते हैं । और रोजगारी कडिहारोंकी कृपासे सेवक सतियोंकी भी बुद्धि ऐसी कुंठित हो रही है कि, उन्हें इसके भेदको जाननेकी जिज्ञासाही नहीं उठती । क्योंकि, जिनमें उनकी श्रद्धा है वे या तो

शब्दावली

(३८३)

व्यापारी हैं अथवा सीधे साधे संत। व्यापारी, पहले तो आपही इसके महान आशयको नहीं समझते और जो कोई थोड़ा बहुत ग्रन्थ पोथियोंसे समझता भी है, तो वह अपने रोजगारमें विघ्न पड़नेके डरसे सबक सतियोंको बतलाना नहीं चाहता और जो सीधे हैं वे कुल्हेडीकी रस्ती घसीटते चले जा रहे हैं, उनको जब स्वतःही खबर नहीं है, तब दूसरोंको क्या बतलायेंगे। और मेरे जैसे लोग जो खुल्लमखुल्ला भेद बतानेको तय्यार हैं। अधिकारी जित्तासुओंके अभावसे इस साखीका स्मरण कर करके निराशा अनुभव करते हैं—

परबत परबत मैं फिरा, नैन गवाँया रोय । सो बूटी पाऊँ नहीं, जोरे सजीवन होय ॥

तथापि यदि संत गुरुकी दयादृष्टि हुई तो सुझ अर्कचनसे जितना करते बन रहा है सेवा करता जा रहा हूँ और जो बनेगा करता जाऊँगा, इसका उपक्रम आरम्भ हो चुका है और कबीरधर्मदर्शन ग्रन्थमाला निकालना आरम्भ हो गया है। प्रथम भाग माहात्म्य दर्शन छप चुका है।

श्रीवैकटेश्वर प्रेसके मालिक रायबहादुर सेठ रङ्गनाथजी तथा लघुभ्राता परमसज्जन बुद्धिमान् धर्मपरायण श्री बाबू श्रीनिवासजीका कबीर मात्रको कृतज्ञ होकर, पंथी सदगुरुसे प्रार्थना करना चाहिये कि, वे धन जन और धर्मसे पूर्ण रहकर सत्यमार्गकी उन्नतिमें सहायता देते रहें ॥

सम्बत् १९५८ वि. से ही साकेतवासी सेठ खेमराजजीने मेरे दिये हुए ग्रन्थोंका, प्रकाशन करके सत्यधर्मका कितना उपकार किया है, वह किसीसे छिपा नहीं है।

इसका विषय विशेष प्रस्तावनामें लिखना है, इस लिये यहाँही समाप्त करता हूँ।

श्रीवैकटेश्वरप्रेस, बम्बई ता. ७-८-३१

भवदीय—

आप सबोंका पूर्व परिचित रसीपुर शिवहर वाले-स्वामी - श्रीयुगलानन्दविहारी. (कबीरआश्रम पो०, खरसिया.) (जि० बिलासपुर (सी० पी०)

सत्यनाम ।

अथ चौका आरती माहात्म्य प्रारम्भः ।

सत्यनाम स्वकृत विभू, अदली आदि अचिन्त । अजर पुरुष सुनीन्द्र प्रभू, मायापार अनन्त ॥ १ ॥ करुणामय कवीर कही, ज्ञानी पुरुष सुजान । योगजीत सतगुरु सही, मेटे काल गुमान ॥ २ ॥ सुरति शब्दको योग जो, परगट कीन जहान । योग सैंतायन नामते, कहते ताहि सुजान ॥ ३ ॥ जाकर शिष धर्मदासजू, पूरण सुकृत रूप । पायी दया कवीरकी, भये सो आप अनूप ॥ ४ ॥ सत सुकृत प्रतापते, भये जगत आदर्श । नाम देह भव काटई, मिटे काल उत्कर्श ॥ ५ ॥ कह कवीर धर्मदाससे, बचन मोर समरथ्य । ताहि गहे सो वंश है, चढे मुक्ति के रथ्य ॥ ६ ॥ वंश व्यालिस जगतमें, माने बचन हमार । आप तरे जग तारई, देवे शब्द अहार ॥ ७ ॥ शब्द अहार जो छाडई, अखज काल ढिंग जाय । गुरु सीढि ते ऊतरे, काल निरञ्जन खाय ॥ ८ ॥ दुखित जीव जग जानिके, प्रगट भये गुरु देव । चौका विधि प्रगट करी, तत्त्व लखाये भेव ॥ ९ ॥ सत्यलोकको याँन है, आत्म ज्ञानको मूल । काल जालते काढिके, हरे सकल भव झूल ॥ १० ॥ ता महिमा निज मुख कही, सत्य गुरु सत्य कवीर । पूछी सो धर्मदासने, जीव लगावन तीर ॥ ११ ॥

इति मंगला चरण ।

अथ चौका आरती-

माहात्म्य (अनुरागसागरसे) धर्मदास बचन ॥

धर्मदाम पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन सुभागा ॥ हे प्रभु नहीं रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण बरनि न जाई ॥ १ ॥ महिमा अमित अहै तुव स्वामी । केहि विधि बरनों अन्तर्यामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहि

१ विमान.